‘जिस बच्चे को मैंने 9 महीने तक कोख में रखा, उसे गोद में सुलाने के लिए पिछले 3 साल से इंतजार कर रही हूं। मैं अपने बच्चे के लिए तिल-तिल कर तड़प रही हूं। अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों को जरा भी दया नहीं आई। मेरा बच्चा उन्होंने कैसे दूसरे को दे दिया, मेरी उनसे कोई दुश्मनी नहीं थी।’ नालंदा के राजगीर के डुमरी गांव के रहने वाले अविनाश कुमार (32) की पत्नी सिंकी कुमारी (26) ने दैनिक भास्कर से ये बातें कही। सिंकी और अविनाश की शादी साल 2014 में हुई थी। दोनों के पहले से दो बेटे हैं। एक बेटे की उम्र 6 और दूसरे की उम्र 7 साल है। सिंकी देवी का क्या आरोप है? नवजात का सिंकी देवी 3 साल से क्यों इंतजार कर रही है? सिंकी देवी का बच्चा कहां है? पूरा मामला क्या है? पढ़िए एक्सक्लूसिव रिपोर्ट। सबसे पहले जानिए नवजात की मां सिंकी ने क्या कहा? अस्पताल में नवजात की अदला-बदली की शिकार हुई सिंकी देवी ने बताया कि अस्पताल में मुझे बेटे की जगह एक बच्ची थमा दी गई और विरोध करने पर धमकी दी गई। इसको लेकर आवाज उठाई तो अस्पताल प्रशासन की ओर से मुझे प्रताड़ित किया गया। सिंकी देवी ने बताया कि जैसे ही नवजीवन अस्पताल की नर्सों ने 17 दिन की इलाज के बाद बच्ची को मेरी गोद में रखा, मैंने तुरंत पहचान लिया कि ये मेरा बेटा नहीं है। मैंने इसका विरोध किया और शोर मचाया, तो अस्पताल के लोगों ने मुझे तुरंत एक कमरे में धकेल कर करीब एक घंटे तक बंद रखा। सिंकी ने बताया कि बाहर मेरी मां को धक्के मारकर निकाल दिया गया। वे लोग मुझ पर दबाव बना रहे थे कि चुपचाप इस बच्ची को रखो और यहां से लेकर चली जाओ। ‘पक्षी भी दूसरे का बच्चा नहीं अपनाता, मैं इंसान होकर कैसे अपना लूं?’ सिंकी देवी ने कहा कि मैंने बच्चे को 9 महीने कोख में रखा है, मुझे कैसे नहीं पता चलेगा? एक पक्षी भी कभी दूसरे के बच्चे को नहीं अपनाता, फिर मैं तो एक इंसान हूं, एक मां हूं। मैं किसी और के बच्चे को अपना बच्चा मानकर कैसे रख सकती थी? घटना के दिन हमलोग थाने पहुंचे। यहां भी हमलोगों की किसी ने नहीं सुनी। मैं तीन साल से इधर से उधर भटक रही हूं। लेकिन कोई मेरी सुनने वाला नहीं है। नवजात के पिता बोले- गिरियक अस्पताल में पत्नी ने बेटा को दिया था जन्म नवजात के पिता अविनाश कुमार ने बताया कि गिरियक प्राइमरी हेल्थ सेंटर में मेरे बेटे का जन्म हुआ था। अस्पताल के कर्मचारियों ने बेटा होने की पुष्टि की थी। जब बेटे की तबीयत खराब हुई तो उसे पावापुरी रेफर कर दिया गया। सतीश चंद्र बोस नाम के व्यक्ति उन्हें रात में पावापुरी लेकर गए। वहां से पंकज कुमार नाम के व्यक्ति के क्लीनिक भेजा गया, जहां डॉक्टर के हिसुआ में एक बैठक में होने का हवाला देकर घंटों इंतजार कराया गया। आखिर में बच्चे को डॉ. ब्रजेश के क्लीनिक में भर्ती कराया गया। शुरुआत में हमलोगों को नवजात बेटे को दिखाया गया और उसे स्वस्थ बताया गया, लेकिन अगले दिन मेरी सास अपने नाती को देखने पहुंचीं, तो उन्हें केवल बच्चे की पीठ दिखाई गई, जिससे परिवार को पहली बार संदेह हुआ। इलाज के बाद दूध पिलाने के बहाने बुलाया, फिर थमा दी बच्ची 17 दिनों तक चले इलाज के बाद परिवार के लगातार दबाव बनाने पर अस्पताल प्रबंधन ने सिंकी देवी को बच्चे को दूध पिलाने के लिए बुलाया। 