सोनीपत में पुलिस जांच अधिकारी (IO) द्वारा चालान पेश करने के दौरान की गई एक गलती के कारण मारपीट के एक साधारण मामले में कानूनी पेंच फंस गया। पुलिस ने केस के चालान में BNS की धारा 238(a) लगा दी। इसकी वजह से इलाका मजिस्ट्रेट को केस को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए सुनवाई के लिए सत्र अदालत (सेशन कोर्ट) को ट्रांसफर (Commit) करना पड़ा था। हालांकि, सोनीपत के जिला एवं सत्र न्यायाधीश (सेशन) जगजीत सिंह की कोर्ट ने मामले की गहन समीक्षा के दौरान पुलिस से हुई इस कानूनी गलती को पकड़ लिया। कोर्ट ने माना कि इसमें धारा 238(a) नहीं बल्कि धारा 238(C) लागू होती है। इसके बाद केस को सुनवाई के लिए वापस इलाका मजिस्ट्रेट की कोर्ट में भेज दिया है। मामले में तीनों आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं। क्या था पूरा मामला और जानें पुलिस से कहां हुई चूक? यह पूरा मामला 30 जनवरी 2025 को सोनीपत के थाना कुंडली क्षेत्र के अंतर्गत हुई मारपीट की घटना से जुड़ा हुआ है। 22 फरवरी, 2025 को दर्ज हुई FIR नंबर 135 में दिल्ली की रहने वाली शिकायतकर्ता पूजा ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि उनकी बेटी के पति इकबाल, ससुर बलवान, देवर शमशेर और उनके साथी ने उन पर डंडों व हॉकी स्टिक से बर्बर हमला किया था। इस हमले में उसके दोनों हाथों की हड्डियां टूट गई थीं (फ़्रैक्चर) और परिजनों को गंभीर चोटें आई थीं। उनकी बेटी ने उनको फोन किया था कि उसके ससुराल वाले उसे जान से मारने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद वे दिल्ली से कुंडली क्षेत्र में स्थित बेटी के मायके आए थे। वहां उ पर हमला किया गया। पुलिस ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपियों इकबाल, शमशेर, बलवान व नितिन के खिलाफ BNS की धारा 115(2) (चोट पहुंचाना), 117(2) (गंभीर चोट/हड्डी तोड़ना), 351(3) (जान से मारने की धमकी) और 3(5) के तहत केस दर्ज किया था। जांच अधिकारी (IO) की गलती: जांच पूरी करने के बाद जब पुलिस IO ने कोर्ट में चार्जशीट/चालान पेश किया, तो उसमें BNS की धारा 238(a) भी शामिल कर दी गई। चूंकि कानून के मुताबिक BNS की धारा 238(a) केवल सत्र न्यायालय (Court of Sessions) द्वारा विचारणीय (Triable) होती है। इलाका मजिस्ट्रेट ने 19 सितंबर 2026 को इस केस को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए आगे की सुनवाई के लिए सत्र अदालत को ट्रांसफर कर दिया था। जब केस फाइल सोनीपत के जिला एवं सत्र न्यायाधीश जगजीत सिंह के समक्ष आई, तो उन्होंने चालान और दस्तावेजों का बारीक कानूनी अध्ययन किया और गलती पकड़ ली। सेशन कोर्ट में सुनवाई: धारा 238(a) नहीं, 238(c) होती है लागू सत्र न्यायाधीश जगजीत सिंह ने पाया कि पुलिस द्वारा लगाई गई धारा 238(a) इस मामले पर लागू ही नहीं होती है। कोर्ट के अनुसार BNS की धारा 238(a) (अपराधी को बचाने या साक्ष्य मिटाने) केवल उन मामलों में लागू होती है, जहां मुख्य अपराध में मृत्युदंड (Death Penalty) की सजा का प्रावधान हो। मारपीट के इस मामले में आरोपियों पर दर्ज मुख्य अपराधों में अधिकतम सजा 10 वर्ष से कम की कैद है। ऐसे मामलों में साक्ष्य मिटाने या आरोपी को बचाने पर धारा 238(c) लागू होती है, न कि 238(a)। केस में अन्य सभी धाराएं पूरी तरह से इलाका मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीयहैं। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि चालान में केवल गलत धारा लिख देने मात्र ये केस सेशन कोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं बन जाता। 22 अक्टूबर को केस वापस इलाका मजिस्ट्रेट को ट्रांसफर सत्र अदालत ने माना कि इलाका मजिस्ट्रेट द्वारा इस केस को सेशन कोर्ट में कमिट किया जाना कानूनी रूप से गलत था। 22 अक्टूबर 2026 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश जगजीत सिंह ने केस की मूल फाइल और पूरा रिकॉर्ड तुरंत संबंधित इलाका मजिस्ट्रेट को वापस ट्रांसफर करने के आदेश जारी कर दिए। 30 अक्टूबर को इलाका मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुनवाई इस मामले में नामजद आरोपी इकबाल, शमशेर, बलवान व नितिन फिलहाल जमानत पर हैं। कोर्ट ने सभी आरोपियों और उनके वकीलों को आगे की कानूनी सुनवाई के लिए 30 अक्टूबर 2026 को इलाका मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया है।

