बालाघाट में हरितालिका तीज का निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं और युवतियों ने रातभर आराधना की। उन्होंने घरों में सुंदर मंडप के नीचे गौर को विराजित कर विधि-विधान से पूजा की। पूजा में व्रतधारी महिलाओं ने पांच तरह के व्यंजन चढ़ाए। उन्होंने रेत से भगवान शंकर और पार्वती की प्रतिमा बनाकर हल्दी, कुमकुम, चंदन, बेलपत्र, फल और सुहाग की सामग्री अर्पित की। शुभ मुहूर्त पर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन कर अपनी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद मांगा। महिलाओं ने पूरी रात रतजगा किया। इसके बाद मंगलवार को भक्तिभाव के साथ सरोवरों में गौर का विसर्जन कर अपना व्रत तोड़ा। महिलाओं ने नगर के वैनगंगा नदी स्थित छोटे पुलिया, जागपुरघाट, गायखुरी और देवटोला सहित जिले के पवित्र नदी किनारों पर गौर का विधिवत पूजन कर विसर्जन किया। विसर्जन के बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को कुमकुम लगाकर सुहाग की सलामती का आशीर्वाद लिया। हिंदू परंपरा के अनुसार, पति की लंबी आयु के लिए महिलाएं यह व्रत रखती हैं। हरितालिका तीज का व्रत निर्जला किया जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को यह व्रत होता है। मान्यता है कि जो सुहागन महिलाएं यह व्रत करती हैं, उनके पति की आयु लंबी होती है। कुंवारी कन्याएं भी भगवान शिव जैसा वर पाने के लिए यह व्रत करती हैं। हरितालिका तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट रिश्ते का प्रतीक है। चार पहर की इस पूजा में सोमवार को सुबह गौर पूजन के साथ पहले पहर की पूजा की गई थी। मान्यता है कि इस दिन गौरी-शंकर की विधि-विधान से पूजा करने से अखंड सौभाग्य मिलता है। यह एक कठिन और सबसे लंबी अवधि का व्रत है। यह सूर्योदय से शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय तक बिना कुछ खाए-पिए किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए यह कठिन व्रत किया था।

