शरीर ही ब्रह्माण्ड : शिशु ही भगवान

शरीर ही ब्रह्माण्ड : शिशु ही भगवान

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:- कृष्ण का यह उद्घोष प्रमाण है कि सभी प्राणियों में ईश्वर का अंश विद्यमान है। इस दृष्टि से सभी ईश्वर है। सृष्टि में यह ईश्वरांश कब किस प्राणी में कैसे प्रस्फुटित होगा, यह भी ईश्वर की ही महिमा होती है। अव्यय-अक्षर व क्षर के साथ परात्पर की अद्र्धमात्रा से युक्त ईश्वरांश में विद्या और अविद्या दोनों भाव साथ ही रहते हैं। अव्यय की आनन्द-विज्ञान और मन कलाएं विद्या भाव हैं तथा मन-प्राण और वाक् अविद्या भाव हैं। सृष्टि की ओर उन्मुख जीव अविद्या के गर्भ में विद्या भाव को साथ लेकर पैदा होता है। वही पुन: जब मुक्तिसाक्षी भाव में आता हैं, तब उसके अविद्या के आवरण हट जाते हैं और विद्या भाव प्रस्फुटित हो जाता है।

धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश और श्री- ये षड्भाव भगवत्ता के हेतु हैं। सृष्टि में सृजन कर्म स्त्री को दिया है। ईश्वरांश जीव के साथ स्त्री गर्भ में आश्रय पाता है। यही कारण है कि भगवान को जन्म देने वाली स्त्री ही भगवती है और उसका मातृत्व ही भगवत्ता है। सृजन कर्म यज्ञ है। कृष्ण कह रहे हैं कि प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजा की सृष्टि करके कहा कि इस यज्ञ के द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त होओ, यह तुम्हारी अभिलषित कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो-
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।। (गीता 3.10)

अधिदेव-अधिभूत और अध्यात्म तीनों संस्थाओं में यह यज्ञ होता है। प्राकृतिक सौर संवत्सर यज्ञ के अनुकरण पर किए गए आध्यात्मिक यज्ञ में माता-पिता के दाम्पत्य भाव से संतति रूप अपूर्व की उत्पत्ति होती है। ब्रह्म को पृथ्वी लोक तक लाने का भगीरथ प्रयास ‘भग’ के बिना संभव नहीं है। यह भग भी प्रत्येक लोक में सृजन-भूमि बनता है। इसी कारण पंचाग्नि विद्या में जीव के स्थूल रूप में आने की क्रमिक यात्रा में सोम रूप ब्रह्म बीज सावित्र्याग्नि, पर्जन्याग्नि, भूताग्नि, जठराग्नि और योषाग्नि में आहुत होता हुआ पुरुष रूप में परिणत हो जाता है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि स्त्री यज्ञ की वेदी है। उसकी योनि ही यज्ञ की अग्नि है—योषा वै यज्ञस्य वेदि:। तस्या उपस्थ एव यज्ञस्याग्नि:। यज्ञिय वेदी और अग्निकुण्ड भूत यह भग सृजन का स्रोत है।

गर्भ में माता के अन्न से पोषित जीव के सातवें महीने तक सभी शरीरांगों का निर्माण हो जाता है और माता की चेतना से गर्भस्थ की सुप्त चेतना का जागरण होता है। चेतना के जागरण के साथ ही जीव को पिछले समस्त जन्मों का स्मरण हो जाता है कि किन-किन योनियों में जन्मा? क्या-क्या कर्म किए? किन-किन पाप-पुण्यों के कारण यह गर्भ मिला—सप्तमे मासि जीवेन संयुक्तो भवति।। (गर्भोपनिषद्)

