सस्ते सजावटी सामान से मिट्टी के दीयों की बिक्री घटी:तरनतारन में कुम्हारों को नहीं मिल रहा सही दाम, पुश्तैनी कारोबार छोड़ रहे युवा

सस्ते सजावटी सामान से मिट्टी के दीयों की बिक्री घटी:तरनतारन में कुम्हारों को नहीं मिल रहा सही दाम, पुश्तैनी कारोबार छोड़ रहे युवा

तरनतारन में चीन से आने वाली रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियों और सस्ते सजावटी सामान के कारण मिट्टी के दीयों की मांग घटी है। कुम्हारों को मेहनत का सही मेहनताना नहीं मिल रहा और नई पीढ़ी पुश्तैनी कारोबार छोड़ने लगी है।

पहले दीवाली से कई सप्ताह पहले कारीगरों के घरों में दीये बनाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। चाक पर दीये बनाकर उन्हें धूप में सुखाया जाता और फिर भट्ठी में पकाया जाता था। इस काम में कई दिन लगते हैं। सजावटी सामान की भी मांग रहती थी दीयों के कारीगर बिंदर सिंह ने बताया कि पहले दीवाली उनके लिए साल के सबसे ज्यादा कमाई वाले दिनों में से एक होती थी। दीयों के साथ मिट्टी से बने दूसरे सजावटी सामान की भी मांग रहती थी और परिवारों को अच्छी आमदनी होती थी। अब महंगाई के कारण उत्पादन की लागत बढ़ रही है, जबकि सस्ते तैयार सजावटी सामान के चलते मिट्टी के उत्पाद कम बिक रहे हैं। कारीगरों को पहले से ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है, लेकिन उनकी आमदनी घट रही है। ग्राहक मिट्टी के दीयों के बजाय बिजली की लड़ियां और दूसरे सजावटी सामान खरीद रहे हैं। पुश्तैनी कारोबार छोड़ने को मजबूर हो रहे युवा इस संकट का सबसे ज्यादा असर कारीगरों की नई पीढ़ी पर पड़ रहा है। युवाओं को जब अपने पूर्वजों के पुश्तैनी कारोबार में भविष्य और अच्छी आमदनी की उम्मीद नजर नहीं आती तो वे दूसरे रोजगार की तलाश में जुट जाते हैं। कई युवा इस पारंपरिक काम से दूरी बनाने लगे हैं। कारीगरों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में मिट्टी के दीये बनाने की सदियों पुरानी पारंपरिक कला केवल तस्वीरों और यादों तक सिमटकर रह जाएगी। इससे न केवल कुम्हार परिवारों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी नुकसान पहुंचेगा। स्वदेशी दीये खरीदने से रोशन हो सकता है कारीगरों का घर कारीगरों ने लोगों से अपील की है कि इस दीवाली अपने घरों को रोशन करने के लिए कम से कम कुछ मिट्टी के दीये जरूर खरीदें। उनका कहना है कि मिट्टी का दीया केवल दीवाली की परंपरा और आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि एक मिट्टी का दीया खरीदने से भले ही घर की सजावट में कोई बड़ा बदलाव न आए, लेकिन इससे किसी कारीगर के घर का चूल्हा जरूर जल सकता है। यदि लोग स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दें तो इस पारंपरिक कला को बचाने के साथ-साथ इन परिवारों को आर्थिक सहारा भी मिल सकता है।

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