बीमा क्षेत्र में प्रस्तावित नए कमीशन नियमों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। देश के बीमा ब्रोकरों के संगठन ने अब सीधे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के सामने अपनी आपत्ति रखी है। संगठन का कहना है कि बीमा नियामक के प्रस्तावित बदलावों से रोजगार पर असर पड़ सकता है, गलत तरीके अपनाने का खतरा बढ़ सकता है और विदेशी निवेशकों के बीच भी चिंता पैदा हो सकती है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, भारतीय बीमा ब्रोकर संघ ने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को भेजे पत्रों में भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के प्रस्तावों पर चिंता जताई है। नियामक ने सितंबर के अंत में जारी चर्चा पत्र में बीमा बेचने पर मिलने वाले कमीशन के तरीके में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है। इसमें बैंकों, बीमा ब्रोकरों और एजेंटों को दिए जाने वाले कमीशन पर सीमा लगाने की बात शामिल है।
बता दें कि नियामक का प्रस्ताव बीमा उत्पाद की जटिलता और उसे बेचने में लगने वाली मेहनत के आधार पर कमीशन तय करने पर केंद्रित है। अनिवार्य बीमा जैसे तीसरे पक्ष के वाहन बीमा पर बहुत कम या कोई कमीशन नहीं देने का सुझाव है। नियामक का कहना है कि इस बदलाव का मकसद बीमा की लागत को कम करना और इसका फायदा सीधे ग्राहकों तक पहुंचाना है।
लेकिन बीमा ब्रोकर संघ इस सोच से सहमत नहीं है। संगठन का तर्क है कि अगर कमीशन पर सख्त सीमा लगा दी गई तो इसका पैसा ग्राहकों तक पहुंचने के बजाय बीमा कंपनियों के मालिकों के पास जा सकता है। संघ का कहना है कि प्रस्ताव में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो बीमा कंपनियों को कमीशन से होने वाली बचत का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए बाध्य करे।
रोजगार को लेकर भी संगठन ने गंभीर चिंता जताई है। भारतीय बीमा ब्रोकर संघ का अनुमान है कि प्रस्तावित नियमों के कारण अगले 5 वर्षों में कम से कम 1 मिलियन नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। खास बात यह है कि इस अनुमान में बीमा कंपनियों के सीधे वेतन पाने वाले कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया है। यानी असर ब्रोकरों, एजेंटों और वितरण व्यवस्था से जुड़े दूसरे लोगों पर ज्यादा पड़ने की आशंका जताई गई है।
गौरतलब है कि संगठन को एक और खतरा कमीशन की सीमा से बचने के लिए नए रास्ते अपनाए जाने का है। उसका कहना है कि अगर कंपनियों पर बहुत सख्त सीमा लगाई गई तो कुछ बीमा कंपनियां अतिरिक्त कमीशन को दूसरे खर्चों के नाम पर दिखा सकती हैं। उदाहरण के तौर पर अधिक भुगतान को प्रचार शुल्क के रूप में दिखाकर नियमों से बचने की कोशिश हो सकती है। इससे पारदर्शिता बढ़ने के बजाय व्यवस्था में गलत तरीकों को बढ़ावा मिलने का खतरा पैदा हो सकता है।
विदेशी निवेश को लेकर भी संघ ने समय को महत्वपूर्ण बताया है। बीमा क्षेत्र में हाल ही में 100% विदेशी निवेश की अनुमति दिए जाने के कुछ ही महीनों बाद वितरण व्यवस्था में इतना बड़ा बदलाव विदेशी कंपनियों को नियामकीय अनिश्चितता का संकेत दे सकता है। संघ का मानना है कि इससे भारत में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के फैसलों पर असर पड़ सकता है।
भारतीय बीमा ब्रोकर संघ ने मांग की है कि कमीशन पर कोई सख्त सीमा लगाने से पहले इसके प्रभाव का सार्वजनिक अध्ययन कराया जाए। इसमें ग्राहकों, रोजगार, सरकारी बीमा कंपनियों और विदेशी निवेश पर पड़ने वाले असर को शामिल करने की मांग की गई है।
संगठन ने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से मुलाकात का समय भी मांगा है। साथ ही उसने मौजूदा कमीशन व्यवस्था को 2028 में होने वाली निर्धारित समीक्षा तक जारी रखने की मांग की है। नियामक ने चर्चा पत्र पर सभी संबंधित पक्षों से 25 अक्टूबर तक सुझाव मांगे हैं। अब आगे की प्रक्रिया में बीमा कंपनियों, ब्रोकरों, एजेंटों और अन्य पक्षों की राय के आधार पर यह तय होगा कि प्रस्तावित बदलाव किस रूप में लागू किए जाते हैं।

