देवास। धाराजी से निकली बोल-बम कांवड़ यात्रा शनिवार शाम करीब 6:45 बजे देवास पहुंची। इस यात्रा में श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच भक्ति का एक अनोखा रूप देखने को मिला, जहां कई कांवड़ यात्री अपने पैरों और कांवड़ों में घुंघरू बांधकर चल रहे थे। उनके हर कदम के साथ घुंघरुओं की आवाज वातावरण में गूंज रही थी। इस यात्रा की एक खास बात यह थी कि कुछ कांवड़ यात्रियों के पैरों में चोट या दर्द के कारण पट्टियां बंधी हुई थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने पैरों से घुंघरू नहीं उतारे और उसी उत्साह के साथ कांवड़ लेकर आगे बढ़ते रहे। यह उनके लिए भगवान भोलेनाथ के प्रति गहरी आस्था और समर्पण का प्रतीक था। मानसा निवासी कांवड़ यात्री अभिनंदन ने इस बारे में बताया। उनके अनुसार, पैरों में घुंघरू बांधकर यात्रा करना भोलेनाथ की भक्ति का एक स्वरूप है। चलते समय घुंघरुओं की लगातार आवाज मन को एकाग्र रखती है और यात्रा के दौरान ध्यान भटकने नहीं देती। कांवड़ में भी घुंघरू बांधने का उद्देश्य इसी भक्ति भाव को बनाए रखना है। अभिनंदन ने यह भी बताया कि लंबी यात्रा के कारण पैरों में दर्द और थकान होना स्वाभाविक है। कई बार उन्हें पैरों में पट्टी भी बांधनी पड़ती है, लेकिन उनकी आस्था के सामने शारीरिक दर्द गौण हो जाता है। उनके लिए घुंघरू इस यात्रा की पहचान बन गए हैं, इसलिए दर्द होने पर भी वे उन्हें उतारना नहीं चाहते। धाराजी से देवास तक की इस यात्रा में बड़ी संख्या में कांवड़ यात्री शामिल हुए। कुछ यात्री अपनी कांवड़ों को आकर्षक ढंग से सजाकर चल रहे थे, तो कुछ पूरे रास्ते “बोल-बम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष करते हुए आगे बढ़ रहे थे। घुंघरुओं की छनक ने इस भक्तिमय माहौल को और भी विशेष बना दिया। पैरों में बंधे घुंघरू और कांवड़ों से आती झंकार के बीच, श्रद्धालुओं के कदम बिना रुके लगातार अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहे, जो उनकी अटूट श्रद्धा को दर्शाता है।