11 अप्रैल को उन्हें घंटों इंतजार कराया गया। शाम करीब 5 बजे जब बच्चा सौंपा तो साथ मौजूद एक कर्मचारी ने उसे लड़की बताया। शक होने पर परिजनों ने कपड़े हटाकर देखा तो वह वास्तव में बच्ची थी। अविनाश कुमार के साले कमलेश और अन्य परिजनों ने इसका विरोध किया, तो अस्पताल के कर्मचारियों ने हंगामा शुरू कर दिया। आरोप है कि डॉ. ब्रजेश के इशारे पर दर्जनों असामाजिक तत्वों को बुलाकर परिजनों को कमरे में बंद कर दिया गया और मारपीट की गई। पीड़ित परिवार का दावा है कि इस पूरी घटना के सबूत वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हैं। अविनाश बोले- पुलिस ने भी इस मामले में लापरवाही बरती अविनाश ने कहा कि मामले में स्थानीय पुलिस का रवैया भी निराशाजनक रहा। कई दिनों बाद पुलिस अधिकारी शिवानी नुमानी ने बयान दर्ज किया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। न्याय न मिलता देख मैंने नालंदा के जिलाधिकारी, एसपी और डीडीसी समेत कई आला अधिकारियों से गुहार लगाई। डीएम के आदेश पर हुई जांच में परिवार के आरोप सत्य पाए गए, जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई। स्थानीय स्तर पर न्याय में हो रही देरी को देखते हुए पटना हाईकोर्ट का दरबाजा खटखटाया। परिवार ने मुआवजे की पेशकश ठुकराई, कहा- सिर्फ बच्चा चाहिए अविनाश और सिंकी बताती हैं, ‘इस कानूनी लड़ाई के दौरान अस्पताल प्रबंधन और उनसे जुड़ी आशा कार्यकर्ताओं की ओर से डराने-धमकाने और पैसे लेकर मामला रफा-दफा करने का भी प्रयास किया। लेकिन मुझे किसी तरह का कोई मुआवजा नहीं चाहिए था। मुझे किसी को सजा भी नहीं दिलाना है, मुझे बस मेरा बेटा चाहिए।’ अविनाश के भाई सोनू कुमार ने बताया कि मैंने अपने नवजात भतीजे को नवजीवन अस्पताल में भर्ती कराया था। 17 दिनों तक इलाज के दौरान सिर्फ दूर से बच्चे की झलक दिखाई जाती थी। इस दौरान बच्चा बदल दिया गया। परिवार ने कानूनी लड़ाई शुरू की तो परिवार को पहले 50 लाख, फिर एक करोड़ और यहां तक कहा गया कि मुंह खोलकर जितने पैसे चाहिए मांग लो, बस इस मामले को दबा दो। लेकिन हम लोगों ने न्याय का रास्ता नहीं छोड़ा और पैसे की ऑफर को ठुकराते हुए अपने खून के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया। अब जानिए अविनाश और सिंपी के वकील ने क्या बताया? वकील राजीव कुमार सक्सेना ने बताया कि शुरुआत में इस मामले की शिकायत स्थानीय थाने में की गई, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद पीड़ित परिवार ने नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी शशांक शुभंकर से न्याय की गुहार लगाई। जिलाधिकारी ने मामले की गंभीरता को समझते हुए एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया। इस समिति में उप विकास आयुक्त नालंदा, अनुमंडल पदाधिकारी और डीपीओ शामिल थे। पटना उच्च न्यायालय में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, तीन सदस्यीय जांच समिति ने जो रिपोर्ट डीएम को सौंपा, उसमें बच्चा बदलने का आरोप सत्य पाया। समिति ने पाया कि गिरियक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जब्त किए गए लेबर रूम रजिस्टर, इंडोर पेशेंट रजिस्टर और इमरजेंसी रजिस्टर में स्पष्ट रूप से लगभग 3.450 किलोग्राम वजन वाले एक पुरुष बच्चे के जन्म का उल्लेख है। अब आखिर में जानिए पूरा मामला क्या है? 