पूर्णिया- कोरटबारी में मन्नत पूरी होने पर बकरों की बलि:2007 से हो रही दुर्गा पूजा, नवमी पर खिचड़ी महाभोग, सप्तमी से नवमी तक सांस्कृतिक कार्यक्रम

पूर्णिया- कोरटबारी में मन्नत पूरी होने पर बकरों की बलि:2007 से हो रही दुर्गा पूजा, नवमी पर खिचड़ी महाभोग, सप्तमी से नवमी तक सांस्कृतिक कार्यक्रम

पूर्णिया के मधुबनी में स्थित कोरटबारी का माता शीतला मंदिर पुराना धार्मिक स्थल है। यहां श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतें लेकर मंदिर पहुंचते हैं। मंगलवार को महानवमी के दिन सैकड़ों श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने पहुंचे। बलि देने से पहले सभी बकरों को मां दुर्गा के सामने सजाकर रखा गया। 2007 में स्थापित की गई थी मां दुर्गा की प्रतिमा ऐतिहासिक शीतला मंदिर परिसर में ही वर्ष 2007 में मां दुर्गा का भव्य मंदिर बनवाया गया था। तभी से यहां हर साल मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा समिति के अध्यक्ष सुरेश सिंह बताते हैं कि वर्ष 2007 से ही मंदिर परिसर में दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी। तब से ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के लोग मिलकर हर साल पूरी श्रद्धा के साथ पूजा करते आ रहे हैं। मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने की परंपरा मंदिर परिसर में वर्ष 2007 से ही बकरे की बलि देने की परंपरा चली आ रही है। यहां शहरी क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु बकरे की बलि देते हैं। मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी होती है, वे महाष्टमी या महानवमी के दिन मां दुर्गा के सामने बकरे की बलि चढ़ाते हैं। इस परंपरा के बारे में पूजा समिति के अध्यक्ष सुरेश सिंह बताते हैं कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब मां दुर्गा ने असुरों का वध किया था, तभी से यह परंपरा चली आ रही है। असुरों के वध के प्रतीक के रूप में और पुरानी परंपरा को निभाने के लिए यहां बकरे की बलि दी जाती है। सप्तमी से नवमी तक सांस्कृतिक कार्यक्रम, महानवमी पर खिचड़ी महाभोग कोरटबारी शीतला और दुर्गा मंदिर परिसर में शारदीय नवरात्र के दौरान तीन दिनों तक उत्सव का माहौल रहता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। महानवमी के दिन मंदिर परिसर में खिचड़ी महाभोग का आयोजन भी किया जाता है। यह कार्यक्रम शाम 4 बजे से रात 10 बजे तक चलता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। आपसी सौहार्द और परंपरा का प्रतीक है मंदिर पूजा समिति के अन्य सदस्यों के अनुसार, यह पुरानी परंपरा स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है। लोग आपसी सौहार्द और श्रद्धा के साथ इसे आगे बढ़ा रहे हैं। आज यह मंदिर पूर्णिया के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है और लोगों की आस्था के बड़े केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। पूर्णिया के मधुबनी में स्थित कोरटबारी का माता शीतला मंदिर पुराना धार्मिक स्थल है। यहां श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतें लेकर मंदिर पहुंचते हैं। मंगलवार को महानवमी के दिन सैकड़ों श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने पहुंचे। बलि देने से पहले सभी बकरों को मां दुर्गा के सामने सजाकर रखा गया। 2007 में स्थापित की गई थी मां दुर्गा की प्रतिमा ऐतिहासिक शीतला मंदिर परिसर में ही वर्ष 2007 में मां दुर्गा का भव्य मंदिर बनवाया गया था। तभी से यहां हर साल मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा समिति के अध्यक्ष सुरेश सिंह बताते हैं कि वर्ष 2007 से ही मंदिर परिसर में दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी। तब से ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के लोग मिलकर हर साल पूरी श्रद्धा के साथ पूजा करते आ रहे हैं। मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि देने की परंपरा मंदिर परिसर में वर्ष 2007 से ही बकरे की बलि देने की परंपरा चली आ रही है। यहां शहरी क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु बकरे की बलि देते हैं। मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी होती है, वे महाष्टमी या महानवमी के दिन मां दुर्गा के सामने बकरे की बलि चढ़ाते हैं। इस परंपरा के बारे में पूजा समिति के अध्यक्ष सुरेश सिंह बताते हैं कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब मां दुर्गा ने असुरों का वध किया था, तभी से यह परंपरा चली आ रही है। असुरों के वध के प्रतीक के रूप में और पुरानी परंपरा को निभाने के लिए यहां बकरे की बलि दी जाती है। सप्तमी से नवमी तक सांस्कृतिक कार्यक्रम, महानवमी पर खिचड़ी महाभोग कोरटबारी शीतला और दुर्गा मंदिर परिसर में शारदीय नवरात्र के दौरान तीन दिनों तक उत्सव का माहौल रहता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। महानवमी के दिन मंदिर परिसर में खिचड़ी महाभोग का आयोजन भी किया जाता है। यह कार्यक्रम शाम 4 बजे से रात 10 बजे तक चलता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। आपसी सौहार्द और परंपरा का प्रतीक है मंदिर पूजा समिति के अन्य सदस्यों के अनुसार, यह पुरानी परंपरा स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है। लोग आपसी सौहार्द और श्रद्धा के साथ इसे आगे बढ़ा रहे हैं। आज यह मंदिर पूर्णिया के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है और लोगों की आस्था के बड़े केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।  

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