असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा देशभर में रावण दहन के साथ मनाया जाता है। लेकिन राजगढ़ जिले के किला अमरगढ़ गांव में रावण के अंत की परंपरा अलग है। यहां रावण का पुतला जलाया नहीं जाता, बल्कि भगवान राम उसकी नाभि में तीर मारकर उसका वध करते हैं। तीर लगते ही प्रतिमा के भीतर रखा मटका फूटता है और नाभि से लाल रंग बाहर निकलता है। इसी दृश्य के साथ रावण का अंत माना जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा करीब 300 साल से चली आ रही है। रियासत काल से गोगढ़िया नाले के किनारे हैं प्रतिमाएं राजस्थान सीमा के पास स्थित किला अमरगढ़ गांव में गोगढ़िया नाले के किनारे रावण और उसके परिवार की प्रतिमाएं स्थापित हैं। ग्रामीणों के अनुसार, ये प्रतिमाएं रियासत काल से यहां मौजूद हैं। दशहरे से पहले हर साल इनका रंग-रोगन किया जाता है। सरपंच गजराज सिंह तंवर ने बताया कि दशहरे पर राम मंदिर से विमान के साथ चल समारोह निकलता है। यह समारोह गोगढ़िया नाले के किनारे पहुंचता है, जहां भगवान राम रावण की नाभि में तीर मारते हैं। दरबार में मंदोदरी, मेघनाद और विभीषण भी किला अमरगढ़ में केवल रावण की प्रतिमा ही नहीं, बल्कि उसके परिवार के कई सदस्यों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। रावण की पत्नी मंदोदरी, बेटे मेघनाद और भाई विभीषण सहित परिवार के अन्य सदस्यों को दरबार में बैठे हुए दर्शाया गया है। वहीं कुंभकरण की प्रतिमा लेटी हुई मुद्रा में है। इन प्रतिमाओं की ऊंचाई करीब 12 से 15 फीट है। दशहरे से पहले इनका रंग-रोगन किया जाता है। देश-विदेश से गांव पहुंचते हैं राज परिवार के सदस्य किला अमरगढ़ के राज परिवार के सदस्य अजय सिंह ने बताया कि रियासत काल से चली आ रही इस परंपरा से गांव के लोगों का गहरा जुड़ाव है। परिवार के कई सदस्य इंदौर, मुंबई, बेंगलुरु और विदेश में रहते हैं, लेकिन दशहरे पर गांव पहुंचकर सामूहिक रूप से पर्व मनाने का प्रयास करते हैं। अजय सिंह के अनुसार, रियासत काल में किला अमरगढ़ राजगढ़ की जागीर हुआ करता था। उसी समय से यहां ये प्रतिमाएं स्थापित हैं और परिवार हर साल दशहरा मनाने गांव आता है।

