उदयपुर के ऋषभदेव मंदिर और सलूंबर के ईडाणा माता मंदिर की सूरत जल्द ही बदलने वाली है। उदयपुर सांसद डॉ. मन्ना लाल रावत ने इन दोनों प्रसिद्ध मंदिरों को केंद्र सरकार की ‘प्रसाद योजना’ में शामिल कराने के लिए डिप्टी सीएम दीया कुमारी और पर्यटन सचिव को पत्र लिखा है। सांसद ने राज्य सरकार से इसका प्रस्ताव जल्द केंद्र को भेजने का आग्रह किया है। हाल ही में केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी इस पर अपनी सहमति दे दी है। अब राज्य सरकार की हरी झंडी मिलते ही इन मंदिरों के कायाकल्प का काम शुरू हो सकेगा। क्या है ‘प्रसाद’ योजना और इससे क्या बदलेगा?
‘प्रसाद’ (PRASAD) केंद्र सरकार की एक बेहद खास योजना है। इसका पूरा नाम ‘तीर्थयात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक संवर्धन अभियान’ है। इसके तहत देश के चुनिंदा धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का विकास किया जाता है। इस योजना में शामिल होने के बाद मंदिरों के आसपास विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाती हैं। इसमें शानदार सड़कें, बिजली, पानी, ठहरने के लिए धर्मशालाएं, सुरक्षा व्यवस्था, पार्किंग, शौचालय और सौंदर्यीकरण के काम सीधे केंद्र सरकार के बजट से किए जाते हैं। क्यों है इन स्थलों पर विकास की जरूरत?
सांसद डॉ. रावत ने अपने पत्र में बताया कि इन दोनों स्थलों पर हर साल देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। इतनी बड़ी संख्या में आने वाले लोगों के लिए वर्तमान सुविधाएं नाकाफी हैं। ईडाणा माता मंदिर में नवरात्रि के दौरान भारी भीड़ होती है, जिसके लिए बड़ी पार्किंग, पेयजल, स्वच्छता, प्रतीक्षालय और दिव्यांगों के अनुकूल सुविधाओं की जरूरत है। वहीं केसरियाजी में भी विरासत संरक्षण और सौंदर्यीकरण के क्षेत्र में व्यापक काम करने की आवश्यकता है। पर्यटन और स्थानीय रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
सांसद का कहना है कि इन दोनों पवित्र स्थलों का व्यवस्थित विकास होने से न केवल श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि पूरे दक्षिणी राजस्थान में धार्मिक पर्यटन को नई ऊंचाई मिलेगी। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। हस्तशिल्प, होटल, परिवहन और छोटे व्यापारियों के लिए कमाई के नए रास्ते खुलेंगे, जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। दोनों मंदिरों का इतिहास और महत्व चमत्कारी ‘अग्नि स्नान’ वाली ईडाणा माता – सलूंबर जिले में स्थित ईडाणा माता मंदिर पूरे मेवाड़ में अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि देवी मां खुश होने पर खुद ही अग्नि स्नान करती हैं। इस दौरान मंदिर में अचानक भीषण आग धधक उठती है और माता की मूर्ति को छोड़कर बाकी सारा चढ़ावा जलकर भस्म हो जाता है। इस अद्भुत नजारे को देखने और दर्शन के लिए हर साल देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल केसरियाजी – ऋषभदेव मंदिर (केसरियाजी) देश में सांप्रदायिक सौहार्द का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां जैन समाज के लोग इन्हें प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के रूप में पूजते हैं, तो वैष्णव हिंदू इन्हें भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं। वहीं स्थानीय भील आदिवासी इन्हें ‘कालाजी’ के रूप में पूजते हैं। मंदिर में भगवान को भारी मात्रा में केसर चढ़ाया जाता है, जिससे इन्हें केसरियाजी भी कहा जाता है। यहां का 800 साल पुराना ऐतिहासिक रथ और रथोत्सव भी बेहद प्रसिद्ध है।

