भागीरथपुरा कांड में दोषियों पर FIR की मांग:…तो भुगतनी होगी 10 साल से उम्रकैद; मुआवजा बढ़ाने और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की अपील

भागीरथपुरा कांड में दोषियों पर FIR की मांग:…तो भुगतनी होगी 10 साल से उम्रकैद; मुआवजा बढ़ाने और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की अपील

भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में हाईकोर्ट के समक्ष पेश की गई जांच रिपोर्ट के बाद एक बार फिर जिम्मेदारों की जवाबदेही और पीड़ित परिवारों के मुआवजे का मुद्दा उठ गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद कहा कि इसमें कुछ लोगों को जिम्मेदार माना गया है, जबकि कुछ को क्लीनचिट दी गई है। रिपोर्ट में मुआवजे को लेकर भी सिफारिशें की गई हैं। अधिवक्ताओं का कहना है कि रिपोर्ट काफी विस्तृत है। फिलहाल उसका केवल अवलोकन किया गया है। पूरी प्रति मिलने के बाद इसमें दर्ज बयानों, दस्तावेजों और निष्कर्षों का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा। यदि किसी बिंदु पर रिपोर्ट से असहमति सामने आती है तो उसे भी हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी जाएगी। 36 मौतों के मामले में अब FIR की मांग एडवोकेट मनीष यादव ने कहा कि इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ FIR कब दर्ज होगी। उनके मुताबिक दूषित पानी से 36 लोगों की मौत का मामला है और जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की भूमिका सामने आती है, उनके खिलाफ FIR दर्ज कर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। आम घटनाओं में पुलिस तत्काल प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू करती है, लेकिन इतने गंभीर मामले में अब तक FIR नहीं होना सवाल खड़ा करता है। पूरी रिपोर्ट मिलने के बाद होगी विस्तृत जांच यादव के मुताबिक हाईकोर्ट के आदेश के बाद उन्हें और अन्य याचिकाकर्ताओं के वकीलों को रिपोर्ट का अवलोकन करने का अवसर मिला है। रिपोर्ट काफी बड़ी है, इसलिए एक नजर में उसका पूरा अध्ययन संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि रिपोर्ट में कुछ लोगों को जिम्मेदार माना गया है, कुछ को क्लीनचिट दी गई है और कई सुझाव व सिफारिशें भी हैं। इसलिए अब हाईकोर्ट में आवेदन देकर रिपोर्ट की पूरी प्रति मांगी गई है। पूरी रिपोर्ट मिलने के बाद यह देखा जाएगा कि किन लोगों को जिम्मेदार माना गया है, किस आधार पर किसी को क्लीनचिट दी गई और क्या किसी ऐसे व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, जिसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। पोस्टमार्टम नहीं होने पर भी उठे सवाल एडवोकेट मनीष यादव ने मृतकों के पोस्टमार्टम और मेडिकल प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब मौतें संदिग्ध परिस्थितियों में हो रही थीं और दूषित पानी से बीमारी फैलने की बात सामने आ रही थी, तब मृतकों का पोस्टमार्टम कराया जाना चाहिए था। उनके मुताबिक अब जब जांच रिपोर्ट में 24 मौतों को दूषित पानी की घटना से जोड़े जाने की बात सामने आई है, तब यह पहलू और महत्वपूर्ण हो गया है। यदि आवश्यक मेडिकल और पोस्टमार्टम प्रक्रिया नहीं अपनाई गई तो इसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। मुआवजा बढ़ाने की मांग जांच रिपोर्ट में मृतकों के परिजनों को दिए जाने वाले मुआवजे को बढ़ाने की संभावना पर भी चर्चा की गई है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना है कि जिन परिवारों ने अपने सदस्य खोए हैं, उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए। वहीं, हादसे में बीमार हुए लोगों के इलाज के लिए 5 लाख रुपए तक की सहायता की बात भी सामने आई है। वकीलों का कहना है कि किसी इंसान की जिंदगी की कीमत नहीं लगाई जा सकती, लेकिन प्रभावित परिवारों को पर्याप्त आर्थिक सहायता देना सरकार की जिम्मेदारी है। टेंडर में देरी को हादसे से जोड़ा याचिकाकर्ता एडवोकेट रितेश इनानी ने भी जांच रिपोर्ट के अवलोकन के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया कुछ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आ रही है। उनके मुताबिक जिस पाइपलाइन को लेकर पहले से समस्या सामने आ चुकी थी, उसे बदलने का टेंडर हो चुका था और एमआईसी से मंजूरी भी मिल गई थी। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाना अधिकारियों की जिम्मेदारी थी। इनानी ने कहा कि जांच आयोग ने प्रथम दृष्टया माना है कि यदि टेंडर प्रक्रिया में देरी नहीं होती तो संभवत: हादसा टाला जा सकता था। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जांच आयोग की रिपोर्ट अंतिम फैसला नहीं है। सभी तथ्यों और पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट को अंतिम आदेश पारित करना है। क्लीनचिट पर भी उठेंगे सवाल इनानी के मुताबिक रिपोर्ट में कुछ लोगों को जिम्मेदार माना गया है, जबकि कुछ को क्लीनचिट दी गई है। अब यह देखना जरूरी है कि क्लीनचिट किन तथ्यों, बयानों और दस्तावेजों के आधार पर दी गई। रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग याचिकाकर्ता एडवोकेट प्रमोद कुमार द्विवेदी ने जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह मामला सीधे जनता से जुड़ा है और इसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है। ऐसे में आम जनता को यह जानने का अधिकार है कि घटना के लिए कौन जिम्मेदार है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अन्य संवेदनशील मामलों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो सकती है तो भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की रिपोर्ट सार्वजनिक करने में क्या आपत्ति है। उनके मुताबिक मृतकों के आश्रितों को पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए और जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे अधिकारियों की भूमिका भी सामने आनी चाहिए। जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे समाज और शहर की आवाज को कोर्ट तक पहुंचाएं। अब हाईकोर्ट में इन मुद्दों पर फोकस भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में अब लड़ाई सिर्फ जांच रिपोर्ट तक सीमित नहीं है। याचिकाकर्ताओं की ओर से FIR, रिपोर्ट सार्वजनिक करने, मौतों के आंकड़े स्पष्ट करने, जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करने और मुआवजा बढ़ाने की मांग की जा रही है। हालांकि जांच आयोग की रिपोर्ट में तय की गई जिम्मेदारियों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। पूरी रिपोर्ट का अध्ययन होने के बाद याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष अपने आपत्तियां और नए तथ्य रखेंगे। अंतिम स्थिति हाईकोर्ट के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी। ये खबर भी पढ़ें… 24 मौतें दूषित पानी से, सिर्फ 2 अधिकारी दोषी मध्यप्रदेश के इंदौर में भागीरथपुरा के चर्चित दूषित पानी कांड में 36 मौतों की जांच के लिए गठित हाईकोर्ट की एक सदस्यीय न्यायिक समिति की रिपोर्ट में दो अधिकारियों की जिम्मेदारी तय किए जाने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाइपलाइन बदलने और टेंडर प्रक्रिया में देरी को हादसे की बड़ी वजह माना गया है।पूरी खबर पढ़ें

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