25 मार्च 2023 को गिरियक के सरकारी अस्पताल में सिंकी देवी ने बेटे को जन्म दिया था। बच्चे की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए नवजात को उसी दिन बिहारशरीफ के भैंसासुर मोड़ के पास नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि नवजात को लगभग 17 दिनों तक यानी 11 अप्रैल तक आईसीयू में रखा गया। इस दौरान एक भी दिन नवजात को देखने तक नहीं दिया गया। 18वें दिन यानी 12 अप्रैल को सिंकी की गोद में बेटे की जगह बेटी को रख दिया गया। मामला नगर थाना पुलिस के पास पहुंचा। जांच में पता चला कि नवजीवन अस्पताल के डॉक्टर ने खुद एंट्री रजिस्टर में ओवरराइटिंग की और ‘मेल’ (लड़का) शब्द के आगे ‘F’ अक्षर जोड़कर उसे ‘फीमेल’ (लड़की) बना दिया। जांच में ये भी पाया गया कि अस्पताल के NSUI वार्ड में न तो कोई सीसीटीवी था और न ही वहां कोई सुरक्षा गार्ड था। एंट्री-एग्जिट रजिस्टर भी ठीक से मेंटेन नहीं किए जा रहे थे। इन दस्तावेजों को फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी भेजने में सुस्ती बरती गई। यानी पुलिस की जांच में भी लापरवाही बरती गई। पुलिस की लापरवाही के बाद परिजन हाईकोर्ट पहुंचे पुलिस ने मामले की जांच में लापरवाही बरती। पुलिस भी सिंकी को उसका नवजात नहीं दिला पाई तो परिजन ने पटना हाईकोर्ट का रूख किया। हाईकोर्ट के निर्देश पर डीएनए जांच कराई गई। करीब 5 महीने पहले याचिकाकर्ता अविनाश कुमार की पत्नी सिंकी देवी को क्लिनिक की ओर से सौंपी गई बच्ची के डीएनए सैंपल लिए गए थे। जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में सौंपी गई। इसमें सामने आया कि बच्ची याचिकाकर्ता की बॉयोलॉजिक्ल संतान नहीं है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति रमेश चंद मालवीय की खंडपीठ ने सप्रीम कोर्ट की ओर से ‘पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मानव तस्करी के ऐसे मामलों में अस्पताल का लाइसेंस तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। 2025 में हाईकोर्ट में दायर की गई ‘हैबियस कॉर्पस’ और डीएनए टेस्ट साल 2025 में पटना हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कॉर्पस रिट) दायर की गई। याचिका स्वीकार होने के बाद जज सुधीर सिंह ने मामले में हाईकोर्ट की निगरानी में डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया था। डीएनए रिपोर्ट आने के बाद भी जब पुलिस ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया, तब 10 अगस्त को माननीय न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद और मालवीय जी की खंडपीठ में इस मामले की दोबारा सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने नालंदा की डीएम उदिता सिंह को निर्देश दिया है कि 2 हफ्ते में उचित आदेश पारित करें। वहीं, एसपी भरत सोनी ने जिलाधिकारी को अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव भेज दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर तय की है, जिसमें एसपी को अपनी कार्रवाई रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में सौंपने के निर्देश दिए हैं। ‘जिस बच्चे को मैंने 9 महीने तक कोख में रखा, उसे गोद में सुलाने के लिए पिछले 3 साल से इंतजार कर रही हूं। मैं अपने बच्चे के लिए तिल-तिल कर तड़प रही हूं। अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों को जरा भी दया नहीं आई। मेरा बच्चा उन्होंने कैसे दूसरे को दे दिया, मेरी उनसे कोई दुश्मनी नहीं थी।’ नालंदा के राजगीर के डुमरी गांव के रहने वाले अविनाश कुमार (32) की पत्नी सिंकी कुमारी (26) ने दैनिक भास्कर से ये बातें कही। सिंकी और अविनाश की शादी साल 2014 में हुई थी। दोनों के पहले से दो बेटे हैं। एक बेटे की उम्र 6 और दूसरे की उम्र 7 साल है। सिंकी देवी का क्या आरोप है? नवजात का सिंकी देवी 3 साल से क्यों इंतजार कर रही है? सिंकी देवी का बच्चा कहां है? पूरा मामला क्या है? पढ़िए एक्सक्लूसिव रिपोर्ट। सबसे पहले जानिए नवजात की मां सिंकी ने क्या कहा? अस्पताल में नवजात की अदला-बदली की शिकार हुई सिंकी देवी ने बताया कि अस्पताल में मुझे बेटे की जगह एक बच्ची थमा दी गई और विरोध करने पर धमकी दी गई। इसको लेकर आवाज उठाई तो अस्पताल प्रशासन की ओर से मुझे प्रताड़ित किया गया। सिंकी देवी ने बताया कि जैसे ही नवजीवन अस्पताल की नर्सों ने 17 दिन की इलाज के बाद बच्ची को मेरी गोद में रखा, मैंने तुरंत पहचान लिया कि ये मेरा बेटा नहीं है। मैंने इसका विरोध किया और शोर मचाया, तो अस्पताल के लोगों ने मुझे तुरंत एक कमरे में धकेल कर करीब एक घंटे तक बंद रखा। सिंकी ने बताया कि बाहर मेरी मां को धक्के मारकर निकाल दिया गया। वे लोग मुझ पर दबाव बना रहे थे कि चुपचाप इस बच्ची को रखो और यहां से लेकर चली जाओ। ‘पक्षी भी दूसरे का बच्चा नहीं अपनाता, मैं इंसान होकर कैसे अपना लूं?’ सिंकी देवी ने कहा कि मैंने बच्चे को 9 महीने कोख में रखा है, मुझे कैसे नहीं पता चलेगा? एक पक्षी भी कभी दूसरे के बच्चे को नहीं अपनाता, फिर मैं तो एक इंसान हूं, एक मां हूं। मैं किसी और के बच्चे को अपना बच्चा मानकर कैसे रख सकती थी? घटना के दिन हमलोग थाने पहुंचे। यहां भी हमलोगों की किसी ने नहीं सुनी। मैं तीन साल से इधर से उधर भटक रही हूं। लेकिन कोई मेरी सुनने वाला नहीं है। नवजात के पिता बोले- गिरियक अस्पताल में पत्नी ने बेटा को दिया था जन्म नवजात के पिता अविनाश कुमार ने बताया कि गिरियक प्राइमरी हेल्थ सेंटर में मेरे बेटे का जन्म हुआ था। अस्पताल के कर्मचारियों ने बेटा होने की पुष्टि की थी। जब बेटे की तबीयत खराब हुई तो उसे पावापुरी रेफर कर दिया गया। सतीश चंद्र बोस नाम के व्यक्ति उन्हें रात में पावापुरी लेकर गए। वहां से पंकज कुमार नाम के व्यक्ति के क्लीनिक भेजा गया, जहां डॉक्टर के हिसुआ में एक बैठक में होने का हवाला देकर घंटों इंतजार कराया गया। आखिर में बच्चे को डॉ. ब्रजेश के क्लीनिक में भर्ती कराया गया। शुरुआत में हमलोगों को नवजात बेटे को दिखाया गया और उसे स्वस्थ बताया गया, लेकिन अगले दिन मेरी सास अपने नाती को देखने पहुंचीं, तो उन्हें केवल बच्चे की पीठ दिखाई गई, जिससे परिवार को पहली बार संदेह हुआ। इलाज के बाद दूध पिलाने के बहाने बुलाया, फिर थमा दी बच्ची 17 दिनों तक चले इलाज के बाद परिवार के लगातार दबाव बनाने पर अस्पताल प्रबंधन ने सिंकी देवी को बच्चे को दूध पिलाने के लिए बुलाया। 