प्रसंगवश: …मैं तो साहब बन गया, एफआईआर क्यों नहीं?

प्रसंगवश: …मैं तो साहब बन गया, एफआईआर क्यों नहीं?

‘साला मैं तो साहब बन गया, साहब बनके कैसा तन गया, ये सूट मेरा देखो, ये बूट मेरा देखो..।’ छत्तीसगढ़ के जीएसटी विभाग के 42 टैक्स इंस्पेक्टर करीब 4-5 वर्षों तक कुछ ऐसे ही रौब झाड़तेरहे! ये वे टैक्स इंस्पेक्टर थे, जिन्हें 2021 और 2022 में विभागीय परीक्षा के माध्यम से पदोन्नत कर लिपिक से निरीक्षक बनाया गया था। भर्ती प्रक्रिया में फर्जीवाड़े की शिकायतों के बाद बनाई गई जांच समिति ने खामियां पाईं। जांच रिपोर्ट में हैरान कर देने वाले तथ्य सामने आए हैं, जैसे कि उन दोनों वर्षों में विभागीय परीक्षा के नतीजे घोषित होने के पहले ही उन 42 कर्मचारियों का चयन वाणिज्यिक कर निरीक्षक पद के लिए कर दिया गया था। जांच रिपोर्ट के आधार पर पदोन्नत किए गए सभी 42 टैक्स इंस्पेक्टरों का डिमोशन कर वापस मूल पद पर भेजकर लिपिक बना दिया गया।

अब सवाल यह उठता है कि क्या इतने बड़ेफर्जीवाड़े के उजागर होने के बाद उन टैक्स इंस्पेक्टरों को वापस लिपिक बना देना भर ही उनपर कार्रवाई और न्याय है? अगर जांच में उन्हें फर्जीवाड़े का दोषी पाया गया है तो उनपर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इन 42 दोषियों को बर्खास्त कर उनपर एफआईआर क्यों नहीं करवाई गई? जरा सोचिए कि जो लेनदेन और फर्जीवाड़ा करके अफसर बने थे, उन्होंने उस 4-5 वर्ष के कार्यकाल में अपने पद का कितना दुरुपयोग किया होगा? सरकार को चाहिए कि इन सभी 42 लोगों से उन 4-5 वर्षों के दौरान दिए गए वेतन-भत्ते की वसूली करे और एफआईआर करवाए। साथ ही उन अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, जिन्होंने बिना परीक्षा परिणाम आए ही चयन सूची जारी कर दी थी।

भर्ती-विभागीय परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना बड़ी चुनौती है। ऐसी अनियमितताएं न केवल योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन करती हैं, बल्कि व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास भी कम करती हैं। इस प्रकार के मामलों में त्वरित जांच और सख्त कार्रवाई से भविष्य में होने वाली गड़बड़ियों को रोका जा सकता है।-अनुपम राजीव राजवैद्य anupam.rajiv@in.patrika.com

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