(अपर्णा बोस)
नयी दिल्ली, 27 सितंबर बिहार के मधुबनी स्थित अपने गृह नगर से बेहतर जीवन की तलाश में मुंबई की झुग्गियों में आने के बाद 20 वर्षीय पीयूष झा ने अपनी बस्ती के सामने एक नई चुनौती देखी जो थी-घरों के आसपास जमा हो रहा गंदा पानी और डेंगू, मलेरिया तथा टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियों का बढ़ता खतरा। इन हालात ने उसे इस समस्या के समाधान के लिए एक नवाचार तलाशने के लिए प्रेरित किया। झा ने एक विकेंद्रीकृत, मॉड्यूलर अपशिष्ट जल शोधन प्रणाली विकसित की , जिसका उद्देश्य पानी को साफ करने की प्रक्रिया को व्यावहारिक और किफायती बनाना है।
इस नवाचार को भारत में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के उद्यमिता कार्यक्रम ‘यूथ को:लैब नेशनल इनोवेशन चैलेंज’ के तहत मान्यता मिली है। विश्व नदी दिवस के अवसर पर झा ने पीटीआई-को बताया कि उनका नवाचार गैर शोधित औद्योगिक अपशिष्ट जल के बहाव की समस्या से निपटने का प्रयास है, जो भारत के जल स्रोतों में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में से एक है। झा के अनुसार हर दिन करीब 1800 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल निकलता है, जिसमें से केवल 20 से 30 प्रतिशत ही शोधित होता है।
उन्होंने कहा, “अपशिष्ट जल के शोधन के लिए हमें किसी रासायनिक पदार्थ की जरूरत नहीं है और न ही भारी बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पड़ती है। मौजूदा जल शोधन संयंत्रों को शुरू करने के लिए ही बड़े आधारभूत ढांचे की जरूरत होती है, जो भारत में विनिर्माण और प्रसंस्करण इकाइयों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।”
परियोजना के दायरे के बारे में पूछे जाने पर झा ने कहा कि यह उद्योगों को किफायती जल शोधन समाधान उपलब्ध कराकर आम लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। उन्होंने बताया कि इसका लक्ष्य कपड़ा, चमड़ा, खाद्य एवं पेय पदार्थ, डिस्टिलरी, कागज एवं लुगदी तथा चीनी जैसे क्षेत्र हैं।
ये ऐसे उद्योग हैं, जहां बड़ी मात्रा में जैविक रूप से विघटित होने वाला कचरा उत्पन्न होता है। झा ने कहा कि यह तकनीक सूक्ष्मजीवों की मदद से कचरे को विघटित करती है और इस प्रक्रिया में बिजली भी उत्पन्न करती है। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘अगर छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों को किफायती जल शोधन समाधान मिल जाए, तो उनके जल निकायों में जहरीला अपशिष्ट जल छोड़ने की संभावना कम है।
इससे उन्हें आर्थिक रूप से भी मदद मिलेगी। पहले जहां किसी उद्योग को पानी साफ करने के लिए 20 लाख रुपये खर्च करने पड़ते थे, वहीं हमारा प्री-ट्रीटमेंट समाधान इस खर्च को घटाकर पांच से सात लाख रुपये कर देता है।’’
झा ने बताया कि कोविड-19 के दौरान सेकेंड हैंड लैपटॉप मिलने के बाद उन्होंने इस दिशा में काम शुरू किया। झा ने कहा कि जल उपचार इंजीनियरिंग में उनके पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं है।
उन्होंने एमएचटी-सीईटी में 98 प्रतिशत हासिल करने के बावजूद मुंबई के डीजी सांघवी कॉलेज से अपनी पढ़ाई छोड़कर स्टार्टअप पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा, “यह केवल एक व्यक्ति का प्रयास नहीं है। कई संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और इनक्यूबेटरों ने हमारा समर्थन किया है, जिनमें यूएनडीपी, इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय और मर्सिडीज-बेंज फेलोशिप कार्यक्रम शामिल है।”
यूएनडीपी इंडिया के साथ अपने जुड़ाव के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि कार्यक्रम ‘यूथ को:लैब’ ने उन्हें विभिन्न उद्योगों के विशेषज्ञों से मार्गदर्शन, निवेशकों से संपर्क और तीन महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम तक पहुंच मुहैया कराई।
उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता में विजेता नहीं रहने वाले प्रतिभागियों को भी उद्योग जगत के पेशेवरों से मार्गदर्शन मिला। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे हैदराबाद में आयोजित चार दिवसीय बूटकैंप के लिए भी आमंत्रित किया गया था, जहां मुझे दो प्रमुख साझेदार मिले। इनमें से एक सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी के साथ साझेदारी भी शामिल है।