11 अप्रैल को उन्हें घंटों इंतजार कराया गया। शाम करीब 5 बजे जब बच्चा सौंपा तो साथ मौजूद एक कर्मचारी ने उसे लड़की बताया। शक होने पर परिजनों ने कपड़े हटाकर देखा तो वह वास्तव में बच्ची थी। अविनाश कुमार के साले कमलेश और अन्य परिजनों ने इसका विरोध किया, तो अस्पताल के कर्मचारियों ने हंगामा शुरू कर दिया। आरोप है कि डॉ. ब्रजेश के इशारे पर दर्जनों असामाजिक तत्वों को बुलाकर परिजनों को कमरे में बंद कर दिया गया और मारपीट की गई। पीड़ित परिवार का दावा है कि इस पूरी घटना के सबूत वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हैं। अविनाश बोले- पुलिस ने भी इस मामले में लापरवाही बरती अविनाश ने कहा कि मामले में स्थानीय पुलिस का रवैया भी निराशाजनक रहा। कई दिनों बाद पुलिस अधिकारी शिवानी नुमानी ने बयान दर्ज किया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। न्याय न मिलता देख मैंने नालंदा के जिलाधिकारी, एसपी और डीडीसी समेत कई आला अधिकारियों से गुहार लगाई। डीएम के आदेश पर हुई जांच में परिवार के आरोप सत्य पाए गए, जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई। स्थानीय स्तर पर न्याय में हो रही देरी को देखते हुए पटना हाईकोर्ट का दरबाजा खटखटाया। परिवार ने मुआवजे की पेशकश ठुकराई, कहा- सिर्फ बच्चा चाहिए अविनाश और सिंकी बताती हैं, ‘इस कानूनी लड़ाई के दौरान अस्पताल प्रबंधन और उनसे जुड़ी आशा कार्यकर्ताओं की ओर से डराने-धमकाने और पैसे लेकर मामला रफा-दफा करने का भी प्रयास किया। लेकिन मुझे किसी तरह का कोई मुआवजा नहीं चाहिए था। मुझे किसी को सजा भी नहीं दिलाना है, मुझे बस मेरा बेटा चाहिए।’ अविनाश के भाई सोनू कुमार ने बताया कि मैंने अपने नवजात भतीजे को नवजीवन अस्पताल में भर्ती कराया था। 17 दिनों तक इलाज के दौरान सिर्फ दूर से बच्चे की झलक दिखाई जाती थी। इस दौरान बच्चा बदल दिया गया। परिवार ने कानूनी लड़ाई शुरू की तो परिवार को पहले 50 लाख, फिर एक करोड़ और यहां तक कहा गया कि मुंह खोलकर जितने पैसे चाहिए मांग लो, बस इस मामले को दबा दो। लेकिन हम लोगों ने न्याय का रास्ता नहीं छोड़ा और पैसे की ऑफर को ठुकराते हुए अपने खून के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया। अब जानिए अविनाश और सिंपी के वकील ने क्या बताया? वकील राजीव कुमार सक्सेना ने बताया कि शुरुआत में इस मामले की शिकायत स्थानीय थाने में की गई, लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद पीड़ित परिवार ने नालंदा के तत्कालीन जिलाधिकारी शशांक शुभंकर से न्याय की गुहार लगाई। जिलाधिकारी ने मामले की गंभीरता को समझते हुए एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया। इस समिति में उप विकास आयुक्त नालंदा, अनुमंडल पदाधिकारी और डीपीओ शामिल थे। पटना उच्च न्यायालय में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, तीन सदस्यीय जांच समिति ने जो रिपोर्ट डीएम को सौंपा, उसमें बच्चा बदलने का आरोप सत्य पाया। समिति ने पाया कि गिरियक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जब्त किए गए लेबर रूम रजिस्टर, इंडोर पेशेंट रजिस्टर और इमरजेंसी रजिस्टर में स्पष्ट रूप से लगभग 3.450 किलोग्राम वजन वाले एक पुरुष बच्चे के जन्म का उल्लेख है। अब आखिर में जानिए पूरा मामला क्या है? 