पितृपक्ष की हुई शुरूआत,काशी के गंगा घाट पर जुटे आस्थावान:14 दिन तिल-जौ और कुश हाथ में लेकर पितरों को किया जायेगा जल अर्पित

पितृपक्ष की हुई शुरूआत,काशी के गंगा घाट पर जुटे आस्थावान:14 दिन तिल-जौ और कुश हाथ में लेकर पितरों को किया जायेगा जल अर्पित

पितृ पक्ष की शुरुआत के साथ ही मोक्ष की नगरी काशी में पितरों के प्रति आस्था का अनूठा दृश्य देखने को मिल रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, पितृ ऋण से मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर वाराणसी पहुंच रहे हैं। पिशाचमोचन कुंड से लेकर गंगा घाटों तक सुबह से ही श्राद्धकर्म, तर्पण और पिंडदान कराने वालों की भीड़ जुट रही है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालु अपने पितरों का आह्वान कर उन्हें तिलांजलि दे रहे हैं। पितृ पक्ष के पहले दिन पिशाचमोचन कुंड परिसर में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। लोगों ने पुरोहितों के निर्देशन में विधि-विधान से अपने पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया गया और दान-दक्षिणा देकर पितरों की शांति की कामना की गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार पिशाचमोचन तीर्थ पर पिंडदान करने से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलने और मोक्ष प्राप्त होने की मान्यता है। पहले देखें 2 तस्वीर… 14 दिनों तक पितरों को दी जाएगी तिलांजलि काशी के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार इस बार पितृ पक्ष 14 दिनों का है। श्राद्ध पूर्णिमा के बाद आज से प्रतिपदा श्राद्ध के साथ पितृ पक्ष की शुरुआत हुई। इस दौरान श्रद्धालु अपने पितरों का आह्वान कर उन्हें जल और तिल अर्पित करते हैं। पितृ पक्ष में तिलांजलि के साथ पिंडदान और श्राद्धकर्म का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नाम, गोत्र और संकल्प के साथ कर्मकांड की शुरुआत करते हैं। पवित्र जल हाथ में लेकर पितरों का नाम लिया जाता है और मंत्रोच्चार के बीच जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद प्रेत आत्माओं की मुक्ति और पितरों की शांति के लिए तर्पण कराया जाता है। भगवान विष्णु से पितरों की मुक्ति और शांति की प्रार्थना की जाती है। कर्मकांड के अंत में पीपल के पेड़ में भी जल अर्पित किया जाता है। करीब तीन घंटे में पूरा होता है कर्मकांड पिशाचमोचन कुंड पर होने वाला श्राद्धकर्म कई चरणों में पूरा होता है। करीब तीन घंटे तक चलने वाली इस प्रक्रिया में संकल्प, तर्पण, पिंडदान, पूजा और दान-दक्षिणा की अलग-अलग विधियां शामिल होती हैं। पिंडदानी भगवत कथा का श्रवण भी करते हैं। पिशाचमोचन तीर्थ के उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी तट पर तीर्थ पुरोहित श्रद्धालुओं को कर्मकांड कराते हैं। यहां अप्रेत श्राद्ध, प्रेत श्राद्ध, अकाल मृत्यु और पितृ श्राद्ध की अलग-अलग विधियां कराई जाती हैं। कर्मकांड पूरा होने के बाद श्रद्धालु 84 लाख योनियों से मुक्ति के प्रतीक के रूप में 84 प्रकार के दान और दक्षिणा का संकल्प भी लेते हैं। इसमें वस्त्र, अन्न, जल, तेल, छाया, गाय, शैय्या, सोना और चांदी सहित विभिन्न वस्तुओं का दान किया जाता है। त्रिपिंडी और नारायण बलि का भी महत्व तीर्थ पुरोहितों के अनुसार श्राद्ध कर्म की कई विधियां हैं। इनमें त्रिपिंडी श्राद्ध, नारायण बलि, पार्वण श्राद्ध और गया श्राद्ध प्रमुख हैं। पितृ पक्ष के दौरान इन कर्मकांडों के लिए बड़ी संख्या में लोग काशी पहुंचते हैं। पिशाचमोचन कुंड के अलावा गंगा के प्रमुख घाटों पर भी श्रद्धालु अपने पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते नजर आ रहे हैं। घाट पुरोहित विवेकानंद पांडे और आचार्य विष्णुपति त्रिपाठी के अनुसार पितृ पक्ष श्रद्धालुओं के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है। अगले कई दिनों तक काशी के पिशाचमोचन और गंगा घाटों पर श्राद्धकर्म का सिलसिला जारी रहेगा। सुबह से ही घाटों पर मंत्रोच्चार, तर्पण और पिंडदान के बीच काशी का धार्मिक स्वरूप पूरी तरह पितृ भक्ति में डूबा नजर आ रहा है।

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