Ram Manohar Lohia Death Anniversary: आज 12 अक्टूबर को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रखर समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया की 59वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। 12 अक्टूबर 1967 को दिल्ली में उनका निधन हुआ था। आज देशभर में नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ के लोहिया पार्क में पुष्पांजलि अर्पित की और कहा कि नाइंसाफी व गैर-बराबरी के खिलाफ लोहिया के सप्त-क्रांति के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का संकल्प लिया जा रहा है। उन्होंने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज के उत्थान को लोहिया की सच्ची श्रद्धांजलि बताया।
लोहिया की मूल विचारधारा क्या थी?
डॉ. लोहिया का समाजवाद पश्चिमी मॉडलों की नकल नहीं था। उन्होंने मार्क्स के आर्थिक विश्लेषण और गांधी के नैतिक मूल्यों को मिलाकर ‘नया समाजवाद’ दिया। उनकी सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा थी सप्त-क्रांति – सात क्रांतियां। इनमें स्त्री-पुरुष समानता, रंगभेद का खात्मा, जाति-जन्म आधारित असमानता का उन्मूलन, विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष, निजी संपत्ति की असमानता का विरोध, निजी जीवन में हस्तक्षेप के खिलाफ और सत्याग्रह के जरिए सत्ता परिवर्तन शामिल थे।
उन्होंने चौखंभा राज्य (Four-Pillar State) का विचार दिया, जिसमें गांव, जिला, प्रदेश और केंद्र – चार स्तरों पर सत्ता का विकेंद्रीकरण हो। लोहिया परिवारवाद के खिलाफ थे। उन्होंने ‘तीन आना बनाम पंद्रह आना’ की ऐतिहासिक बहस से संसद को हिला दिया था, जिसमें आम आदमी की गरीबी और सत्ता के खर्च की तुलना की गई। उनका एजेंडा व्यापक आर्थिक समानता के साथ सामाजिक न्याय, जाति व्यवस्था का विध्वंस और विकेंद्रीकृत लोकतंत्र था।
समाजवादी पार्टी और PDA का उदय
1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की और लोहिया की विरासत का दावा किया। शुरुआत में पिछड़ों के आरक्षण और सामाजिक न्याय पर जोर था। अखिलेश यादव के नेतृत्व में यह आगे बढ़ा और PDA फॉर्मूला सामने आया। PDA का मतलब है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। 2024 लोकसभा चुनाव में इस रणनीति ने सपा को उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता दिलाई।
अखिलेश यादव बार-बार कहते हैं कि PDA समाज को राजनीतिक शक्ति देकर पीड़ित, दुखी और अपमानित वर्ग का उत्थान करना लोहिया के विचारों की सच्ची श्रद्धांजलि है। पार्टी के कार्यक्रमों में लोहिया, अंबेडकर और मुलायम सिंह यादव की तस्वीरें साथ-साथ दिखती हैं।
विचारधारा कितनी बदली?
लोहिया का एजेंडा व्यापक और वैचारिक था। वे केवल जाति-आधारित गठजोड़ नहीं चाहते थे। उनका लक्ष्य पूरी जाति व्यवस्था को तोड़ना और सच्चे समानता का समाज बनाना था। वे सत्ता के केंद्रीकरण और परिवारवाद दोनों के विरोधी थे।
आज का PDA मुख्य रूप से चुनावी रणनीति है। यह यादव-मुस्लिम वोटबैंक के साथ गैर-यादव ओबीसी और दलितों को जोड़ने का प्रयास है। आलोचक कहते हैं कि लोहिया की सप्त-क्रांति और चौखंभा राज्य जैसे गहरे विचार अब नारों में सिमट गए हैं। परिवारवाद के आरोप भी लगते हैं, जबकि लोहिया इसे लोकतंत्र का दुश्मन मानते थे।
दूसरी ओर, समर्थक तर्क देते हैं कि समय के साथ राजनीति बदलती है। लोहिया ने पिछड़ों को आवाज दी थी। PDA उसी आवाज को व्यापक बना रहा है। सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य वही है – वंचित वर्गों को सत्ता और सम्मान दिलाना।
समाजवादी एजेंडा कितना बदला?
लोहिया का समाजवाद आर्थिक विकेंद्रीकरण, नैतिक राजनीति और व्यापक सामाजिक क्रांति पर टिका था। आज का एजेंडा ज्यादातर आरक्षण, जातिगत समीकरण और चुनावी लाभ पर केंद्रित दिखता है। आर्थिक समानता और गांव-केंद्रित विकास जैसे मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं। फिर भी, सामाजिक न्याय की बात निरंतर बनी हुई है।
लोहिया की पुण्यतिथि पर यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या उनकी विचारधारा सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित रह गई है या व्यवहार में उतर रही है। अखिलेश यादव PDA को लोहिया की विरासत बताते हैं, लेकिन आलोचक इसे सीमित जातीय राजनीति मानते हैं।
12 अक्टूबर 2026 को जब देश लोहिया को याद कर रहा है, तब समाजवादी राजनीति के सामने चुनौती यह है कि वह केवल चुनावी फॉर्मूले तक सीमित रहे या लोहिया के सप्त-क्रांति और सच्चे समानता के सपने को फिर से जीवंत करे। विचारधारा का सार वही है – अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को सम्मान और अधिकार दिलाना। लेकिन उसका रूप समय के साथ बदल गया है।