25 मार्च 2023 को गिरियक के सरकारी अस्पताल में सिंकी देवी ने बेटे को जन्म दिया था। बच्चे की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए नवजात को उसी दिन बिहारशरीफ के भैंसासुर मोड़ के पास नवजीवन शिशु अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि नवजात को लगभग 17 दिनों तक यानी 11 अप्रैल तक आईसीयू में रखा गया। इस दौरान एक भी दिन नवजात को देखने तक नहीं दिया गया। 18वें दिन यानी 12 अप्रैल को सिंकी की गोद में बेटे की जगह बेटी को रख दिया गया। मामला नगर थाना पुलिस के पास पहुंचा। जांच में पता चला कि नवजीवन अस्पताल के डॉक्टर ने खुद एंट्री रजिस्टर में ओवरराइटिंग की और ‘मेल’ (लड़का) शब्द के आगे ‘F’ अक्षर जोड़कर उसे ‘फीमेल’ (लड़की) बना दिया। जांच में ये भी पाया गया कि अस्पताल के NSUI वार्ड में न तो कोई सीसीटीवी था और न ही वहां कोई सुरक्षा गार्ड था। एंट्री-एग्जिट रजिस्टर भी ठीक से मेंटेन नहीं किए जा रहे थे। इन दस्तावेजों को फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी भेजने में सुस्ती बरती गई। यानी पुलिस की जांच में भी लापरवाही बरती गई। पुलिस की लापरवाही के बाद परिजन हाईकोर्ट पहुंचे पुलिस ने मामले की जांच में लापरवाही बरती। पुलिस भी सिंकी को उसका नवजात नहीं दिला पाई तो परिजन ने पटना हाईकोर्ट का रूख किया। हाईकोर्ट के निर्देश पर डीएनए जांच कराई गई। करीब 5 महीने पहले याचिकाकर्ता अविनाश कुमार की पत्नी सिंकी देवी को क्लिनिक की ओर से सौंपी गई बच्ची के डीएनए सैंपल लिए गए थे। जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में सौंपी गई। इसमें सामने आया कि बच्ची याचिकाकर्ता की बॉयोलॉजिक्ल संतान नहीं है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति रमेश चंद मालवीय की खंडपीठ ने सप्रीम कोर्ट की ओर से ‘पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मानव तस्करी के ऐसे मामलों में अस्पताल का लाइसेंस तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। 2025 में हाईकोर्ट में दायर की गई ‘हैबियस कॉर्पस’ और डीएनए टेस्ट साल 2025 में पटना हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हैबियस कॉर्पस रिट) दायर की गई। याचिका स्वीकार होने के बाद जज सुधीर सिंह ने मामले में हाईकोर्ट की निगरानी में डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश दिया था। डीएनए रिपोर्ट आने के बाद भी जब पुलिस ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया, तब 10 अगस्त को माननीय न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद और मालवीय जी की खंडपीठ में इस मामले की दोबारा सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने नालंदा की डीएम उदिता सिंह को निर्देश दिया है कि 2 हफ्ते में उचित आदेश पारित करें। वहीं, एसपी भरत सोनी ने जिलाधिकारी को अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव भेज दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर तय की है, जिसमें एसपी को अपनी कार्रवाई रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में सौंपने के निर्देश दिए हैं।


