शक्ति की उपासना के महापर्व शारदीय नवरात्र की महा नवमी पर बेगूसराय जिले के बखरी स्थित पुरानी दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। यहां 5 हजार से अधिक छागर (बकरों) की बलि दी गई। दूर-दराज के इलाकों से पहुंचे श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर मां दुर्गा को बलि चढ़ाने के लिए सुबह से ही कतारों में खड़े नजर आए। सुबह से मंदिर में जुटने लगे श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर बलि चढ़ाने के लिए श्रद्धालु अपने घरों से छागर लेकर अहले सुबह मंदिर परिसर पहुंचने लगे। सुबह की पहली किरण के साथ वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजा-अर्चना और मां भगवती के जयकारों के बीच बलि की प्रक्रिया शुरू हुई। मंदिर परिसर में चारों ओर माता के जयकारे गूंजते रहे। मंदिर प्रबंधन की ओर से पूरी प्रक्रिया पारंपरिक नियमों के अनुसार कराई गई। पोखर में स्नान के बाद शुरू होती है बलि की प्रक्रिया मंदिर के बगल में स्थित पोखर में स्नान करने के बाद श्रद्धालु अपने छागर को भी नहलाते हैं। इसके बाद मुख्य पुजारी छागर पर फूल और अक्षत छिड़कते हैं। फिर उसे बलि स्थल पर ले जाया जाता है। मंदिर परिसर में बने विशेष बलि स्थल पर दस से अधिक अनुभवी लोग पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार बलि की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इस दौरान एक खास नियम का पालन किया जाता है। बलि देने वाले श्रद्धालु और वहां मौजूद पुजारी माता के जयकारों के अलावा किसी अन्य तरह की बातचीत या शोर-शराबे से परहेज करते हैं। बलि के बाद छागर का शरीर संबंधित श्रद्धालु को लौटा दिया जाता है, जबकि उसका सिर मंदिर कमेटी के पास रखा जाता है। कमेटी इन सिरों को परमार वंशीय लोगों के माध्यम से समाज और बाजार में प्रसाद के रूप में वितरित करती है। बलि के दौरान निकलने वाले खून के प्रबंधन के लिए गहरे गड्ढे की व्यवस्था भी की गई थी। बच्चे के स्वस्थ होने की मन्नत पूरी हुई तो पांच साल से दे रहे बलि खगड़िया जिले के अलौली से आए श्रद्धालु विनोद यादव ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चे की गंभीर बीमारी से मुक्ति और उसके स्वस्थ होने की मन्नत बखरी वाली बड़ी मैया से मांगी थी। उनके अनुसार, बच्चा स्वस्थ हो गया। इसके बाद से वह पिछले पांच वर्षों से लगातार मंदिर में बलि देकर अपनी मन्नत पूरी करते आ रहे हैं। एक महिला श्रद्धालु ने बताया कि संतान सुख की कामना लेकर उन्होंने माता से प्रार्थना की थी। उनके अनुसार, उनकी मनोकामना पूरी हुई और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। इसी आस्था के चलते वह पिछले दो वर्षों से लगातार मंदिर में बलि देने आ रही हैं। 600 साल से अधिक पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास मंदिर कमेटी के सदस्यों के अनुसार, पुरानी दुर्गा स्थान की स्थापना परमार वंशीय अठखुट्टी ने की थी। उनका दावा है कि मंदिर का इतिहास 600 साल से अधिक पुराना है और इसकी परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। कमेटी के सदस्यों ने बताया कि शारदीय नवरात्र में महासप्तमी और महाअष्टमी की जागरण वाली रात के बाद मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद महा नवमी पर मुख्य रूप से बलि दी जाती है। उनके अनुसार, इस वर्ष भी 5 हजार से अधिक छागर की बलि दी गई। इस परंपरा का समापन भैंसे की बलि के साथ होता है। बखरी वाली बड़ी मैया के दरबार में दूर-दूर से पहुंचते हैं भक्त स्थानीय कौशल किशोर क्रांति ने बताया कि बखरी वाली बड़ी मैया के मंदिर में सैकड़ों वर्षों से बलि की परंपरा चली आ रही है। समय के साथ मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक फैली है। यहां बेगूसराय के अलावा बिहार के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु माता के दर्शन और मन्नत पूरी होने पर बलि देने पहुंचते हैं। मंदिर कमेटी से जुड़े लोगों और श्रद्धालुओं का कहना है कि महाअष्टमी की रात महिलाएं विधि-विधान से खोंइछा भरकर मन्नत मांगती हैं और महा नवमी पर मन्नत पूरी होने के बाद बलि चढ़ाती हैं। श्रद्धालुओं की इसी गहरी आस्था के कारण हर साल यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। शक्ति