शाही इमाम बोले-समस्याओं के हल के लिए सदन पहुंचें मुस्लिम:सियासत में भागीदारी ही मसले हल होंगे; सड़क पर प्रदर्शन से FIR होगी, समाधान नहीं

शाही इमाम बोले-समस्याओं के हल के लिए सदन पहुंचें मुस्लिम:सियासत में भागीदारी ही मसले हल होंगे; सड़क पर प्रदर्शन से FIR होगी, समाधान नहीं

पंजाब के शाही इमाम मौलाना उस्मान रहमानी लुधियानवी ने कहा कि मुस्लिम समाज को अपने धार्मिक और सामाजिक मुद्दों के स्थायी समाधान के लिए राजनीतिक भागीदारी बढ़ानी होगी। मस्जिदों से जुड़े कानून, यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) और दूसरे मुद्दों पर प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने के लिए समाज के लोगों का विधानसभा और संसद तक पहुंचना जरूरी है। सड़क पर प्रदर्शन करने से एफआईआर हो सकती है, लेकिन समस्याओं के समाधान के लिए कानून बनाने वाली संस्थाओं में भागीदारी अहम है। मौलाना बुधवार को भोपाल में कस्तूरबा शिक्षा समिति के एएम हायर सेकेंडरी स्कूल के कार्यक्रम में शामिल होने आए थे। इस दौरान दैनिक भास्कर से खास बातचीत में उन्होंने मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी, वक्फ बोर्ड की नई बॉडी में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति, सामाजिक एकता और पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की राजनीतिक रणनीति पर अपनी बात रखी। फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल हों भोपाल में वक्फ बोर्ड की नई बॉडी में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने के सवाल पर मौलाना ने कहा कि मुस्लिम समाज की परेशानी की एक बड़ी वजह राजनीतिक भागीदारी की कमी है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रतिनिधि कानून बनाने वाली संस्थाओं में पहुंचेंगे, तो संबंधित कानूनों और व्यवस्थाओं पर अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकेंगे। मस्जिदों में अजान से जुड़े नियमों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में केवल मुतवल्ली की भूमिका नहीं होती, बल्कि संबंधित संस्थाओं और कानून बनाने वाली व्यवस्था के फैसले भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए समाज को केवल विरोध करने के बजाय निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी बढ़ानी चाहिए। पैगंबर साहब ने दूसरे समुदायों से किया था संवाद मौलाना ने पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के मक्का से मदीना हिजरत करने के बाद के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वहां अमन और सुरक्षा के इंतजामों के लिए दूसरे समुदायों के साथ संवाद और समझौते किए गए। उनके मुताबिक, यह उदाहरण बताता है कि समाज के हितों और सुरक्षा के लिए राजनीतिक समझदारी तथा दूसरे समुदायों के साथ सहयोग जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिस देश में हम रहते हैं, वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी के जरिए ही अपने अधिकारों और हितों को प्रभावी ढंग से सामने रखा जा सकता है। समाज को राजनीति से दूरी बनाने के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपनी मौजूदगी मजबूत करनी चाहिए। जाति-बिरादरी और अहंकार से कमजोर हुई एकता मौलाना ने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद मतभेदों पर चिंता जताते हुए कहा कि जाति, बिरादरी और अहंकार के कारण समाज की एकता कमजोर हुई है। लोग अपने धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व की अच्छाइयों को देखने के बजाय उनकी कमियां तलाशने में लगे रहते हैं। इससे समाज छोटे-छोटे समूहों में बंट जाता है और उसकी सामूहिक ताकत प्रभावित होती है। उन्होंने कुरान की उस शिक्षा का उल्लेख किया, जिसमें आपसी फूट से बचने और एकजुट रहने की बात कही गई है। मौलाना ने कहा कि समाज को दूसरों को दोष देने के साथ अपनी कमजोरियों पर भी विचार करना चाहिए। आपसी मतभेद दूर किए बिना बड़े सामाजिक उद्देश्यों को हासिल करना मुश्किल है। शिक्षा और आर्थिक मजबूती पर भी जोर मौलाना ने कहा कि समाज की तरक्की के लिए धार्मिक शिक्षा के साथ आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ाना जरूरी है। पैगंबर साहब की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक व्यवस्था, सुरक्षा और आर्थिक मजबूती भी महत्वपूर्ण हैं। नमाज के साथ जकात की अनिवार्यता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मदद करना सामाजिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। मुस्लिम समाज को शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, आपसी एकता और राजनीतिक भागीदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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