गर्भवास जीव के लिए अत्यन्त कष्टकारी होता है। यह गर्भस्थ जीव पूर्ण अंधकार में रहता है और यह स्थान अत्यन्त संकुचित रहता है। गर्भ-जल और मल से युक्त दुर्गन्धपूर्ण यह क्षेत्र माता के जठराग्नि से निरन्तर आग्नेय बना रहता है। अत: जीव इस गर्भ में नरक की सी पीड़ा का अनुभव करता है—तस्मिन् गर्भे दु:खं चिरं वासं क्षारोदके वा जठराग्नौ वा पच्यमान:।

गर्भ से जीव के बाहर आने की प्रक्रिया मात्र जन्म नहीं बल्कि चेतना की एक गहन यात्रा और स्मृति का विस्मरण है। जीव पूर्वजन्मों के स्मरण के साथ वर्तमान का निर्वहन कुशलता से नहीं कर सकता। साथ ही यह भी सही है कि यदि विस्मृति न हो तो पूर्वकृत कर्मों के भोग के साथ ही जीव नवीन कर्म बंधन में नहीं बंधेगा तो माया का खेल तो स्वत: ही समाप्त हो जाएग। स्पृश्यते सर्वगामिन्या मायया- यानी जैसे ही जीव बाहर आता है, माया का स्पर्श होता है, जिससे पिछले जन्म और कर्मों का ज्ञान समाप्त हो जाता है।

मार्कण्डेय पुराण में प्रसव-पीड़ा को गर्भक्लेश कहा है। भागवत और विष्णु पुराण में कहा गया है कि सूतिमारुत (प्राण वायु) गर्भ पीड़ा को उत्पन्न करता है और शिशु को भूमिष्ठ करने में सहायक बनता है। जैसे-जैसे प्रसवकाल समीप आता है, गर्भनाल के माध्यम से संकुचन तथा बाहरी दबाव बढ़ता है और स्मृति धुंधली पड़ने लगती है। जन्मनली से बाहर निकलते समय होने वाली पीड़ा सूक्ष्म शरीर पर ऐसा आघात करती है कि स्मृति पटल पर अंकित सभी स्मृतियां मिट जाती है—
सूतिवातस्य वेगेन योनिरन्ध्रस्य पीडनात्।
विस्मृतं सकलं ज्ञानं गर्भे यत् चिन्तितं हृदि।।

आचार्य चरक ने शारीरस्थान के आठवें अध्याय में सामान्य प्रसव के आठ स्तरों का वर्णन किया है। उनके अनुसार प्रसवकाल में प्रसव मारुत के सक्रिय होने से शिशु ब्रह्मद्वार की ओर बढ़ता है। इस प्रक्रिया में अत्यधिक दबाव के कारण शिशु के फेंफड़ों में भरा जल 90 प्रतिशत तक निकल जाता है। जन्म के साथ ही शिशु जलप्राणी से वायुप्राणी बन जाता है। उसका अपना स्वतंत्र प्राणमंडल सक्रिय होता है। गर्भ में शिशु की चेतना मां की चेतना में लीन रहती है, जन्म के बाद तापमान और वायु का पहला आघात ही मन के अद्वैत से द्वैत में जाने का अनुभव है। जन्म के तुरंत बाद शिशु को पत्थर के समान कठोर- अश्मोपम और हवा व धूप सहन न करने वाला- वातातप-असह कहा जाता है।

गर्भ में विज्ञानमयकोश (बुद्धि और अहंकार) पर स्थूल शरीर का आवरण न होने के कारण पूर्वस्मृतियां और सूक्ष्म ज्ञान सीधा पहुंचता है किंतु जन्म के साथ ही भूख, प्यास, स्पर्श के तीव्र स्पन्दन ही माया का पर्दा हैं। जो सूक्ष्म ज्ञान को ढक लेते हैं। जन्म-प्रक्रिया पूर्व ज्ञान के विस्मरण का कारण बनती है। स्थूल शरीर और इन्द्रियों से आने वाली सूचनाओं का प्रबल प्रवाह विज्ञानमय कोश का आवरण बनते हैं। बालक की मधु और घृत रूप प्रथम घुट्टी ही संस्कारों के आवरण का प्रथम सोपान बनती है।

