किताब: 10 फैसले, जिनसे बदला देश कैसे संकट, संघर्ष और अदालत ने गढ़ा नया भारत लेखिका: प्रिया जैन अनुवाद: प्रभात रंजन प्रकाशक: पेंगुइन मूल्य: 350 रुपए किसी देश का इतिहास सिर्फ युद्धों, चुनावों और सरकारों की कहानी नहीं होता। कई बार कुछ ऐसे फैसले और घटनाएं होती हैं, जो पूरे लोकतंत्र की दिशा बदल देती हैं। भारत के इतिहास में भी ऐसे कई मोड़ आए हैं, जब संविधान, अदालत, सरकार और आम नागरिक के बीच रिश्ते की परीक्षा हुई। प्रिया जैन की किताब ‘10 फैसले, जिनसे बदला देश’ इन्हीं निर्णायक घटनाक्रमों के जरिए आधुनिक भारत को समझने की कोशिश करती है। संविधान निर्माण और पहले आम चुनाव से शुरू होने वाली किताब की यात्रा आपातकाल, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, 26/11, निर्भया मामले और अनुच्छेद 370 जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों तक जाती है। इन घटनाओं में कहीं लोकतांत्रिक संस्थाओं की परीक्षा हुई, कहीं कानून और आस्था आमने-सामने आए और कहीं अदालतों के फैसलों ने देश की राजनीति और समाज पर गहरा असर डाला। लेखिका का परिचय प्रिया जैन वकील, लीगल एजुकेटर और ‘फिनोलॉजी लीगल’ यूट्यूब चैनल की संस्थापक हैं। वह जटिल भारतीय कानूनों, संवैधानिक मुद्दों और नागरिक अधिकारों को आम लोगों को आसान भाषा में समझाती हैं। प्रिया के यूट्यूब चैनल पर 4.47 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं। किताब में शामिल 10 मुख्य घटनाएं किताब की खासियत इसकी रूपरेखा है। लेखिका ने आधुनिक भारत को समझने के लिए दस ऐसे घटनाक्रम चुने हैं, जिनमें देश के सामने किसी-न-किसी रूप में संवैधानिक, राजनीतिक, सामाजिक या कानूनी चुनौती आई। इसे ग्राफिक में देखिए- संविधान और पहला चुनाव: गणराज्य की नींव किताब की शुरुआत संविधान निर्माण और पहले आम चुनाव जैसे ऐतिहासिक पड़ावों से होती है। आज जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को हम सामान्य मानते हैं, उसके पीछे कितनी बड़ी संस्थागत और राजनीतिक चुनौती थी, इसे समझना जरूरी है। संविधान ने नागरिकों के अधिकारों, राज्य की शक्तियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन की नींव रखी। इसके बाद पहला आम चुनाव इस व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा थी। एक विशाल और विविधतापूर्ण देश में आम नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाना अपने आप में ऐतिहासिक कदम था। आपातकाल: जब लोकतंत्र की सीमाएं परखी गईं यह किताब का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। 1975 से 1977 के बीच का यह दौर नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और सत्ता की सीमाओं को लेकर आज भी भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी बहसों में शामिल है। लेखिका इस दौर को सिर्फ राजनीतिक घटना के रूप में नहीं देखतीं। वह सवाल करती हैं कि जब सत्ता के पास असाधारण अधिकार आ जाएं, तब संस्थाएं नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे करेंगी? यही सवाल आज भी प्रासंगिक है। आर्थिक बदलाव जिसने भारत की दिशा बदली 1991 के आर्थिक सुधार किताब को राजनीति और संविधान से आगे अर्थव्यवस्था की ओर ले जाते हैं। आर्थिक संकट के बीच लिए गए फैसलों ने भारत की आर्थिक नीति की दिशा बदल दी। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार की संरचना में बड़ा बदलाव आया। इस अध्याय की खासियत यह है कि लेखिका आर्थिक नीति को भी गणराज्य की यात्रा का हिस्सा मानती हैं। यानी किसी देश का बदलाव केवल चुनाव और राजनीतिक फैसलों से नहीं होता, आर्थिक नीतियां भी नागरिकों के जीवन और भविष्य को प्रभावित करती हैं। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद किताब का सबसे संवेदनशील विषय राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद है। यह मामला केवल जमीन के विवाद तक सीमित नहीं रहा। इसमें आस्था, राजनीति, कानून और सामाजिक संबंधों के कई स्तर जुड़े रहे। प्रिया जैन इस पूरे घटनाक्रम के जरिए यह समझने की कोशिश करती हैं कि जब धार्मिक आस्था और संवैधानिक व्यवस्था आमने-सामने दिखाई दें तो कानून की भूमिका क्या होती है। यह हिस्सा पाठक को यह समझने का अवसर देता है कि अदालत के फैसले केवल कानूनी दस्तावेज नहीं होते। कई बार उनका असर समाज और राजनीति पर लंबे समय तक रहता है। 26/11 और निर्भया केस: घटनाओं से बदली व्यवस्था किताब इन घटनाओं के जरिए सुरक्षा और क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की कमियों को भी देखती है। निर्भया कांड के बाद देशभर में जिस तरह महिलाओं की सुरक्षा और कानूनों में बदलाव को लेकर बहस हुई, उसने यह दिखाया कि किसी गंभीर सामाजिक घटना के बाद कानून में बदलाव की मांग कैसे राष्ट्रीय विमर्श बन सकती है। यहां किताब का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है कि ‘’कानून केवल अदालतों में मौजूद धाराओं का कलेक्शन नहीं है, वह समाज की बदलती जरूरतों के साथ लगातार विकसित होता है।’’ अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण अनुच्छेद 370 का मुद्दा किताब को आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस तक ले जाता है। यह अध्याय खास इसलिए है, क्योंकि यहां इतिहास, राजनीति और कानून, तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। यह भी समझ आता है कि संविधान के किसी प्रावधान से जुड़ा फैसला केवल कानूनी मुद्दा नहीं होता, उसका राजनीतिक और सामाजिक असर भी हो सकता है। किताब की सबसे बड़ी खूबी किताब की सबसे बड़ी ताकत यह है कि लेखिका कानून को केवल कानूनी शब्दावली में नहीं समझातीं। वे घटनाओं और उनके प्रभाव के जरिए संवैधानिक मुद्दों को समझने की कोशिश करती हैं। किताब के 5 मुख्य सबक ग्राफिक में देखिए- यह किताब किन्हें पढ़नी चाहिए? यह किताब उन पाठकों के लिए खासतौर पर उपयोगी है, जो इतिहास में रुचि रखते हैं। किताब किन्हें पढ़नी चाहिए, ग्राफिक में देखिए- किताब के बारे में मेरी राय किताब की खासियत यह है कि यह आधुनिक भारत के इतिहास को केवल घटनाओं की सूची नहीं बनाती। लेखिका हर बड़े घटनाक्रम के पीछे मौजूद संवैधानिक और कानूनी सवालों को तलाशती हैं। दस घटनाओं का चयन भी किताब को केंद्रित रखता है। पाठक एक घटना से दूसरी घटना तक जाते हुए समझ पाता है कि भारत का लोकतंत्र कैसे अलग-अलग दौर की चुनौतियों से गुजरा। हालांकि आधुनिक भारत का इतिहास इससे कहीं ज्यादा व्यापक है और कई दूसरे महत्वपूर्ण घटनाक्रम भी इसमें जगह पा सकते थे। **************** ग्राफिक्स- विपुल शर्मा ………………… ये बुक रिव्यू भी पढ़ें बुक रिव्यू- ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’: एक खुफिया एजेंट के पकड़े जाने, जेल जाने और फिर जिंदा लौट आने की कहानी मोहनलाल भास्कर की किताब ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ ऐसी ही एक कहानी है। यह उस भारतीय की सच्ची कहानी है, जो पाकिस्तान में सीक्रेट मिशन के दौरान पकड़ा गया। सालों जेल में रहा, यातनाएं सहीं और फिर लौटकर अपनी दास्तान लिखी। पूरी खबर पढ़िए…
बुक रिव्यू- 10 फैसले, जिन्होंने बदल दी भारत की तस्वीर:बड़े संकटों से बड़ी लड़ाइयों और बदलावों तक आधुनिक भारत की निर्माण यात्रा

