बूंदी में पंचायतीराज और शहरी सत्ता की कहानी अनोखी है। जिले में जिला प्रमुख का पद संभालने वाला कोई भी नेता आज तक विधायक नहीं बन पाया है। वहीं, नगर निकाय के चेयरमैन रहे कई नेता विधायक और मंत्री तक बन चुके हैं। जिले के 67 साल के इतिहास में 9 जिला प्रमुख बने, पर एक भी विधानसभा नहीं पहुंचा। सिर्फ दो बार टिकट मिला। 1967 में जिला प्रमुख भैरवप्रकाश माथुर कांग्रेस से हिंडौली में केसरी सिंह से हारे। 2018 में कांग्रेस ने पूर्व जिला प्रमुख राकेश बोयत को केशवरायपाटन से उतारा, पर हारे। निकाय चेयरमैन विधायक और मंत्री भी बने
इसके उलट पंडित बृजसुंदर शर्मा, हरिमोहन शर्मा, छीतरलाल और हरिप्रसाद शर्मा जैसे नगर निकाय चेयरमैन विधायक और मंत्री भी बने। केशवरायपाटन से 1957 में विधायक बने भंवरलाल शर्मा 1987 में जिला प्रमुख बने थे, पर जिला प्रमुख बनने के बाद विधायक नहीं बने। 1959 में तालेड़ा पंचायत समिति गठन के बाद 1980 तक प्रधान और 1987 तक जिला प्रमुख रहे बरुंधन के रामनिवास शर्मा ने बताया- कांग्रेस ने 2 बार जिला प्रमुख को विधानसभा में उतारा, लेकिन जीत नहीं सके। मैंने भी 1989, 1993 और 1998 में टिकट मांगा। हर बार बड़े नेताओं ने अंत तक भरोसे में रखा, पर टिकट नहीं मिला। फिर भी बगावत कर निर्दलीय नहीं लड़ा। साफ है, बूंदी में ग्रामीण सत्ता की सीढ़ी विधानसभा तक नहीं पहुंचती, जबकि शहरी सत्ता नेताओं के लिए विधानसभा का रास्ता खोलती रही है।

