विरली रियासतों में था भोपाल:आजादी से पहले बहुत कम रियासतों को अपने डाक टिकट छापने का अधिकार था

विरली रियासतों में था भोपाल:आजादी से पहले बहुत कम रियासतों को अपने डाक टिकट छापने का अधिकार था

सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष श्रृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… कभी अपना डाक विभाग, अपने डाक घर और पोस्ट बॉक्स थे। भोपाल उन गिनी-चुनी रियासतों में था, जिन्हें अपने नाम से डाक टिकट छापने का अधिकार था। यही टिकट आज इतिहास और फिलैटेली (डाक टिकट संग्रह) की दुनिया में खास पहचान रखते हैं। हाथ से छपाई के दौरान स्पेलिंग और प्रिंटिंग की मामूली गलतियों वाले कुछ टिकट अंतरराष्ट्रीय नीलामियों में लाखों की कीमत हासिल कर चुके हैं। भोपाल में अलग डाक व्यवस्था की शुरुआत 1847 में नवाब सिकंदर जहां बेगम ने की थी। शुरुआत में इसका उपयोग सरकारी दस्तावेज भेजने तक सीमित था। बाद में आम लोगों की चिट्ठियां भी इसी व्यवस्था से भेजी जाने लगीं। तब देश का अधिकांश हिस्सा अंग्रेजों की डाक व्यवस्था पर निर्भर था, जबकि भोपाल की अपनी डाक सेवा थी। करीब 25 साल बाद, 23 मई 1872 को नवाब शाहजहां बेगम के शासनकाल में पहला डाक टिकट जारी हुआ। उनके शासनकाल में डाक व्यवस्था का विस्तार हुआ और पूरी रियासत में 183 लाल पिलर पोस्ट बॉक्स लगाए गए। शुरुआती टिकट गवर्नमेंट सुल्तानिया प्रेस में लिथोग्राफी तकनीक से पत्थरों पर हाथ से छापे जाते थे। हर डिजाइन अलग से तैयार होने के कारण कोई भी दो टिकट पूरी तरह एक जैसे नहीं होते थे। इसी प्रक्रिया में कई वर्तनी और प्रिंटिंग की त्रुटियां भी रह गईं, जो आज इनकी सबसे दुर्लभ वैरायटी मानी जाती हैं। 1908 से इनकी छपाई ब्रिटेन की प्रसिद्ध परकिन एंड बेकन कंपनी में होने लगी। 1930 में चार सर्विस स्टैम्प नासिक के सरकारी प्रेस में तैयार किए गए। भोपाल रियासत के राजचिह्न की दोनों मछलियां इन टिकटों की पहचान थीं। 1936 से 1949 के बीच जारी सचित्र टिकटों में भोपाल की ऐतिहासिक इमारतों के साथ बाघ और चित्तीदार हिरण जैसे वन्यजीवों को भी स्थान मिला। इसी ऐतिहासिक और तकनीकी विरासत के कारण भोपाल रियासत बेहद मूल्यवान माने जाते हैं। NWAB लिखी हुई डाक शीट 1.43 लाख में बिकी डाक संग्राहकों के लिए NAWAB की जगह NWAB, BEGUM की जगह BEGAN, BFGAM जैसी वैरायटी अलग पहचान रखती हैं। साल 1872 के आधा आना लाल टिकट की ‘NWAB’ वैरायटी वाली 20 टिकटों की पूरी शीट 2020 में लंदन की ग्रोसवेनर फिलैटेलिक ऑक्शंस में 1,100 पाउंड (करीब ₹1.43 लाख रु.) में नीलाम हुई। 2023 में BEGAN, BFGAM जैसी त्रुटियों वाली 20 टिकटों की शीट 420 पाउंड (करीब ₹54,500 रु.) में बिकी। NWAB वैरायटी वाली एक शीट की कीमत 2,160 पाउंड (करीब ₹2.80 लाख रु.) आंकी गई। डाक टिकटों पर किसी भी बेगम का चित्र नहीं भोपाल एक प्रमुख मुस्लिम रियासत थी, इसलिए इस्लामी परंपराओं का पालन करते हुए डाक टिकटों पर किसी भी नवाब या बेगम का चित्र नहीं छापा गया। 1872 के शुरुआती टिकटों के बीच का हिस्सा खाली छोड़ा जाता था। बाद में वहां उर्दू में शासक का नाम उभारा (एम्बॉस) जाता था। इसके लिए दो अलग-अलग मुहरें इस्तेमाल होती थीं। एक में बेगम को ‘SHAH’ व दूसरी में ‘SULTAN’ लिखा जाता था। (कल पार्ट 8 में पढ़िए नई कहानी)

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