की उपासना के महापर्व शारदीय नवरात्र की महा नवमी पर बेगूसराय जिले के बखरी स्थित पुरानी दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। यहां 5 हजार से अधिक छागर (बकरों) की बलि दी गई। दूर-दराज के इलाकों से पहुंचे श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर मां दुर्गा को बलि चढ़ाने के लिए सुबह से ही कतारों में खड़े नजर आए। सुबह से मंदिर में जुटने लगे श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर बलि चढ़ाने के लिए श्रद्धालु अपने घरों से छागर लेकर अहले सुबह मंदिर परिसर पहुंचने लगे। सुबह की पहली किरण के साथ वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजा-अर्चना और मां भगवती के जयकारों के बीच बलि की प्रक्रिया शुरू हुई। मंदिर परिसर में चारों ओर माता के जयकारे गूंजते रहे। मंदिर प्रबंधन की ओर से पूरी प्रक्रिया पारंपरिक नियमों के अनुसार कराई गई। पोखर में स्नान के बाद शुरू होती है बलि की प्रक्रिया मंदिर के बगल में स्थित पोखर में स्नान करने के बाद श्रद्धालु अपने छागर को भी नहलाते हैं। इसके बाद मुख्य पुजारी छागर पर फूल और अक्षत छिड़कते हैं। फिर उसे बलि स्थल पर ले जाया जाता है। मंदिर परिसर में बने विशेष बलि स्थल पर दस से अधिक अनुभवी लोग पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार बलि की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इस दौरान एक खास नियम का पालन किया जाता है। बलि देने वाले श्रद्धालु और वहां मौजूद पुजारी माता के जयकारों के अलावा किसी अन्य तरह की बातचीत या शोर-शराबे से परहेज करते हैं। बलि के बाद छागर का शरीर संबंधित श्रद्धालु को लौटा दिया जाता है, जबकि उसका सिर मंदिर कमेटी के पास रखा जाता है। कमेटी इन सिरों को परमार वंशीय लोगों के माध्यम से समाज और बाजार में प्रसाद के रूप में वितरित करती है। बलि के दौरान निकलने वाले खून के प्रबंधन के लिए गहरे गड्ढे की व्यवस्था भी की गई थी। बच्चे के स्वस्थ होने की मन्नत पूरी हुई तो पांच साल से दे रहे बलि खगड़िया जिले के अलौली से आए श्रद्धालु विनोद यादव ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चे की गंभीर बीमारी से मुक्ति और उसके स्वस्थ होने की मन्नत बखरी वाली बड़ी मैया से मांगी थी। उनके अनुसार, बच्चा स्वस्थ हो गया। इसके बाद से वह पिछले पांच वर्षों से लगातार मंदिर में बलि देकर अपनी मन्नत पूरी करते आ रहे हैं। एक महिला श्रद्धालु ने बताया कि संतान सुख की कामना लेकर उन्होंने माता से प्रार्थना की थी। उनके अनुसार, उनकी मनोकामना पूरी हुई और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। इसी आस्था के चलते वह पिछले दो वर्षों से लगातार मंदिर में बलि देने आ रही हैं। 600 साल से अधिक पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास मंदिर कमेटी के सदस्यों के अनुसार, पुरानी दुर्गा स्थान की स्थापना परमार वंशीय अठखुट्टी ने की थी। उनका दावा है कि मंदिर का इतिहास 600 साल से अधिक पुराना है और इसकी परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। कमेटी के सदस्यों ने बताया कि शारदीय नवरात्र में महासप्तमी और महाअष्टमी की जागरण वाली रात के बाद मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद महा नवमी पर मुख्य रूप से बलि दी जाती है। उनके अनुसार, इस वर्ष भी 5 हजार से अधिक छागर की बलि दी गई। इस परंपरा का समापन भैंसे की बलि के साथ होता है। बखरी वाली बड़ी मैया के दरबार में दूर-दूर से पहुंचते हैं भक्त स्थानीय कौशल किशोर क्रांति ने बताया कि बखरी वाली बड़ी मैया के मंदिर में सैकड़ों वर्षों से बलि की परंपरा चली आ रही है। समय के साथ मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक फैली है। यहां बेगूसराय के अलावा बिहार के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु माता के दर्शन और मन्नत पूरी होने पर बलि देने पहुंचते हैं। मंदिर कमेटी से जुड़े लोगों और श्रद्धालुओं का कहना है कि महाअष्टमी की रात महिलाएं विधि-विधान से खोंइछा भरकर मन्नत मांगती हैं और महा नवमी पर मन्नत पूरी होने के बाद बलि चढ़ाती हैं। श्रद्धालुओं की इसी गहरी आस्था के कारण हर साल यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

