इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निर्णय में कहा कि राज्य या उसकी संस्थाओं से ठेके के तहत बकाया रकम की वसूली के लिए दायर रिट याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है, जब संबंधित बकाया रकम को राज्य की ओर से स्वीकार किया गया हो और उसके निर्धारण के लिए तथ्यों की विस्तृत जांच की जरूरत न हो। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने एक सहकारी समिति की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि ठेकेदार के बकाया की मांग वाली रिट याचिका को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि मामला अनुबंध से जुड़ा है। लेकिन जहां बकाया रकम स्वीकार हो और तथ्यों की जांच की जरूरत न हो, वहां राज्य के खिलाफ रिट याचिका पर विचार किया जा सकता है। जानिये क्या है पूरा मामला मामला सहकारी समितियां अधिनियम, 1965 के तहत पंजीकृत एक सहकारी समिति से जुड़ा था, जिसे आयुष दवाओं के निर्माण का लाइसेंस प्राप्त था। समिति को मुख्य चिकित्सा अधिकारी, इलाहाबाद के कार्यालय से दवाओं की आपूर्ति का आदेश मिला था। समिति ने इसके तहत दवाओं की आपूर्ति की और दावा किया कि उसने करीब दो लाख रुपये जीएसटी के रूप में जमा किए। उसका कहना था कि आपूर्ति में उसकी ओर से कोई कमी या गलती नहीं थी।
समिति के बिलों का भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद उसने पहले हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। अदालत ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लंबित प्रत्यावेदन पर आठ सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। इसके बाद 8 अक्टूबर 2018 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बिलों का भुगतान करने से इनकार किया। समिति ने याचिका की इस आदेश को चुनौती देते हुए समिति ने वर्तमान याचिका दाखिल की और बकाया रकम का भुगतान 18 प्रतिशत ब्याज के साथ करने का आदेश देने की मांग की। हाईकोर्ट ने पाया कि भुगतान रोकने के जिन कारणों का हवाला दिया गया, उनमें कई गंभीर तथ्यात्मक विवाद शामिल हैं। इनमें खरीद नीति का पालन हुआ या नहीं, आपूर्ति की गई दवाओं की गुणवत्ता कैसी थी, उनका इस्तेमाल हुआ या नहीं, दवाएं वापस की गई थीं या नहीं, संबंधित फर्म की सही पहचान क्या थी और दावा समय-सीमा के भीतर था या नहीं जैसे सवाल शामिल थे। अदालत ने कहा कि इन सवालों का फैसला केवल हलफनामों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य की जरूरत पड़ सकती है और पक्षकारों के साक्ष्यों की जिरह भी आवश्यक हो सकती है। कोर्ट में दी गईं दलीलें याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जिन निर्माताओं को आपूर्ति के लिए सूचीबद्ध किया गया, उनका पंजीकरण समाप्त हो चुका था, जबकि उसका पंजीकरण जारी था। हाईकोर्ट ने कहा कि यह तथ्य अपने आप याचिकाकर्ता को भुगतान का वैधानिक अधिकार नहीं देता। अदालत ने अपने पहले के फैसले एम्स अलास्का टेक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी हवाला दिया। उस मामले में कहा गया कि गैर-वैधानिक अनुबंध के तहत सामान की आपूर्ति के बकाये की मांग मूल रूप से धन की वसूली का दावा है। सामान निर्धारित गुणवत्ता का था या नहीं और दावा समय-सीमा के भीतर है या नहीं जैसे सवाल संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में तय करना उचित नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का भुगतान का अधिकार मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही तय हो सकता है। इसलिए अदालत ने अपने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से याचिकाकर्ता के दीवानी अदालत या किसी अन्य सक्षम वैधानिक मंच के समक्ष जाने का रास्ता बंद नहीं होगा। समिति मध्यस्थता सहित उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का सहारा ले सकती है।