गर्भ में आनन्दमय कोश शांत और अखंड अवस्था में होता है। जबकि जन्म के बाद मन और शरीर पर पड़ने वाले सुख-दु:ख के संस्कार आनन्दमय कोश पर होने लगते हैं। यहीं पर वासना और अहंकार के बीज रोपे जाते हैं जो जीवनपर्यन्त इच्छाओं और कर्मों का मूल बनते है। इन्द्रिय स्तर पर शिशु गर्भस्थ अवस्था में न्यूनतम सक्रिय होता है। जन्म के साथ ही सारी इन्द्रियां एक सुनियोजित तीव्रता से खुलती हैं। यह अन्तर्मुखी से बर्हिमुखी होने का अनुभव है। गर्भ में शिशु की पाचन अग्नि मंद रहती है। जन्म के साथ ही पाचन अग्नि स्तनपान से प्रदीप्त होती है। और प्रथम मल त्याग की प्रक्रिया शुरू होती है। यह शारीरिक स्वतंत्रता का बड़ा चरण है।

गर्भस्थ उल्व से घिरा रहता है। यह उल्व अर्थात् झिल्ली उसे संक्रमण से बचाती है और तापमान नियंत्रित रखती है। ब्रह्मद्वार से गुजरते हुए यह उल्व स्नेहक का काम करता है। यहां से गुजरना एक तरह का जीवाणु स्नान है। मां के लाभकारी जीवाणु शिशु की त्वचा पर एक सुरक्षात्मक कवच चढ़ा देते हैं जो उसे बाह्य वातावरण के हानिकारक कीटाणुओं से बचाता है। यह उसके रोग-प्रतिरोधक तंत्र का पहला स्तर है।

इन आठ परिवर्तनों का सम्मिलित आघात ही विस्मरण में सहायक है। सामान्य अथवा प्राकृतिक प्रसव में जो कार्य प्रसव मारुत और ब्रह्म मार्ग स्वत: कर देते हैं, वही कार्य ऑपरेशन के बाद कृत्रिम साधनों से किए जाते हैं। जीवाणु स्नान के अभाव में शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती है। साथ ही प्राकृतिक दबाव व संकुचन के अभाव में शिशु के फेंफड़ों में अवशिष्ट जल रह जाने की संभावना अधिक रहती है। तनाव प्रणाली की प्रारंभिक सक्रियता भी मंद रहती है। अद्वैत से द्वैत भाव में आने का ज्ञान भी धीरे-धीरे उजागर होता है। चूंकि इन्द्रिय प्रवाह अपेक्षाकृत कम तीव्र और कम आकस्मिक होता है अत: सूक्ष्म ज्ञान पर आवरण कम होता है। ऐसे शिशु अधिक स्वप्निल, संवदेनशील या पूर्व स्मृतियों के प्रति अधिक ग्रहणशील हो सकते हैं।

आनंदमय कोश स्तर पर जन्मविधि प्रभावी नहीं होती। कर्मबीजों का अंकुरण दोनों ही स्थितियों में समान रूप से आरंभ होता है। मां का वात्सल्य और शिशु का प्रेम अन्तत: इसी स्तर पर अपनी पूर्णता पाता है। छहों भग उस शिशु में आरंभ से विद्यमान रहते हैं। मेरा ईश्वरत्व बना रहे, इसी भावना के साथ वह प्रसवपीड़ा के द्वारा ब्रह्म द्वार से भूमिष्ठ होता है। विद्यारूपी ईश्वरीयबीज प्रसवपीड़ा में भी सुरक्षित रहता है। वह समय के साथ प्रस्फुटित हो जाता है। प्रसवकाल में मां की हर क्रिया शिशु के इसी भगवत् स्वरूप को प्रकट करने में सहायक बनती है। मां के आनन्द से शिशु का आनन्द भाव जुड़ा है। नाल कटने से पूर्व ही यह आनन्द भाव शिशु तक पहुंच जाता है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com

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