भागलपुर- अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे, शव दफनाया:मजदूर की मौत के बाद चंदा भी नहीं जुटा पाया परिवार, पांच बच्चों का था पिता

भागलपुर- अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे, शव दफनाया:मजदूर की मौत के बाद चंदा भी नहीं जुटा पाया परिवार, पांच बच्चों का था पिता

भागलपुर के पन्नुचक में एक गरीब पिता के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं मिलीं। परिवार को मजबूरन अधजले शव को दफनाना पड़ा। मंगल ऋषि नाम के इस व्यक्ति की 18 अक्टूबर को मौत हो गई थी। वह ईंट-भट्ठे पर मजदूरी कर पांच बच्चों का पेट पालते थे। मंगल ऋषि के जाने के बाद परिवार के पास कफन और लकड़ियों का इंतजाम करने के पैसे नहीं थे। लोगों से चंदा मांगने पर भी पर्याप्त लकड़ियां नहीं जुट पाईं। इसके बाद परिजनों ने शव को गड्ढा खोदकर दफना दिया। यह मामला घोघा थाना क्षेत्र का है। मीडिया में खबर आने के बाद लोगों ने मदद की। संचिता बसु के परिवार और प्राची सेवा ट्रस्ट ने परिवार को 11 हजार रुपये और राशन दिया। जरा उस मंजर की कल्पना कीजिए…. एक तरफ घर के मुखिया का शव, दूसरी तरफ अंतिम संस्कार के लिए पैसों की कमी और तीसरी तरफ पत्नी, बच्चे तथा बुजुर्ग मां की बेबसी। जिन हाथों से कभी पिता ने अपने बच्चों को सहारा दिया होगा, उन्हीं बच्चों के सामने उनकी अंतिम विदाई भी अभावों की भेंट चढ़ गई। यह गरीबी का वह चेहरा है, जिसे देखकर सिर्फ आंखें नम नहीं होतीं, बल्कि इंसानियत के दावों पर भी सवाल उठते हैं। आखिर समाज में ऐसी कौन-सी कमी है कि एक मेहनतकश परिवार को इस हद तक लाचार होना पड़ा? पांच बच्चों के सिर से उठा पिता का साया, अब कौन थामेगा उनका हाथ? मंगल ऋषि अपने पीछे पत्नी सोनी देवी, बुजुर्ग मां और पांच बच्चों को छोड़ गए हैं। इनमें तीन बेटियां भी शामिल हैं। पिता की मौत के बाद इन बच्चों के सामने सिर्फ भावनात्मक दुख नहीं, बल्कि जिंदगी की बुनियादी जरूरतों का संकट भी खड़ा हो गया है।कल तक जिन बच्चों के लिए पिता मेहनत-मजदूरी करके रोटी जुटाते थे, आज उन्हीं बच्चों के सामने सवाल है कि अगली सुबह घर में चूल्हा कैसे जलेगा? स्कूल की पढ़ाई कैसे चलेगी? कपड़े, दवा और दूसरी जरूरतें कौन पूरी करेगा? पति को खो चुकी सोनी देवी के सामने अब पांच बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी है। एक मां के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि वह अपने बच्चों की आंखों में भविष्य के सपने तो देखे, लेकिन उन सपनों को पूरा करने का रास्ता उसके सामने धुंधला हो? बुजुर्ग मां ने अपना बेटा खो दिया और बच्चों ने अपना पिता। इस घर में एक मौत ने कई जिंदगियों की खुशियां छीन लीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस परिवार को कुछ दिनों का राशन मिलने के बाद आगे क्या होगा? गंगा ने छीनी जमीन, गरीबी ने छीना सहारा इस परिवार की बदहाली की कहानी आज की नहीं है। परिजनों के मुताबिक, वर्षों पहले गंगा की कटान में उनकी जमीन प्रभावित हुई थी। इसके बाद उन्हें अपना पुराना ठिकाना छोड़ना पड़ा। आज परिवार दूसरे की जमीन पर रहने को मजबूर है। न अपनी जमीन, न पक्का मकान और न कमाई का कोई स्थायी साधन। एक ओर प्राकृतिक आपदा ने परिवार की जड़ों को कमजोर किया, दूसरी ओर आर्थिक तंगी ने उनकी जिंदगी को संघर्ष बना दिया। मंगल ऋषि मजदूरी करके किसी तरह परिवार को संभाल रहे थे। उनकी मौत ने उस आखिरी सहारे को भी छीन लिया, जिसके भरोसे घर की जिंदगी चल रही थी। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन गरीब परिवारों की पीड़ा की तस्वीर है, जो हर दिन मेहनत करते हैं, फिर भी संकट की घड़ी में बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हो जाते हैं। मीडिया में खबर चली तो जागी संवेदना, मदद को पहुंचा संचिता बसु का परिवार मंगल ऋषि के अंतिम संस्कार की दर्दनाक कहानी जब मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंची, तो समाज के कुछ संवेदनशील लोगों ने परिवार की सुध ली। फिल्म अभिनेत्री संचिता बसु के परिवार की ओर से प्राची सेवा ट्रस्ट ने मदद का हाथ बढ़ाया। ट्रस्ट के सदस्य पन्नुचक पहुंचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात की। उन्होंने परिवार को 11 हजार रुपये की आर्थिक सहायता और राशन सामग्री उपलब्ध कराई। दुख से टूटे परिजनों को ढांढस बंधाया और आगे भी हरसंभव मदद करने का भरोसा दिया। इससे पहले स्थानीय मुखिया की ओर से भी परिवार को राशन सामग्री उपलब्ध कराई गई थी। मदद के इन हाथों ने परिवार को कुछ राहत जरूर दी है। लेकिन सवाल यह है कि जिस घर में कमाने वाला ही नहीं रहा, वहां 11 हजार रुपये और कुछ दिनों का राशन आखिर कितने दिन तक सहारा दे पाएगा? मदद करने वालों की संवेदना सराहनीय है, लेकिन एक गरीब परिवार की ऐसी दुर्दशा केवल दान-दक्षिणा के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। उसे अधिकार, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अवसर भी मिलना चाहिए। समाज से सवाल- खबर खत्म होने के बाद क्या इस परिवार का दर्द भी खत्म हो जाएगा? मंगल ऋषि की मौत के बाद जो हुआ, वह समाज के सामने कई सवाल छोड़ गया है। क्या गरीब परिवारों के लिए सम्मानजनक अंतिम संस्कार की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए? क्या ऐसे परिवारों की पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जिम्मेदारी किसी की नहीं है? क्या पांच बच्चों का भविष्य सिर्फ इसलिए अंधेरे में चला जाए कि उनके पिता गरीब थे और अब इस दुनिया में नहीं हैं? परिवार को उम्मीद है कि बिहार सरकार, स्थानीय जनप्रतिनिधि और पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव उनकी मदद के लिए आगे आएंगे। जरूरत है कि परिवार की आर्थिक स्थिति का आकलन कर उसे पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाए। बच्चों की पढ़ाई जारी रखने, भोजन और स्वास्थ्य की जरूरतें पूरी करने तथा सोनी देवी के लिए आजीविका का स्थायी साधन उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस पहल हो।क्योंकि किसी परिवार को एक दिन का राशन देना मानवीय मदद है, लेकिन उसे इस स्थिति से बाहर निकालना सामाजिक जिम्मेदारी है। सबसे बड़ा सवाल गरीब को जीने का सम्मान मिलेगा या नहीं? पन्नुचक की यह घटना उन लोगों की संवेदनाओं को झकझोरने के लिए काफी है, जो समाज में इंसानियत और विकास की बातें करते हैं। विकास की असली कसौटी केवल बड़ी इमारतें, चमकती सड़कें और ऊंचे दावे नहीं हैं। उसकी असली पहचान यह भी है कि समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति संकट में कितना सुरक्षित है और उसकी मौत के बाद उसके परिवार को कितना सहारा मिलता है। मंगल ऋषि अब लौटकर नहीं आएंगे। उनके बच्चे अपने पिता को दोबारा नहीं देख सकेंगे। सोनी देवी का जीवन भी पहले जैसा नहीं रहेगा। लेकिन अभी भी समाज और व्यवस्था के पास इतना अवसर है कि इन बच्चों का भविष्य बचाया जा सके। जिस पिता को जीते-जी परिवार पालने के लिए मजदूरी करनी पड़ी और मरने के बाद जिसके अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां तक न जुट सकीं, उसके बच्चों को कम से कम ऐसी जिंदगी तो मिलनी चाहिए, जिसमें रोटी, पढ़ाई और सम्मान के लिए उन्हें दर-दर भटकना न पड़े। आज पन्नुचक का यह परिवार मदद की उम्मीद में है। सवाल केवल यह नहीं कि किसने 11 हजार रुपये दिए; सवाल यह है कि क्या हम सब मिलकर इस परिवार को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी उठाएंगे?
