जयपुर महानगर प्रथम की एडीजे-8 कोर्ट ने भंडारी हॉस्पिटल के पूर्व कर्मचारी मनीष कुमार सोनी की जमानत निरस्त करने से इनकार कर दिया है। अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. कांतीमल भंडारी की ओर से दायर जमानत निरस्तीकरण याचिका को अदालत ने खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा दिए गए जमानत के आदेश को पूरी तरह विधिसम्मत ठहराया। दरअसल, अस्पताल के एमडी और सीईओ डॉ. कांतीमल भंडारी ने साइबर क्राइम पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार आरोपी मनीष कुमार सोनी वर्ष 2010 से अस्पताल में एग्जीक्यूटिव असिस्टेंट के पद पर कार्यरत था। आरोप था कि उसने मरीजों को एंड्रोलॉजी के अपॉइंटमेंट देने और दवाइयां भेजने के नाम पर करीब 400 से 500 मरीजों से अपने निजी खातों में पैसे मंगवाए। अस्पताल की फर्म ‘जय भवानी फार्मेसी’ के जीएसटी नंबर पर फर्जी बिल बनाने, डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन से छेड़छाड़ करने और कुल 80 से 90 लाख रुपये के गबन व धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने दी थी जमानत
पुलिस द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी के बाद ट्रायल कोर्ट ने 22 मई 2026 को आरोपी को जमानत दे दी थी। लेकिन अस्पताल की ओर से दलील दी गई थी कि अधीनस्थ अदालत ने मामले की गंभीरता और केस डायरी के तथ्यों को नजरअंदाज कर जल्दबाजी में जमानत दी है। आरोपी पर लगभग 80-90 लाख रुपये के गबन का गंभीर आरोप है। जमानत आदेश में अधिवक्ता का नाम तक गलत अंकित किया गया, जो आदेश पारित करने में की गई जल्दबाजी को दर्शाता है। वहीं आरोपी मनीष सोनी की ओर से पैरवी करते हुए उनके अधिवक्ता यादवेन्द्र सिंह जादौन ने तर्क रखा कि अधीनस्थ अदालत ने पत्रावली पर मौजूद सभी साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद विस्तृत आदेश पारित किया था। आदेश में वकील का नाम गलत टंकित होना महज एक लिपिकीय भूल है, जिससे आदेश के गुण-अवगुण पर असर नहीं पड़ता हैं।

