इंदौर के भागीरथपुरा में 26 दिसंबर 2025 से 25 फरवरी 2026 के बीच दूषित पानी ने 36 मौत हुई थीं। करीब 6 महीने बाद इस त्रासदी की जांच रिपोर्ट पर हाईकोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई होगी। 600 से ज्यादा पन्नों की सीलबंद रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर सकता है। इस त्रासदी के लिए गठत आयोग ने 20 अगस्त को अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी थी। वहीं एक याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है। भागीरथपुरा में दूषित पानी से मौत के कारण देश का सबसे स्वच्छ शहर इंदौर देशभर में सुर्खियों में रहा था। इस मामले की जांच के लिए हाईकोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में आयोग गठित कर रिपोर्ट मांगी थी। आयोग को दूषित पानी के कारणों के साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका, प्रभावित लोगों को राहत और मुआवजे समेत विभिन्न पहलुओं की जांच करनी थी। पानी दूषित कैसे हुआ, मौतों से क्या कनेक्शन? आयोग ने यह पता लगाने के लिए कई स्तरों पर जानकारी जुटाई कि भागीरथपुरा में पेयजल दूषित कैसे हुआ। जांच में यह भी देखा गया कि क्या सीवेज का पानी पेयजल पाइपलाइन में मिला था, पाइपलाइन की तकनीकी खराबी या क्षति की क्या भूमिका रही और औद्योगिक प्रदूषण का कोई संबंध था या नहीं। इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह भी जांचा गया कि दूषित पानी से कितने लोग बीमार हुए और 36 मौतों में कितनी का सीधा संबंध दूषित पानी से था। निगम से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक के रिकॉर्ड खंगाले आयोग ने इंदौर नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग समेत संबंधित विभागों से दस्तावेज लिए। प्रभावित लोगों से बयान भी लिए गए। घटना के दौरान राहत, उपचार और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की भी समीक्षा की गई। अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में जांच केवल दूषित पानी के स्रोत तक सीमित नहीं रही। संबंधित अधिकारियों और मैदानी अमले की जिम्मेदारी भी जांची गई। तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप यादव, तत्कालीन अपर कमिश्नर रोहित सिसोनिया, कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव और स्थानीय पार्षद कमल वाघेला समेत अन्य अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में रही। हालांकि रिपोर्ट अभी सीलबंद है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि आयोग ने इनमें से किसी को जिम्मेदार ठहराया है या नहीं। मुआवजे पर भी नजर आयोग ने प्रभावित परिवारों के लिए राहत और मुआवजे के पहलू की भी जांच की है। अब रिपोर्ट में मौतों और बीमारी के कारणों को लेकर सामने आने वाले निष्कर्षों के आधार पर मुआवजे का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो सकता है। राजनीतिक मुद्दा भी बना था भागीरथपुरा कांड भागीरथपुरा की घटना के बाद प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर जमकर सवाल उठे थे। विपक्ष ने इसे लेकर सरकार और नगर निगम को घेरा था, वहीं सत्ता पक्ष की ओर से भी राहत और जांच की कार्रवाई का दावा किया गया था। 36 मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार होने के कारण मामला राजनीतिक रूप से भी काफी गरमाया था। जिम्मेदारी तय करने और पीड़ित परिवारों को पर्याप्त राहत देने की मांग लगातार उठती रही।

