दीपावली पर गाय के गोबर से तैयार दीये, सजावटी सामान, धूप और भगवान की प्रतिमा भी मार्केट में आ गई है। इसे तैयार किया जा रहा है कोडरमा जिले के सतगावां प्रखंड स्थित पहलवान आश्रम में। गाय के गोबर से बने इन उत्पादों को त्योहार के बाद पौधों के लिए जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी डिमांड भी बढ़ रही है। दरअसल, राष्ट्रीय झारखंड सेवा संस्थान वर्ष 2004 से पर्यावरण और समाज कल्याण के काम कर रहा है। 15 हजार रुपए तक कमा रही महिलाएं
संस्थान ने गोबर से उपयोगी सामान बनाने की पहल शुरू की है। आसपास के गांवों की करीब 15 युवतियां और महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं। महिलाएं घर का काम निपटाने के बाद आश्रम पहुंचकर सामान बनाती हैं। यहां काम करने वाली पूनम देवी के मुताबिक, इस काम से उन्हें हर महीने 15 हजार रुपए तक की कमाई होती है। उन्होंने बताया कि इससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ बच्चों की पढ़ाई में भी योगदान दे पा रही हैं। आश्रम में गोबर से पारंपरिक दीये, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्तियां, स्वास्तिक और ॐ के प्रतीक, तोरण द्वार, कार के डैशबोर्ड के लिए छोटी गणेश मूर्तियां और सुगंधित धूप कप बनाए जा रहे हैं। धूप कप वातावरण को शुद्ध करने के लिए बनाए जाते हैं। कचरा प्रबंधन और पौधों के लिए प्राकृतिक खाद दीपावली के बाद अक्सर मिट्टी के दीये या अन्य सजावटी सामान अनुपयोगी होकर कचरे का रूप ले लेते हैं। इसके विपरीत, गोबर से बने दीये पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल और बायोडिग्रेडेबल हैं। त्योहार समाप्त होने के बाद इन्हें तोड़कर गमलों या बगीचे की मिट्टी में मिलाया जा सकता है। कुछ ही दिनों में विघटित होकर ये बेहतरीन जैविक खाद में बदल जाते हैं, जिससे पौधों की वृद्धि होती है और कचरे की समस्या भी नहीं होती। बेसहारा गोवंश का संरक्षण और बाजार विस्तार संस्थान के सचिव मनोज दांगी के अनुसार, अक्सर दूध देना बंद करने पर लोग गायों को इधर-उधर भटकने को छोड़ देते हैं। यदि उनके गोबर का व्यावसायिक उपयोग किया जाए, तो एक गाय के गोबर से बने उत्पादों से महीने में 12 से 15 हजार रुपए तक कमाए जा सकते हैं। इससे अनुपयोगी समझी जाने वाली गायों की देखरेख संभव हो रही है। वर्तमान में इन उत्पादों की मांग झारखंड और बिहार के कई जिलों में है। स्थानीय लोगों तक पहुंच बढ़ाने के लिए रांची और कोडरमा में प्रदर्शनियों और स्टॉलों के जरिए इनकी बिक्री की व्यापक तैयारी की गई है। दीपावली पर गाय के गोबर से तैयार दीये, सजावटी सामान, धूप और भगवान की प्रतिमा भी मार्केट में आ गई है। इसे तैयार किया जा रहा है कोडरमा जिले के सतगावां प्रखंड स्थित पहलवान आश्रम में। गाय के गोबर से बने इन उत्पादों को त्योहार के बाद पौधों के लिए जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी डिमांड भी बढ़ रही है। दरअसल, राष्ट्रीय झारखंड सेवा संस्थान वर्ष 2004 से पर्यावरण और समाज कल्याण के काम कर रहा है। 15 हजार रुपए तक कमा रही महिलाएं
संस्थान ने गोबर से उपयोगी सामान बनाने की पहल शुरू की है। आसपास के गांवों की करीब 15 युवतियां और महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं। महिलाएं घर का काम निपटाने के बाद आश्रम पहुंचकर सामान बनाती हैं। यहां काम करने वाली पूनम देवी के मुताबिक, इस काम से उन्हें हर महीने 15 हजार रुपए तक की कमाई होती है। उन्होंने बताया कि इससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ बच्चों की पढ़ाई में भी योगदान दे पा रही हैं। आश्रम में गोबर से पारंपरिक दीये, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्तियां, स्वास्तिक और ॐ के प्रतीक, तोरण द्वार, कार के डैशबोर्ड के लिए छोटी गणेश मूर्तियां और सुगंधित धूप कप बनाए जा रहे हैं। धूप कप वातावरण को शुद्ध करने के लिए बनाए जाते हैं। कचरा प्रबंधन और पौधों के लिए प्राकृतिक खाद दीपावली के बाद अक्सर मिट्टी के दीये या अन्य सजावटी सामान अनुपयोगी होकर कचरे का रूप ले लेते हैं। इसके विपरीत, गोबर से बने दीये पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल और बायोडिग्रेडेबल हैं। त्योहार समाप्त होने के बाद इन्हें तोड़कर गमलों या बगीचे की मिट्टी में मिलाया जा सकता है। कुछ ही दिनों में विघटित होकर ये बेहतरीन जैविक खाद में बदल जाते हैं, जिससे पौधों की वृद्धि होती है और कचरे की समस्या भी नहीं होती। बेसहारा गोवंश का संरक्षण और बाजार विस्तार संस्थान के सचिव मनोज दांगी के अनुसार, अक्सर दूध देना बंद करने पर लोग गायों को इधर-उधर भटकने को छोड़ देते हैं। यदि उनके गोबर का व्यावसायिक उपयोग किया जाए, तो एक गाय के गोबर से बने उत्पादों से महीने में 12 से 15 हजार रुपए तक कमाए जा सकते हैं। इससे अनुपयोगी समझी जाने वाली गायों की देखरेख संभव हो रही है। वर्तमान में इन उत्पादों की मांग झारखंड और बिहार के कई जिलों में है। स्थानीय लोगों तक पहुंच बढ़ाने के लिए रांची और कोडरमा में प्रदर्शनियों और स्टॉलों के जरिए इनकी बिक्री की व्यापक तैयारी की गई है।