क्योंकि किसी गरीब के घर में चूल्हा न जलना केवल उस परिवार की त्रासदी नहीं, पूरे समाज की संवेदनहीनता पर सवाल है। और किसी पिता को अंतिम विदाई के लिए लकड़ियां न मिलना ऐसी पीड़ा है, जिसे देखकर इंसानियत को खुद से जवाब मांगना चाहिए। भागलपुर के पन्नुचक में एक गरीब पिता के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं मिलीं। परिवार को मजबूरन अधजले शव को दफनाना पड़ा। मंगल ऋषि नाम के इस व्यक्ति की 18 अक्टूबर को मौत हो गई थी। वह ईंट-भट्ठे पर मजदूरी कर पांच बच्चों का पेट पालते थे। मंगल ऋषि के जाने के बाद परिवार के पास कफन और लकड़ियों का इंतजाम करने के पैसे नहीं थे। लोगों से चंदा मांगने पर भी पर्याप्त लकड़ियां नहीं जुट पाईं। इसके बाद परिजनों ने शव को गड्ढा खोदकर दफना दिया। यह मामला घोघा थाना क्षेत्र का है। मीडिया में खबर आने के बाद लोगों ने मदद की। संचिता बसु के परिवार और प्राची सेवा ट्रस्ट ने परिवार को 11 हजार रुपये और राशन दिया। जरा उस मंजर की कल्पना कीजिए…. एक तरफ घर के मुखिया का शव, दूसरी तरफ अंतिम संस्कार के लिए पैसों की कमी और तीसरी तरफ पत्नी, बच्चे तथा बुजुर्ग मां की बेबसी। जिन हाथों से कभी पिता ने अपने बच्चों को सहारा दिया होगा, उन्हीं बच्चों के सामने उनकी अंतिम विदाई भी अभावों की भेंट चढ़ गई। यह गरीबी का वह चेहरा है, जिसे देखकर सिर्फ आंखें नम नहीं होतीं, बल्कि इंसानियत के दावों पर भी सवाल उठते हैं। आखिर समाज में ऐसी कौन-सी कमी है कि एक मेहनतकश परिवार को इस हद तक लाचार होना पड़ा? पांच बच्चों के सिर से उठा पिता का साया, अब कौन थामेगा उनका हाथ? मंगल ऋषि अपने पीछे पत्नी सोनी देवी, बुजुर्ग मां और पांच बच्चों को छोड़ गए हैं। इनमें तीन बेटियां भी शामिल हैं। पिता की मौत के बाद इन बच्चों के सामने सिर्फ भावनात्मक दुख नहीं, बल्कि जिंदगी की बुनियादी जरूरतों का संकट भी खड़ा हो गया है।कल तक जिन बच्चों के लिए पिता मेहनत-मजदूरी करके रोटी जुटाते थे, आज उन्हीं बच्चों के सामने सवाल है कि अगली सुबह घर में चूल्हा कैसे जलेगा? स्कूल की पढ़ाई कैसे चलेगी? कपड़े, दवा और दूसरी जरूरतें कौन पूरी करेगा? पति को खो चुकी सोनी देवी के सामने अब पांच बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी है। एक मां के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि वह अपने बच्चों की आंखों में भविष्य के सपने तो देखे, लेकिन उन सपनों को पूरा करने का रास्ता उसके सामने धुंधला हो? बुजुर्ग मां ने अपना बेटा खो दिया और बच्चों ने अपना पिता। इस घर में एक मौत ने कई जिंदगियों की खुशियां छीन लीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस परिवार को कुछ दिनों का राशन मिलने के बाद आगे क्या होगा? गंगा ने छीनी जमीन, गरीबी ने छीना सहारा इस परिवार की बदहाली की कहानी आज की नहीं है। परिजनों के मुताबिक, वर्षों पहले गंगा की कटान में उनकी जमीन प्रभावित हुई थी। इसके बाद उन्हें अपना पुराना ठिकाना छोड़ना पड़ा। आज परिवार दूसरे की जमीन पर रहने को मजबूर है। न अपनी जमीन, न पक्का मकान और न कमाई का कोई स्थायी साधन। एक ओर प्राकृतिक आपदा ने परिवार की जड़ों को कमजोर किया, दूसरी ओर आर्थिक तंगी ने उनकी जिंदगी को संघर्ष बना दिया। मंगल ऋषि मजदूरी करके किसी तरह परिवार को संभाल रहे थे। उनकी मौत ने उस आखिरी सहारे को भी छीन लिया, जिसके भरोसे घर की जिंदगी चल रही थी। