किशनगंज के बहादुरगंज प्रखंड के महेशबाथना वार्ड संख्या-4 के ग्रामीण खकुआ नदी पर पुल न होने के कारण दशकों से जोखिम भरा जीवन जी रहे हैं। आजादी के लगभग 80 साल बाद भी यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। बरसात के दिनों में ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है, और शवों को भी कंधे पर उठाकर उफनती नदी के रास्ते कब्रिस्तान या श्मशान तक ले जाना पड़ता है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो ने इस क्षेत्र की गंभीर स्थिति को उजागर किया है। वीडियो में ग्रामीण सिर से ऊपर तक पानी भरी खकुआ नदी को पार करते हुए एक जनाजा ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। तेज बहाव के बावजूद, लोग रस्सी और स्थानीय साधनों का सहारा लेकर एक-दूसरे को पकड़े हुए नदी पार कर रहे थे। जनाजे में शामिल अन्य लोगों को भी अंतिम संस्कार के लिए इसी खतरनाक रास्ते से गुजरना पड़ता है। लोगों के सिर से ऊपर तक पहुंच जाता है पानी स्थानीय निवासी इमरान आलम ने बताया कि बरसात के मौसम में खकुआ नदी का जलस्तर काफी बढ़ जाता है। पानी कई बार लोगों के सिर से भी ऊपर तक पहुंच जाता है, फिर भी ग्रामीणों को मजबूरी में इसी रास्ते का उपयोग करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि किसी की मृत्यु होने पर शव या जनाजा को नदी पार ले जाना सबसे बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि दुर्घटना का खतरा हमेशा बना रहता है और कोई वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध नहीं है। खकुआ नदी पर पुल निर्माण की मांग ग्रामीणों के अनुसार, वे वर्षों से खकुआ नदी पर पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार इस समस्या से अवगत कराया गया है, फिर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। बरसात के मौसम में गांव का संपर्क अक्सर पूरी तरह से कट जाता है, जिससे मरीजों, बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं सहित सभी ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए खकुआ नदी पर अविलंब पुल निर्माण की स्वीकृति दी जाए। उनका कहना है कि एक पुल बनने से हजारों लोगों को राहत मिलेगी और किसी को भी अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच यह दृश्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। आजादी के आठ दशक बाद भी यदि लोगों को जनाजा लेकर उफनती नदी पार करनी पड़ रही है, तो यह क्षेत्र की उपेक्षा का जीवंत उदाहरण है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि अब यह मामला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में आएगा और जल्द ही पुल निर्माण की दिशा में ठोस पहल होगी। किशनगंज के बहादुरगंज प्रखंड के महेशबाथना वार्ड संख्या-4 के ग्रामीण खकुआ नदी पर पुल न होने के कारण दशकों से जोखिम भरा जीवन जी रहे हैं। आजादी के लगभग 80 साल बाद भी यहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। बरसात के दिनों में ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है, और शवों को भी कंधे पर उठाकर उफनती नदी के रास्ते कब्रिस्तान या श्मशान तक ले जाना पड़ता है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो ने इस क्षेत्र की गंभीर स्थिति को उजागर किया है। वीडियो में ग्रामीण सिर से ऊपर तक पानी भरी खकुआ नदी को पार करते हुए एक जनाजा ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। तेज बहाव के बावजूद, लोग रस्सी और स्थानीय साधनों का सहारा लेकर एक-दूसरे को पकड़े हुए नदी पार कर रहे थे। जनाजे में शामिल अन्य लोगों को भी अंतिम संस्कार के लिए इसी खतरनाक रास्ते से गुजरना पड़ता है। लोगों के सिर से ऊपर तक पहुंच जाता है पानी स्थानीय निवासी इमरान आलम ने बताया कि बरसात के मौसम में खकुआ नदी का जलस्तर काफी बढ़ जाता है। पानी कई बार लोगों के सिर से भी ऊपर तक पहुंच जाता है, फिर भी ग्रामीणों को मजबूरी में इसी रास्ते का उपयोग करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि किसी की मृत्यु होने पर शव या जनाजा को नदी पार ले जाना सबसे बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि दुर्घटना का खतरा हमेशा बना रहता है और कोई वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध नहीं है। खकुआ नदी पर पुल निर्माण की मांग ग्रामीणों के अनुसार, वे वर्षों से खकुआ नदी पर पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं। जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार इस समस्या से अवगत कराया गया है, फिर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। बरसात के मौसम में गांव का संपर्क अक्सर पूरी तरह से कट जाता है, जिससे मरीजों, बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं सहित सभी ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए खकुआ नदी पर अविलंब पुल निर्माण की स्वीकृति दी जाए। उनका कहना है कि एक पुल बनने से हजारों लोगों को राहत मिलेगी और किसी को भी अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास और बुनियादी सुविधाओं के दावों के बीच यह दृश्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। आजादी के आठ दशक बाद भी यदि लोगों को जनाजा लेकर उफनती नदी पार करनी पड़ रही है, तो यह क्षेत्र की उपेक्षा का जीवंत उदाहरण है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि अब यह मामला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में आएगा और जल्द ही पुल निर्माण की दिशा में ठोस पहल होगी।

