बिहार सरकार ने आम लोगों की समस्याओं का मौके पर समाधान और शिकायतों का त्वरित निष्पादन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सहयोग शिविर की शुरुआत की थी। शुरुआत में इन शिविरों में अधिकारी और जनप्रतिनिधि पहुंचकर ग्रामीणों की समस्याएं सुनते और उनके समाधान का भरोसा दिलाते थे। हालांकि, अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। मंगलवार को अलग-अलग प्रखंडों में सहयोग शिविर आयोजित हुए, लेकिन पचरुखी प्रखंड के गोपालपुर पंचायत में पहुंचे ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शिविर समस्या समाधान के बजाय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के भाषण और सरकारी योजनाओं की जानकारी देने तक सीमित रह गया। समस्या लेकर पहुंचे ग्रामीणों को मिला सिर्फ बिस्किट का पैकेट गोपालपुर पंचायत में आयोजित शिविर में ग्रामीण अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि अधिकारी उनकी शिकायत सुनेंगे और मौके पर समाधान की पहल होगी। लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक, उनकी समस्याएं जस की तस बनी रहीं और शिविर से उन्हें सिर्फ बिस्किट का पैकेट मिला। शिविर से बाहर निकल रहे एक ग्रामीण ने व्यंग्य करते हुए कहा, “डीएम क्या कहे, इसका तो पता नहीं। समस्या का समाधान हुआ नहीं, लेकिन बिस्किट मिला है, खा लिए जा रहे हैं।” महिला बोली- यही तो समस्या का समाधान हुआ है एक महिला ने हाथ में बिस्किट का पैकेट दिखाते हुए कहा, “यही तो समस्या का समाधान हुआ है, बिस्किट का पॉकेट मिला है, खा लिए जा रहे हैं।” वहीं दूसरी महिला ने पानी की समस्या का जिक्र करते हुए कहा कि शिकायत के बावजूद समाधान के नाम पर “पानी और बिस्किट मिला है, खाएंगे और चले जाएंगे।” बुजुर्ग ने कहा- सड़क पर बह रहा नाले का पानी एक बुजुर्ग ग्रामीण ने भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सड़क पर नाले का पानी बह रहा है और सड़क की स्थिति खराब है। उनका आरोप था कि डीएम साहब के पास ग्रामीणों की समस्या सुनने का समय नहीं है। उनके मुताबिक, अधिकारी आए, अपनी बात बताई, बिस्किट बंटवाए और चले गए। ‘बिस्किट बांटने से सड़क और पानी की समस्या दूर नहीं होगी’ ग्रामीणों के बयानों से शिविर की व्यवस्था को लेकर नाराजगी सामने आई। उनका कहना है कि जिस सहयोग शिविर को जनता की समस्याओं के समाधान का माध्यम बनाया गया था, वहां बिस्किट का पैकेट ही व्यवस्था के प्रति असंतोष जताने का प्रतीक बन गया है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को ग्रामीणों की समस्याएं सुनने और शिकायतों पर मौके पर कार्रवाई करने का समय नहीं है, तो सहयोग शिविर के नाम पर सरकारी धन खर्च करने का औचित्य क्या है? ग्रामीणों ने पूछा- औपचारिकता बनकर तो नहीं रह गई पहल? ग्रामीणों का कहना है कि भाषण और योजनाओं की जानकारी से उनकी मूल समस्याएं दूर नहीं होंगी। बिस्किट बांटने से सड़क नहीं बनेगी और पानी की समस्या भी खत्म नहीं होगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जनता और प्रशासन के बीच दूरी कम करने के उद्देश्य से शुरू की गई सहयोग शिविर की पहल कहीं महज औपचारिकता और सरकारी योजनाओं के प्रचार का मंच बनकर तो नहीं रह गई है। बिहार सरकार ने आम लोगों की समस्याओं का मौके पर समाधान और शिकायतों का त्वरित निष्पादन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सहयोग शिविर की शुरुआत की थी। शुरुआत में इन शिविरों में अधिकारी और जनप्रतिनिधि पहुंचकर ग्रामीणों की समस्याएं सुनते और उनके समाधान का भरोसा दिलाते थे। हालांकि, अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। मंगलवार को अलग-अलग प्रखंडों में सहयोग शिविर आयोजित हुए, लेकिन पचरुखी प्रखंड के गोपालपुर पंचायत में पहुंचे ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शिविर समस्या समाधान के बजाय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के भाषण और सरकारी योजनाओं की जानकारी देने तक सीमित रह गया। समस्या लेकर पहुंचे ग्रामीणों को मिला सिर्फ बिस्किट का पैकेट गोपालपुर पंचायत में आयोजित शिविर में ग्रामीण अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि अधिकारी उनकी शिकायत सुनेंगे और मौके पर समाधान की पहल होगी। लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक, उनकी समस्याएं जस की तस बनी रहीं और शिविर से उन्हें सिर्फ बिस्किट का पैकेट मिला। शिविर से बाहर निकल रहे एक ग्रामीण ने व्यंग्य करते हुए कहा, “डीएम क्या कहे, इसका तो पता नहीं। समस्या का समाधान हुआ नहीं, लेकिन बिस्किट मिला है, खा लिए जा रहे हैं।” महिला बोली- यही तो समस्या का समाधान हुआ है एक महिला ने हाथ में बिस्किट का पैकेट दिखाते हुए कहा, “यही तो समस्या का समाधान हुआ है, बिस्किट का पॉकेट मिला है, खा लिए जा रहे हैं।” वहीं दूसरी महिला ने पानी की समस्या का जिक्र करते हुए कहा कि शिकायत के बावजूद समाधान के नाम पर “पानी और बिस्किट मिला है, खाएंगे और चले जाएंगे।” बुजुर्ग ने कहा- सड़क पर बह रहा नाले का पानी एक बुजुर्ग ग्रामीण ने भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सड़क पर नाले का पानी बह रहा है और सड़क की स्थिति खराब है। उनका आरोप था कि डीएम साहब के पास ग्रामीणों की समस्या सुनने का समय नहीं है। उनके मुताबिक, अधिकारी आए, अपनी बात बताई, बिस्किट बंटवाए और चले गए। ‘बिस्किट बांटने से सड़क और पानी की समस्या दूर नहीं होगी’ ग्रामीणों के बयानों से शिविर की व्यवस्था को लेकर नाराजगी सामने आई। उनका कहना है कि जिस सहयोग शिविर को जनता की समस्याओं के समाधान का माध्यम बनाया गया था, वहां बिस्किट का पैकेट ही व्यवस्था के प्रति असंतोष जताने का प्रतीक बन गया है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को ग्रामीणों की समस्याएं सुनने और शिकायतों पर मौके पर कार्रवाई करने का समय नहीं है, तो सहयोग शिविर के नाम पर सरकारी धन खर्च करने का औचित्य क्या है? ग्रामीणों ने पूछा- औपचारिकता बनकर तो नहीं रह गई पहल? ग्रामीणों का कहना है कि भाषण और योजनाओं की जानकारी से उनकी मूल समस्याएं दूर नहीं होंगी। बिस्किट बांटने से सड़क नहीं बनेगी और पानी की समस्या भी खत्म नहीं होगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जनता और प्रशासन के बीच दूरी कम करने के उद्देश्य से शुरू की गई सहयोग शिविर की पहल कहीं महज औपचारिकता और सरकारी योजनाओं के प्रचार का मंच बनकर तो नहीं रह गई है।

