सुप्रीम कोर्ट बोला-पत्नी को बेवकूफ-निकम्मा कहना अपराध नहीं:ये पति का स्वभाव बताता है; दहेज केस में कोर्ट बिना सबूत बलि का बकरा न बनाएं

सुप्रीम कोर्ट बोला-पत्नी को बेवकूफ-निकम्मा कहना अपराध नहीं:ये पति का स्वभाव बताता है; दहेज केस में कोर्ट बिना सबूत बलि का बकरा न बनाएं

सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि पत्नी को ‘स्टूपिड’ और ‘यूजलेस’ कहना क्रूरता या अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इससे पति के स्वभाव का पता चलता है। इसे ऐसा गंभीर आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता कि पत्नी की आत्महत्या का कारण मान लिया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज हत्या या वैवाहिक मामलों पर कोर्ट सावधान रहें, बिना सबूत के पति-ससुराल को बलि का बकरा न बनाएं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला के पिता ने पति-ससुराल पर मानसिक, शारीरिक क्रूरता के आरोप लगाए थे। दहेज मांग का आरोप भी था, लेकिन इनकी पुष्टि नहीं हुई। केस में पति और उसके परिवार के खिलाफ लगाए आरोपों का महिला की मौत से कोई संबंध साबित नहीं हुआ। 5 साल पहले हुई थी शादी आरोपी व्यक्ति की शादी 3 जनवरी 2021 को हुई थी। इसके बाद कपल फरवरी 2022 में टोरंटो शिफ्ट हो गया। पत्नी ने 11 जून 2023 को 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में लिखा – “एक साल से नौकरी नहीं मिली, जिंदगी में फेल हो गई”। इसके बाद महिला के पिता ने 30 जून 2023 को सतारा, औरंगाबाद में FIR – 304B (दहेज हत्या), 498A (क्रूरता), 323, 504 और दहेज निषेध कानून की धाराओं के तहत केस दर्ज किया। बेंच ने कहा कि IPC की धारा 304B लगाने के लिए साबित करना होगा कि मौत से कुछ समय पहले महिला को दहेज के लिए क्रूरता या उत्पीड़न झेलना पड़ा था। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, जिससे साबित हो कि पति ने दहेज की गैरकानूनी मांग की थी। यह भी साबित नहीं हुआ कि इस मांग का पत्नी की आत्महत्या से सीधा संबंध था। पति-ससुराल को बिना सबूत जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते बेंच ने कहा, “हम उस परिवार का दुख और पीड़ा समझते हैं, जिसने अपनी बेटी को खोया है। लेकिन पति और ससुराल वालों को तब तक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उनके किसी ऐसे काम या चूक को साबित न किया जाए, जिसने महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर किया हो।” कोर्ट ने कहा कि केवल यह कह देना कि आरोपी ने मौखिक और शारीरिक क्रूरता की, पहली नजर में पर्याप्त नहीं है। ऐसे आरोपों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि बताए गए कामों से आत्महत्या हुई। यह बात उन मामलों में भी लागू होगी, जहां अभियोजन पक्ष आत्महत्या और उत्पीड़न, क्रूरता या क्रिमिनल इंटिमिडेशन के बीच संबंध साबित करना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। वैवाहिक विवादों पर सुनवाई करते समय वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक रुख अपनाना चाहिए।

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