पवित्र श्रावण मास के अंतिम सोमवार के पावन अवसर पर नालंदा जिला पूरी तरह से शिवमय हो उठा है। ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक नगरी राजगीर के तमाम शिवालयों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों के देवालयों तक सुबह के तड़के से ही ‘हर-हर महादेव’, ‘बम-बम भोले’ और ‘बोल बम’ के गगनभेदी जयघोष गूंज रहे हैं। अंतिम सोमवारी का विशेष आध्यात्मिक महत्व होने के कारण इस बार श्रद्धालुओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिल रही है। शहर के तमाम प्रमुख मार्गों पर केसरिया वस्त्र धारण किए कांवरियों और हाथ में गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा व पुष्प लिए भक्तों की लंबी कतारें देर रात से ही लगनी शुरू हो गई थी। विशेष रूप से राजगीर की सुरम्य वादियों और वैभारगिरि पर्वत श्रृंखला के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित महाभारतकालीन बाबा सोमनाथ सिद्धनाथ महादेव मंदिर में आस्था का अप्रत्याशित सैलाब उमड़ पड़ा है। सुबह 3 बजे से अबतक करीब 15 हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंच चुके हैं और कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। पावन गर्म जल कुंडों में डुबकी लगाकर शुरू हुआ भक्ति का सफर सावन की अंतिम सोमवारी के अनुष्ठान के तहत देश और राज्य के विभिन्न कोनों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने सबसे पहले राजगीर के विश्वप्रसिद्ध पवित्र ब्रह्मकुंड तथा अन्य सप्तधारा गर्म जल स्रोतों में आस्था की डुबकी लगाई। मान्यता है कि यहां के गंधकयुक्त प्राकृतिक गर्म जल में स्नान करने से न केवल शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि भी प्राप्त होती है। कुंड परिसर में ब्रह्म मुहूर्त से ही भारी भीड़ जुटी रही। इसके बाद शिवभक्तों ने पात्रों में पवित्र जल भरकर वैभारगिरि पर्वत की ओर अपना रुख किया। श्रद्धालुओं के मुख से निकल रहे ‘बोल बम’ के नारों ने पूरी पहाड़ी घाटी को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई दुर्गम चढ़ाई को भोलेनाथ की भक्ति के सहारे सहजता से पार करता दिखाई दिया। वैभारगिरि शिखर पर 5000 वर्ष प्राचीन आस्था का केंद्र राजगीर की पांच प्रमुख पहाड़ियों में शुमार वैभारगिरि की चोटी पर लगभग 5000 वर्ष पुराना बाबा सिद्धनाथ महादेव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर सदियों से अघोरी संतों, तांत्रिकों और आम श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था तथा साधना की सर्वोच्च स्थली रहा है। पुरातात्विक दृष्टि से यह स्थल अत्यंत समृद्ध है। मंदिर की संरचना आज भी प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और इंजीनियरिंग की अनूठी मिसाल पेश करती है। मंदिर की लगभग पचास इंच चौड़ी विशाल पाषाण दीवारें और गर्भगृह को सहारा देने वाले बारह सिद्ध पाषाण स्तंभ इसे भव्यता और स्थायित्व प्रदान करते हैं। दुर्गम पहाड़ी पर स्थित होने के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है, जहां लगभग पांच सौ तीस से अधिक सीढ़ियों की खड़ी और थका देने वाली चढ़ाई को भक्त नंगे पांव जयकारे लगाते हुए पार कर रहे हैं। महाभारतकालीन इतिहास और मगध सम्राट जरासंध की तपोस्थली बाबा सोमनाथ सिद्धनाथ मंदिर का संबंध महाभारत काल और मगध साम्राज्य के स्वर्णिम इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, मगध नरेश राजा बृहद्रथ ने संतान प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा के साथ वैभारगिरि पर्वत के इसी पाषाण शिखर पर शिवलिंग स्थापित कर युगों तक कठोर तपस्या की थी। देवाधिदेव महादेव की असीम कृपा से उन्हें महाबली पुत्र के रूप में जरासंध की प्राप्ति हुई। पिता के बाद सम्राट जरासंध ने इस शिवलिंग के चारों ओर विशाल मंदिर का निर्माण कराया और महादेव की अनन्य साधना में लीन हो गए। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष ने उन्हें अमोघ ‘पशुपति अस्त्र’, मल्ल युद्ध में अपराजेय रहने की शक्ति और एक हजार हाथियों के समान अतुलनीय बल का वरदान दिया था। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, जरासंध प्रतिदिन पर्वत पर स्थित पवित्र भेलवाडोभ तालाब में स्नान कर इसी ज्योतिर्लिंग का विधिवत जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया करते थे। सावन के समापन पर तांत्रिक सिद्धि और विशेष अनुष्ठान का संगम श्रावण मास की विदाई बेला और अंतिम सोमवारी होने के कारण इस दिन का धार्मिक व तांत्रिक महत्व चरम पर पहुंच जाता है। शास्त्रों के अनुसार, सावन के आखिरी सोमवार को किए गए रुद्राभिषेक और जलाभिषेक से वर्ष भर की शिव आराधना का पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी विश्वास के चलते दूर-दराज से आए अघोरी, संन्यासी और गृहस्थ भक्त बाबा के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने में जुटे हैं। मंदिर प्रांगण में दिनभर वेद मंत्रों की ऋचाएं, महामृत्युंजय जाप और शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ अनवरत चल रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में स्थित यह प्राचीन धरोहर आज भी मगध कालीन वैभव और सनातन आस्था के अटूट स्तंभ के रूप में अडिग खड़ी है। प्रशासनिक सतर्कता और चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों का कड़ा पहरा श्रद्धालुओं की भारी आमद और पहाड़ी की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए नालंदा जिला और पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। ब्रह्मकुंड क्षेत्र से लेकर वैभारगिरि की चोटी तक सुरक्षा के चाक-चौबंद प्रबंध किए गए हैं। चिलचिलाती धूप और उमस के बीच श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन कराने के लिए प्रवेश और निकास द्वारों पर बैरिकेडिंग की पुख्ता व्यवस्था की गई है। जगह-जगह मजिस्ट्रेटों के साथ सशस्त्र पुलिस बल और महिला बल की तैनाती की गई है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग द्वारा आपातकालीन चिकित्सा शिविर और एंबुलेंस की व्यवस्था भी निचले और पहाड़ी मार्गों पर सुनिश्चित की गई है। पहाड़ी पर स्पेशल क्यूआरटी तैनात, शांति व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में डीएसपी संजीत कुमार गुप्ता सुरक्षा व्यवस्था की कमान स्वयं संभाल रहे राजगीर डीएसपी संजीत कुमार गुप्ता ने स्थिति का जायजा लेते हुए बताया कि सावन की अंतिम सोमवारी को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है और सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ लगातार पहुंच रही है। श्रद्धालु ब्रह्मकुंड में स्नान करने के उपरांत सीधे सिद्धनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए जा रहे हैं। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नालंदा पुलिस प्रशासन पूरी तरह अलर्ट और मुस्तैद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार, निकास द्वार और संभावित भीड़भाड़ वाले संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। अफवाह पर ध्यान नहीं देने की अपील डीएसपी ने बताया कि प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता यह है कि दूर-दराज से आने वाले किसी भी श्रद्धालु को तनिक भी असुविधा न हो और सभी भक्त अत्यंत सुगमता व शांतिपूर्ण तरीके से दर्शन कर सके। पहाड़ी पर लगातार बढ़ रही भीड़ के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसके लिए विशेष रणनीति के तहत स्पेशल क्विक रिस्पॉन्स टीम का गठन किया गया है। क्यूआरटी के जांबाज जवानों को रात में ही पहाड़ी के शीर्ष पर चढ़ा दिया गया था, जो कल रात से ही पूरी मुस्तैदी के साथ वहां विधि-व्यवस्था संभाले हुए हैं। वर्तमान समय में पूरी स्थिति शांतिपूर्ण और नियंत्रण में है। अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से विनम्र अपील की कि वे प्रशासन द्वारा तय किए गए निर्धारित रास्तों का ही उपयोग करें, कतारबद्ध होकर चलें और किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना अथवा अफवाह पर बिल्कुल ध्यान न दें। पवित्र श्रावण मास के अंतिम सोमवार के पावन अवसर पर नालंदा जिला पूरी तरह से शिवमय हो उठा है। ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक नगरी राजगीर के तमाम शिवालयों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों के देवालयों तक सुबह के तड़के से ही ‘हर-हर महादेव’, ‘बम-बम भोले’ और ‘बोल बम’ के गगनभेदी जयघोष गूंज रहे हैं। अंतिम सोमवारी का विशेष आध्यात्मिक महत्व होने के कारण इस बार श्रद्धालुओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिल रही है। शहर के तमाम प्रमुख मार्गों पर केसरिया वस्त्र धारण किए कांवरियों और हाथ में गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा व पुष्प लिए भक्तों की लंबी कतारें देर रात से ही लगनी शुरू हो गई थी। विशेष रूप से राजगीर की सुरम्य वादियों और वैभारगिरि पर्वत श्रृंखला के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित महाभारतकालीन बाबा सोमनाथ सिद्धनाथ महादेव मंदिर में आस्था का अप्रत्याशित सैलाब उमड़ पड़ा है। सुबह 3 बजे से अबतक करीब 15 हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंच चुके हैं और कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। पावन गर्म जल कुंडों में डुबकी लगाकर शुरू हुआ भक्ति का सफर सावन की अंतिम सोमवारी के अनुष्ठान के तहत देश और राज्य के विभिन्न कोनों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने सबसे पहले राजगीर के विश्वप्रसिद्ध पवित्र ब्रह्मकुंड तथा अन्य सप्तधारा गर्म जल स्रोतों में आस्था की डुबकी लगाई। मान्यता है कि यहां के गंधकयुक्त प्राकृतिक गर्म जल में स्नान करने से न केवल शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि भी प्राप्त होती है। कुंड परिसर में ब्रह्म मुहूर्त से ही भारी भीड़ जुटी रही। इसके बाद शिवभक्तों ने पात्रों में पवित्र जल भरकर वैभारगिरि पर्वत की ओर अपना रुख किया। श्रद्धालुओं के मुख से निकल रहे ‘बोल बम’ के नारों ने पूरी पहाड़ी घाटी को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई दुर्गम चढ़ाई को भोलेनाथ की भक्ति के सहारे सहजता से पार करता दिखाई दिया। वैभारगिरि शिखर पर 5000 वर्ष प्राचीन आस्था का केंद्र राजगीर की पांच प्रमुख पहाड़ियों में शुमार वैभारगिरि की चोटी पर लगभग 5000 वर्ष पुराना बाबा सिद्धनाथ महादेव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर सदियों से अघोरी संतों, तांत्रिकों और आम श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था तथा साधना की सर्वोच्च स्थली रहा है। पुरातात्विक दृष्टि से यह स्थल अत्यंत समृद्ध है। मंदिर की संरचना आज भी प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला और इंजीनियरिंग की अनूठी मिसाल पेश करती है। मंदिर की लगभग पचास इंच चौड़ी विशाल पाषाण दीवारें और गर्भगृह को सहारा देने वाले बारह सिद्ध पाषाण स्तंभ इसे भव्यता और स्थायित्व प्रदान करते हैं। दुर्गम पहाड़ी पर स्थित होने के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है, जहां लगभग पांच सौ तीस से अधिक सीढ़ियों की खड़ी और थका देने वाली चढ़ाई को भक्त नंगे पांव जयकारे लगाते हुए पार कर रहे हैं। महाभारतकालीन इतिहास और मगध सम्राट जरासंध की तपोस्थली बाबा सोमनाथ सिद्धनाथ मंदिर का संबंध महाभारत काल और मगध साम्राज्य के स्वर्णिम इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, मगध नरेश राजा बृहद्रथ ने संतान प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा के साथ वैभारगिरि पर्वत के इसी पाषाण शिखर पर शिवलिंग स्थापित कर युगों तक कठोर तपस्या की थी। देवाधिदेव महादेव की असीम कृपा से उन्हें महाबली पुत्र के रूप में जरासंध की प्राप्ति हुई। पिता के बाद सम्राट जरासंध ने इस शिवलिंग के चारों ओर विशाल मंदिर का निर्माण कराया और महादेव की अनन्य साधना में लीन हो गए। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष ने उन्हें अमोघ ‘पशुपति अस्त्र’, मल्ल युद्ध में अपराजेय रहने की शक्ति और एक हजार हाथियों के समान अतुलनीय बल का वरदान दिया था। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, जरासंध प्रतिदिन पर्वत पर स्थित पवित्र भेलवाडोभ तालाब में स्नान कर इसी ज्योतिर्लिंग का विधिवत जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया करते थे। सावन के समापन पर तांत्रिक सिद्धि और विशेष अनुष्ठान का संगम श्रावण मास की विदाई बेला और अंतिम सोमवारी होने के कारण इस दिन का धार्मिक व तांत्रिक महत्व चरम पर पहुंच जाता है। शास्त्रों के अनुसार, सावन के आखिरी सोमवार को किए गए रुद्राभिषेक और जलाभिषेक से वर्ष भर की शिव आराधना का पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी विश्वास के चलते दूर-दराज से आए अघोरी, संन्यासी और गृहस्थ भक्त बाबा के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने में जुटे हैं। मंदिर प्रांगण में दिनभर वेद मंत्रों की ऋचाएं, महामृत्युंजय जाप और शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ अनवरत चल रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में स्थित यह प्राचीन धरोहर आज भी मगध कालीन वैभव और सनातन आस्था के अटूट स्तंभ के रूप में अडिग खड़ी है। प्रशासनिक सतर्कता और चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों का कड़ा पहरा श्रद्धालुओं की भारी आमद और पहाड़ी की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए नालंदा जिला और पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। ब्रह्मकुंड क्षेत्र से लेकर वैभारगिरि की चोटी तक सुरक्षा के चाक-चौबंद प्रबंध किए गए हैं। चिलचिलाती धूप और उमस के बीच श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन कराने के लिए प्रवेश और निकास द्वारों पर बैरिकेडिंग की पुख्ता व्यवस्था की गई है। जगह-जगह मजिस्ट्रेटों के साथ सशस्त्र पुलिस बल और महिला बल की तैनाती की गई है। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग द्वारा आपातकालीन चिकित्सा शिविर और एंबुलेंस की व्यवस्था भी निचले और पहाड़ी मार्गों पर सुनिश्चित की गई है। पहाड़ी पर स्पेशल क्यूआरटी तैनात, शांति व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में डीएसपी संजीत कुमार गुप्ता सुरक्षा व्यवस्था की कमान स्वयं संभाल रहे राजगीर डीएसपी संजीत कुमार गुप्ता ने स्थिति का जायजा लेते हुए बताया कि सावन की अंतिम सोमवारी को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है और सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ लगातार पहुंच रही है। श्रद्धालु ब्रह्मकुंड में स्नान करने के उपरांत सीधे सिद्धनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए जा रहे हैं। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नालंदा पुलिस प्रशासन पूरी तरह अलर्ट और मुस्तैद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार, निकास द्वार और संभावित भीड़भाड़ वाले संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। अफवाह पर ध्यान नहीं देने की अपील डीएसपी ने बताया कि प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता यह है कि दूर-दराज से आने वाले किसी भी श्रद्धालु को तनिक भी असुविधा न हो और सभी भक्त अत्यंत सुगमता व शांतिपूर्ण तरीके से दर्शन कर सके। पहाड़ी पर लगातार बढ़ रही भीड़ के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसके लिए विशेष रणनीति के तहत स्पेशल क्विक रिस्पॉन्स टीम का गठन किया गया है। क्यूआरटी के जांबाज जवानों को रात में ही पहाड़ी के शीर्ष पर चढ़ा दिया गया था, जो कल रात से ही पूरी मुस्तैदी के साथ वहां विधि-व्यवस्था संभाले हुए हैं। वर्तमान समय में पूरी स्थिति शांतिपूर्ण और नियंत्रण में है। अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से विनम्र अपील की कि वे प्रशासन द्वारा तय किए गए निर्धारित रास्तों का ही उपयोग करें, कतारबद्ध होकर चलें और किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना अथवा अफवाह पर बिल्कुल ध्यान न दें।

