बिहार की अनोखी काली पूजा, 1989 दंगे का इतिहास जुड़ा:दीपावली की रात निशा पूजा से शुरुआत, दो दिनों तक विसर्जन यात्रा; मुस्लिम समाज करता है सम्मान

बिहार की अनोखी काली पूजा, 1989 दंगे का इतिहास जुड़ा:दीपावली की रात निशा पूजा से शुरुआत, दो दिनों तक विसर्जन यात्रा; मुस्लिम समाज करता है सम्मान

दीपावली नजदीक आते ही भागलपुर में मां काली पूजा और विसर्जन शोभायात्रा को लेकर तैयारियां तेज हो जाती हैं। शहर में मां काली की पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वर्षों पुरानी परंपरा, अखाड़ों की संस्कृति, पारिवारिक विरासत और सामाजिक सौहार्द की झलक भी देखने को मिलती है। परबत्ती की मां काली की प्रतिमा और उससे जुड़ी विसर्जन शोभायात्रा इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहती है। मां काली की पूजा की शुरुआत दीपावली की रात निशा पूजा से होती है। इस दौरान विधि-विधान से मां की पूजा-अर्चना की जाती है। परबत्ती में मां की प्रतिमा स्थापित होती है। पूजा की तैयारियों में प्रतिमा स्थापना, धार्मिक अनुष्ठान और शोभायात्रा की व्यवस्था प्रमुख रहती है। तीन अखाड़े और कामेश्वर यादव का रथ खास इस आयोजन में कृष्णा व्यायामशाला, महाकाल व्यायामशाला और नागा व्यायामशाला के अखाड़े अपनी परंपरा के साथ शामिल होते हैं। वहीं, स्वर्गीय कामेश्वर प्रसाद यादव के परिवार की ओर से निकाला जाने वाला रथ भी आकर्षण का केंद्र रहता है। इस रथ के सारथी उनके पौत्र रणवीर यादव हैं। दो दिनों तक चलती है विसर्जन शोभायात्रा विसर्जन के दौरान परबत्ती से मां काली की प्रतिमा के साथ भव्य शोभायात्रा निकलती है, जो स्टेशन चौक तक पहुंचती है। इसके बाद शहर के विभिन्न इलाकों की प्रतिमाएं कतारबद्ध होकर मुख्य शोभायात्रा में शामिल होती हैं। आयोजन से जुड़ी जानकारी के अनुसार, शहर में कुल 81 प्रतिमाएं स्थापित होती हैं। इनमें नया टोला परबत्ती, साहिबगंज, मंदरोजा और बूढ़ानाथ समेत कई इलाकों की प्रतिमाएं शामिल हैं। शोभायात्रा दो दिनों तक चलती है और इसमें करीब 20 हजार श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान है। ततारपुर में सम्मान, प्रशासन की भी रहती है तैयारी शोभायात्रा के दौरान ततारपुर चौक पर मुस्लिम समाज के लोग अंगवस्त्र देकर लोगों को सम्मानित करते हैं। यह परंपरा आयोजन में आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भागीदारी को देखते हुए प्रशासन की ओर से विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मजिस्ट्रेट की तैनाती भी की जाती है। 1989 के दंगे की यादें भी जुड़ी हैं भागलपुर में अक्टूबर 1989 में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। उस समय परबत्ती और ततारपुर के आसपास भी तनाव और हिंसा की घटनाएं हुई थीं। इसी दौरान लोगाय गांव में 116 लोगों की हत्या का मामला सामने आया था। ऐतिहासिक रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा के दौरान फैली अफवाहों ने हालात को और गंभीर बनाया था इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बीच आज मां काली की शोभायात्रा से जुड़ी भाईचारे की परंपरा भी महत्वपूर्ण है। पूजा और विसर्जन का आयोजन धार्मिक आस्था के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संदेश देने का अवसर बनता है। दीपावली नजदीक आते ही भागलपुर में मां काली पूजा और विसर्जन शोभायात्रा को लेकर तैयारियां तेज हो जाती हैं। शहर में मां काली की पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वर्षों पुरानी परंपरा, अखाड़ों की संस्कृति, पारिवारिक विरासत और सामाजिक सौहार्द की झलक भी देखने को मिलती है। परबत्ती की मां काली की प्रतिमा और उससे जुड़ी विसर्जन शोभायात्रा इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहती है। मां काली की पूजा की शुरुआत दीपावली की रात निशा पूजा से होती है। इस दौरान विधि-विधान से मां की पूजा-अर्चना की जाती है। परबत्ती में मां की प्रतिमा स्थापित होती है। पूजा की तैयारियों में प्रतिमा स्थापना, धार्मिक अनुष्ठान और शोभायात्रा की व्यवस्था प्रमुख रहती है। तीन अखाड़े और कामेश्वर यादव का रथ खास इस आयोजन में कृष्णा व्यायामशाला, महाकाल व्यायामशाला और नागा व्यायामशाला के अखाड़े अपनी परंपरा के साथ शामिल होते हैं। वहीं, स्वर्गीय कामेश्वर प्रसाद यादव के परिवार की ओर से निकाला जाने वाला रथ भी आकर्षण का केंद्र रहता है। इस रथ के सारथी उनके पौत्र रणवीर यादव हैं। दो दिनों तक चलती है विसर्जन शोभायात्रा विसर्जन के दौरान परबत्ती से मां काली की प्रतिमा के साथ भव्य शोभायात्रा निकलती है, जो स्टेशन चौक तक पहुंचती है। इसके बाद शहर के विभिन्न इलाकों की प्रतिमाएं कतारबद्ध होकर मुख्य शोभायात्रा में शामिल होती हैं। आयोजन से जुड़ी जानकारी के अनुसार, शहर में कुल 81 प्रतिमाएं स्थापित होती हैं। इनमें नया टोला परबत्ती, साहिबगंज, मंदरोजा और बूढ़ानाथ समेत कई इलाकों की प्रतिमाएं शामिल हैं। शोभायात्रा दो दिनों तक चलती है और इसमें करीब 20 हजार श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान है। ततारपुर में सम्मान, प्रशासन की भी रहती है तैयारी शोभायात्रा के दौरान ततारपुर चौक पर मुस्लिम समाज के लोग अंगवस्त्र देकर लोगों को सम्मानित करते हैं। यह परंपरा आयोजन में आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भागीदारी को देखते हुए प्रशासन की ओर से विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मजिस्ट्रेट की तैनाती भी की जाती है। 1989 के दंगे की यादें भी जुड़ी हैं भागलपुर में अक्टूबर 1989 में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। उस समय परबत्ती और ततारपुर के आसपास भी तनाव और हिंसा की घटनाएं हुई थीं। इसी दौरान लोगाय गांव में 116 लोगों की हत्या का मामला सामने आया था। ऐतिहासिक रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा के दौरान फैली अफवाहों ने हालात को और गंभीर बनाया था इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बीच आज मां काली की शोभायात्रा से जुड़ी भाईचारे की परंपरा भी महत्वपूर्ण है। पूजा और विसर्जन का आयोजन धार्मिक आस्था के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संदेश देने का अवसर बनता है।  

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