Banarasi Saree : बनारसी साड़ी के नाम पर की जा रही कालाबाजारी अब नहीं चल सकेगी। फ्रॉड को रोकने के लिए बुनकरों ने एक नई पहल की है और एक ऐसा ऐप तैयार किया है जो बारकोड स्कैन करके लोगों को असली और नकली बनारसी साड़ी की पहचान बताएगा। बुनकरों की पहल पर बनाए गए इस ऐप के जरिए न सिर्फ बनारसी साड़ी के नाम पर होने वाले कालाबाजारी को रोकने की कवायत शुरू की गई है, बल्कि पर्यटकों के साथ भी होने वाली ठगी काम हो सकेगी। इसके साथ ही लगातार हो रहे बुनकरों के पलायन पर भी रोक लग पाएगी।
विश्व के सबसे प्राचीनतम शहर में शामिल काशी अपनी बनारसी साड़ियों के लिए एक अलग पहचान रखती है। देश और दुनिया से आने वाले पर्यटक बनारसी साड़ी को खूब पसंद करते हैं, लेकिन बीते कुछ समय से बनारसी साड़ी के नाम पर सूरत में बनाई जाने वाली साड़ी को बेचा जा रहा है। एक तरफ इससे बुनकरों को हताशा हाथ लग रही है तो दूसरे तरफ पर्यटकों के साथ ठगी कर दुकानदारों के जरिए मोटी रकम वसूली जा रही है। परिणाम यह है कि इसका फायदा बुनकरों को नहीं मिल रहा है और बुनकर आर्थिक स्थिति से जूझ रहे हैं। वहीं इस मामले को देखते हुए बनारस के बुनकर संघ ने एक बारकोड एप्लीकेशन तैयार किया है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति इसे स्कैन करके असली और नकली बनारसी साड़ी की पहचान कर सकता है। सबसे खास बात यह है कि यह क्यूआर कोड सिर्फ बनारस में बनने वाली साड़ियों पर ही लगेगा, जिससे पर्यटकों के साथ हो रही ठगी पर भी रोक लगेगी।
क्यूआर पर मिलेगी पूरी जानकारी
इस एप्लीकेशन को तैयार करने वाले सहकारिता समिति से जुड़े पदाधिकारी शैलेश सिंह ने बताया कि वाराणसी में लाखों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं और बनारसी साड़ी की खरीदारी करते हैं। ऐसे में बुनकरों को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए सहकारिता समिति ने एक एप्लीकेशन तैयार किया है, जो बारकोड तकनीक पर काम करेगा। समिति ने बारकोड बनाकर बुनकरों को देना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि सबसे खास बात यह है कि वास्तविक बुनकरों को ही यह बारकोड दिया जा रहा है। इस बारकोड को रिटेल दुकानदारों को नहीं दिया जाएगा, ताकि असली बनारसी साड़ियों पर इन्हें लगाया जा सके। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि साड़ी की खरीदारी करने वाले लोग इस बारकोड को एप्लीकेशन के जरिए क्यूआर स्कैन करके पूरी जानकारी ले सकेंगे। साड़ी के मैन्युफैक्चरिंग डेट, बुनकर, साड़ी में किस धागे का प्रयोग हुआ है, साड़ी बनारसी है या बाहरी, इसके साथ ही साड़ी बनाने वाले कारीगर का नाम, पता और मोबाइल नंबर भी हासिल हो सकेगा।
उन्होंने बताया कि इसे इस्तेमाल करना बेहद ही आसान है। साड़ी की खरीदारी के वक्त बारकोड को स्कैन करते ही यदि पूरी जानकारी ग्राहकों को मिल जाती है, इसका मतलब यह है कि साड़ी पूरी तरह से बनारसी है और इसमें किसी तरह का फ्रॉड नहीं किया गया है। यदि जानकारी नहीं मिल पाती है तो इसका मतलब यह है कि वह बनारसी साड़ी नहीं है और कस्टमर के साथ धोखाधड़ी की जा रही है। यदि स्कैन करने पर साड़ी की टैगिंग नहीं दिख रही है इसका मतलब यह साड़ी नकली है और इसका कोई भी विवरण ऐप पर मौजूद नहीं है। उन्होंने बताया कि अब तक काशी के 30 प्रतिशत बुनकरों तक यह क्यूआर कोड पहुंचा जा चुका है।
एक हजार लोगों ने की खरीदारी
दरअसल, पिछले 5 वर्षों से बनारसी साड़ी का कारोबार सूरत की साड़ियों ने ओवरटेक कर लिया है और बनारसी साड़ियों के नाम पर सूरत की साड़ियों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। महज 300 रुपए की साड़ी 8 हजार से 10 हजार रुपए में टूरिस्ट को बेची जा रही है। ऐसे कई मामले सामने आने के बाद समिति ने क्यूआर टैग वाला स्कैनर तैयार किया। शैलेश ने बताया कि उन्हें उम्मीद है कि इस पहल से साड़ियों के नाम पर किया जा रहा फ्रॉड रुक जाएगा। उन्होंने बताया कि अब तक 20 से 30 फ़ीसदी दुकानदारों तक क्यूआर कोड पहुंच चुका है और बाकी कारोबारी तक इसे पहुंचाने की तेजी से कोशिश की जा रही है। शैलेश ने दावा किया कि अब तक एक हजार से ज्यादा लोग इसके जरिए असली बनारसी साड़ियों की खरीदारी कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह एप्लीकेशन सिर्फ एप्लीकेशन ही नहीं बल्कि बनारसी साड़ियों के बिक्री को फिर से जिंदा रखने और बुनकरों के पलायन को रोकने में मदद करेगा।


