इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के लखनऊ डायोसीज़ के बिशप रहे राइट रेवरेंड डॉ. पीटर बलदेव को बड़ी राहत देते हुए उनकी बर्खास्तगी से जुड़े मामले में निचली अदालतों के फैसलों पर रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल ने दिया है। डॉ. बलदेव 5 अगस्त 2015 को नई दिल्ली में हुए एपिस्कोपल चुनाव में लखनऊ डायोसीज़ के बिशप चुने गए थे और 9 अगस्त 2015 को कोलकाता के सेंट पॉल कैथेड्रल में उनका अभिषेक हुआ था। इसके बाद 11 अगस्त 2015 को प्रयागराज के ऑल सेंट्स कैथेड्रल में उनकी नियुक्ति समारोह हुआ। बिशप के पद से बर्खास्त कर दिया था 10 मार्च 2023 को उन्हें सिनॉड ऑफ चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया की ओर से एक पत्र मिला, जिसमें उन्हें बिशप के पद से बर्खास्त कर दिया गया। इसके खिलाफ उन्होंने प्रयागराज की सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने 16 मई 2024 को आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत उनका वाद ही खारिज कर दिया था, यह कहते हुए कि बिशप की नियुक्ति एक निजी सेवा अनुबंध के दायरे में आती है और यह वाद स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 14 के तहत वर्जित है। अपर जिला जज ने भी 6 अगस्त 2024 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी थी। अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता कार्तिकेय सरन, सुबेदार मिश्रा और जाह्नवी त्रिपाठी ने दलील दी कि निचली अदालतों ने बिशप के पद की प्रकृति, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के संविधान और संबंधित एमओयू पर ठीक से विचार नहीं किया। आदेशों के प्रभाव पर रोक लगाई वहीं प्रतिवादी की ओर से तर्क दिया कि चर्च के संविधान की धारा 7 के तहत किसी बिशप को सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की अनुमति नहीं है और अपीलकर्ता के पास कोड ऑफ सिनॉड्स के तहत आंतरिक अपील का विकल्प मौजूद था। न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की अदालत ने मामले में कई तर्कसंगत बिंदु पाते हुए मेमो ऑफ अपील में तय प्रश्न संख्या 2, 4, 6 और 7 पर अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। साथ ही निचली अदालत का रिकॉर्ड तलब करते हुए प्रतिवादियों को छह सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने अगली सुनवाई तक 6 अगस्त 2026 और 16 मई 2024 के आदेशों के प्रभाव पर रोक लगा दी है, जिससे फिलहाल डॉ. बलदेव की बर्खास्तगी का मामला अनिर्णीत बना हुआ है।