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन गरीब परिवारों की पीड़ा की तस्वीर है, जो हर दिन मेहनत करते हैं, फिर भी संकट की घड़ी में बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हो जाते हैं। मीडिया में खबर चली तो जागी संवेदना, मदद को पहुंचा संचिता बसु का परिवार मंगल ऋषि के अंतिम संस्कार की दर्दनाक कहानी जब मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंची, तो समाज के कुछ संवेदनशील लोगों ने परिवार की सुध ली। फिल्म अभिनेत्री संचिता बसु के परिवार की ओर से प्राची सेवा ट्रस्ट ने मदद का हाथ बढ़ाया। ट्रस्ट के सदस्य पन्नुचक पहुंचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात की। उन्होंने परिवार को 11 हजार रुपये की आर्थिक सहायता और राशन सामग्री उपलब्ध कराई। दुख से टूटे परिजनों को ढांढस बंधाया और आगे भी हरसंभव मदद करने का भरोसा दिया। इससे पहले स्थानीय मुखिया की ओर से भी परिवार को राशन सामग्री उपलब्ध कराई गई थी। मदद के इन हाथों ने परिवार को कुछ राहत जरूर दी है। लेकिन सवाल यह है कि जिस घर में कमाने वाला ही नहीं रहा, वहां 11 हजार रुपये और कुछ दिनों का राशन आखिर कितने दिन तक सहारा दे पाएगा? मदद करने वालों की संवेदना सराहनीय है, लेकिन एक गरीब परिवार की ऐसी दुर्दशा केवल दान-दक्षिणा के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। उसे अधिकार, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अवसर भी मिलना चाहिए। समाज से सवाल- खबर खत्म होने के बाद क्या इस परिवार का दर्द भी खत्म हो जाएगा? मंगल ऋषि की मौत के बाद जो हुआ, वह समाज के सामने कई सवाल छोड़ गया है। क्या गरीब परिवारों के लिए सम्मानजनक अंतिम संस्कार की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए? क्या ऐसे परिवारों की पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जिम्मेदारी किसी की नहीं है? क्या पांच बच्चों का भविष्य सिर्फ इसलिए अंधेरे में चला जाए कि उनके पिता गरीब थे और अब इस दुनिया में नहीं हैं? परिवार को उम्मीद है कि बिहार सरकार, स्थानीय जनप्रतिनिधि और पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव उनकी मदद के लिए आगे आएंगे। जरूरत है कि परिवार की आर्थिक स्थिति का आकलन कर उसे पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाए। बच्चों की पढ़ाई जारी रखने, भोजन और स्वास्थ्य की जरूरतें पूरी करने तथा सोनी देवी के लिए आजीविका का स्थायी साधन उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस पहल हो।क्योंकि किसी परिवार को एक दिन का राशन देना मानवीय मदद है, लेकिन उसे इस स्थिति से बाहर निकालना सामाजिक जिम्मेदारी है। सबसे बड़ा सवाल गरीब को जीने का सम्मान मिलेगा या नहीं? पन्नुचक की यह घटना उन लोगों की संवेदनाओं को झकझोरने के लिए काफी है, जो समाज में इंसानियत और विकास की बातें करते हैं। विकास की असली कसौटी केवल बड़ी इमारतें, चमकती सड़कें और ऊंचे दावे नहीं हैं। उसकी असली पहचान यह भी है कि समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति संकट में कितना सुरक्षित है और उसकी मौत के बाद उसके परिवार को कितना सहारा मिलता है। मंगल ऋषि अब लौटकर नहीं आएंगे। उनके बच्चे अपने पिता को दोबारा नहीं देख सकेंगे। सोनी देवी का जीवन भी पहले जैसा नहीं रहेगा। लेकिन अभी भी समाज और व्यवस्था के पास इतना अवसर है कि इन बच्चों का भविष्य बचाया जा सके। जिस पिता को जीते-जी परिवार पालने के लिए मजदूरी करनी पड़ी और मरने के बाद जिसके अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां तक न जुट सकीं, उसके बच्चों को कम से कम ऐसी जिंदगी तो मिलनी चाहिए, जिसमें रोटी, पढ़ाई और सम्मान के लिए उन्हें दर-दर भटकना न पड़े। आज पन्नुचक का यह परिवार मदद की उम्मीद में है। सवाल केवल यह नहीं कि किसने 11 हजार रुपये दिए; सवाल यह है कि क्या हम सब मिलकर इस परिवार को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी उठाएंगे?
क्योंकि किसी गरीब के घर में चूल्हा न जलना केवल उस परिवार की त्रासदी नहीं, पूरे समाज की संवेदनहीनता पर सवाल है। और किसी पिता को अंतिम विदाई के लिए लकड़ियां न मिलना ऐसी पीड़ा है, जिसे देखकर इंसानियत को खुद से जवाब मांगना चाहिए।  

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