सेना में भर्ती का सपना टूटा, स्वरोजगार पर दिया ध्यान:10 साल पहले शुरू किया पोल्ट्री फॉर्म, अब सालाना 7-8 लाख रुपए हो रही आमदनी

सेना में भर्ती का सपना टूटा, स्वरोजगार पर दिया ध्यान:10 साल पहले शुरू किया पोल्ट्री फॉर्म, अब सालाना 7-8 लाख रुपए हो रही आमदनी

गिरिडीह सदर प्रखंड के बरमोरिया गांव के रहने वाले रवि कुमार जब सेना में भर्ती नहीं हो सके तो उन्होंने नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय खुद का काम शुरू कर दिया। रवि ने पोल्ट्री फॉर्म शुरू किया। परिणाम यह रहा कि आज गांव में एक जाना पहचाना नाम बन गए हैं और अब उनकी कमाई सालाना 7-8 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है। रवि गांव में युवकों के प्रेरणा स्त्रोत बन गए हैं। करीब 10 साल पहले उन्होंने छोटे स्तर पर पोल्ट्री फॉर्म शुरू किया था। फिलहाल उन्होंने सोनाली प्रजाति की मुर्गियों का पालन शुरू किया है। आज यह काम उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है। रवि ने अपनी मेहनत और अच्छे प्रबंधन से इस काम को बढ़ाया है और अब वे इससे अच्छी कमाई कर रहे हैं। मेडिकल मेंटेस्ट हुए फेल रवि कुमार बताते हैं कि इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 2015 में उन्होंने सेना में भर्ती होने की तैयारी शुरू की थी। देश सेवा के लिए उन्होंने कई बार भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया, लेकिन मेडिकल टेस्ट में पास नहीं हो पाए। कई कोशिशों के बाद भी जब सेना में जाने का सपना पूरा नहीं हुआ, तो उन्होंने रोजगार के दूसरे तरीकों पर सोचना शुरू किया। तभी उन्होंने पोल्ट्री फॉर्म को अपना व्यवसाय बनाने का फैसला किया। हर साल 10 से 12 हजार चिकन की बिक्री शुरुआत में रवि ने कम चूजों के साथ यह काम शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने पोल्ट्री फॉर्म की हर बात को समझा और अनुभव हासिल किया। वे मुर्गियों की देखभाल, दाना-पानी, साफ-सफाई और बीमारियों से बचाव पर खास ध्यान देने लगे। इससे उनका कारोबार लगातार बढ़ता गया। अभी रवि हर साल करीब 10 से 12 हजार चिकन बाजार में बेचते हैं। उनके मुताबिक, इस काम से उन्हें सालाना लगभग 7 से 8 लाख रुपए का फायदा होता है। साफ-सफाई का भी ध्यान रखना पड़ता है रवि बताते हैं कि पोल्ट्री फॉर्म देखने में आसान लगता है, लेकिन इसमें लगातार निगरानी और सही तरीके से काम करना बहुत जरूरी है। मुर्गों को समय पर दाना-पानी देने के साथ-साथ साफ-सफाई का भी ध्यान रखना पड़ता है। मौसम में बदलाव के दौरान बीमारी की आशंका भी बढ़ जाती है, इसलिए समय पर बचाव और जरूरी दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है। बेहतर देखभाल और प्रबंधन के कारण उनका व्यवसाय लगातार आगे बढ़ रहा है। नौकरी ही रोजगार का एकमात्र विकल्प नहीं: रवि रवि कुमार के तीन बच्चे हैं। पोल्ट्री फॉर्म से होने वाली आमदनी से वह अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के साथ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च भी उठाते हैं। उनका कहना है कि हर युवा के लिए नौकरी ही रोजगार का एकमात्र विकल्प नहीं है। यदि व्यक्ति मेहनत और लगन के साथ स्वरोजगार शुरू करे और उसे सही तरीके से संचालित करे तो उससे भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है। रवि कुमार की कहानी ग्रामीण क्षेत्र के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो नौकरी नहीं मिलने के कारण निराश हो जाते हैं। उनका मानना है कि अवसर की कमी नहीं है, जरूरत केवल मेहनत, धैर्य और सही दिशा में प्रयास करने की है। स्वरोजगार के जरिए भी युवा अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं और परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं। गिरिडीह सदर प्रखंड के बरमोरिया गांव के रहने वाले रवि कुमार जब सेना में भर्ती नहीं हो सके तो उन्होंने नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय खुद का काम शुरू कर दिया। रवि ने पोल्ट्री फॉर्म शुरू किया। परिणाम यह रहा कि आज गांव में एक जाना पहचाना नाम बन गए हैं और अब उनकी कमाई सालाना 7-8 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है। रवि गांव में युवकों के प्रेरणा स्त्रोत बन गए हैं। करीब 10 साल पहले उन्होंने छोटे स्तर पर पोल्ट्री फॉर्म शुरू किया था। फिलहाल उन्होंने सोनाली प्रजाति की मुर्गियों का पालन शुरू किया है। आज यह काम उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है। रवि ने अपनी मेहनत और अच्छे प्रबंधन से इस काम को बढ़ाया है और अब वे इससे अच्छी कमाई कर रहे हैं। मेडिकल मेंटेस्ट हुए फेल रवि कुमार बताते हैं कि इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 2015 में उन्होंने सेना में भर्ती होने की तैयारी शुरू की थी। देश सेवा के लिए उन्होंने कई बार भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया, लेकिन मेडिकल टेस्ट में पास नहीं हो पाए। कई कोशिशों के बाद भी जब सेना में जाने का सपना पूरा नहीं हुआ, तो उन्होंने रोजगार के दूसरे तरीकों पर सोचना शुरू किया। तभी उन्होंने पोल्ट्री फॉर्म को अपना व्यवसाय बनाने का फैसला किया। हर साल 10 से 12 हजार चिकन की बिक्री शुरुआत में रवि ने कम चूजों के साथ यह काम शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने पोल्ट्री फॉर्म की हर बात को समझा और अनुभव हासिल किया। वे मुर्गियों की देखभाल, दाना-पानी, साफ-सफाई और बीमारियों से बचाव पर खास ध्यान देने लगे। इससे उनका कारोबार लगातार बढ़ता गया। अभी रवि हर साल करीब 10 से 12 हजार चिकन बाजार में बेचते हैं। उनके मुताबिक, इस काम से उन्हें सालाना लगभग 7 से 8 लाख रुपए का फायदा होता है। साफ-सफाई का भी ध्यान रखना पड़ता है रवि बताते हैं कि पोल्ट्री फॉर्म देखने में आसान लगता है, लेकिन इसमें लगातार निगरानी और सही तरीके से काम करना बहुत जरूरी है। मुर्गों को समय पर दाना-पानी देने के साथ-साथ साफ-सफाई का भी ध्यान रखना पड़ता है। मौसम में बदलाव के दौरान बीमारी की आशंका भी बढ़ जाती है, इसलिए समय पर बचाव और जरूरी दवाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है। बेहतर देखभाल और प्रबंधन के कारण उनका व्यवसाय लगातार आगे बढ़ रहा है। नौकरी ही रोजगार का एकमात्र विकल्प नहीं: रवि रवि कुमार के तीन बच्चे हैं। पोल्ट्री फॉर्म से होने वाली आमदनी से वह अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के साथ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च भी उठाते हैं। उनका कहना है कि हर युवा के लिए नौकरी ही रोजगार का एकमात्र विकल्प नहीं है। यदि व्यक्ति मेहनत और लगन के साथ स्वरोजगार शुरू करे और उसे सही तरीके से संचालित करे तो उससे भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है। रवि कुमार की कहानी ग्रामीण क्षेत्र के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो नौकरी नहीं मिलने के कारण निराश हो जाते हैं। उनका मानना है कि अवसर की कमी नहीं है, जरूरत केवल मेहनत, धैर्य और सही दिशा में प्रयास करने की है। स्वरोजगार के जरिए भी युवा अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं और परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं।  

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