पिछले साल के अकाल का 176 करोड़ का आदान अनुदान अटका, इस बार भी अकाल जैसे हालात

पिछले साल के अकाल का 176 करोड़ का आदान अनुदान अटका, इस बार भी अकाल जैसे हालात

नागौर. जिले के किसानों के लिए मुसीबत खत्म होने का नाम नहीं ले रही। पिछले साल खरीफ की अतिवृष्टि और फसल खराबे से प्रभावित किसानों को मिलने वाला करीब 176 करोड़ रुपए का कृषि आदान-अनुदान अब तक खातों में नहीं पहुंचा है। दूसरी तरफ, इस बार यानी खरीफ 2026 में फिर अकाल जैसे हालात हैं, पहले जब फसलों को बारिश की आवश्यकता थी, तब बारिश हुई नहीं, जिसके कारण फसलें झुलसकर कर समय से पहले पक गई। बची-कुची फसलों को किसान समेटने लगे तो बेमौसम बारिश ने काटकर खेतों में सुखाने के लिए रखी फसलों के साथ पकी फसलों को भीगोकर खराब कर दिया। ऐसे में किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है। किसानों का कहना है कि ऐसे विकट समय में पिछले साल का आदान-अनुदान मिल जाए तो थोड़ी राहत मिल सकती है, लेकिन सरकार भी चिड़ा रही है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पिछले साल सरकार ने जिन गांवों को आपदा प्रभावित मानकर किसानों को राहत देने की प्रक्रिया शुरू की थी, उन किसानों को अभी तक राहत राशि का इंतजार है। जिला प्रशासन की ओर से 1 लाख 26 हजार 837 किसानों के लिए 1 अरब 76 करोड़ 3 लाख 51 हजार रुपए से अधिक के बिल राज्य सरकार को भेजे जा चुके हैं, लेकिन राशि किसानों के खातों में जमा नहीं हुई है। ऐसे में इस साल फसल खराबे की स्थिति पैदा होने के बाद किसानों के सामने दोहरी मार है। एक तरफ पिछले साल की राहत अटकी हुई है, दूसरी तरफ मौजूदा खरीफ की फसल भी मौसम की मार से प्रभावित हुई है।
पिछले साल 717 गांव माने गए थे अकाल प्रभावित
खरीफ 2082 (वर्ष 2025) में अतिवृष्टि और फसल खराबे के बाद जिले की विभिन्न तहसीलों के 717 गांवों को प्रभावित माना गया था। इन गांवों में 33 प्रतिशत से अधिक फसल खराबा होने के आधार पर कृषि आदान-अनुदान की प्रक्रिया शुरू की गई।
तहसीलवार स्थिति देखें तो डेगाना के 109, डेह के 47, जायल के 96, खींवसर के 96, मेड़ता के 57, मूण्डवा के 55, नागौर के 135, रियांबड़ी के 4 तथा सांजू के 61 गांव इसमें शामिल थे। इन गांवों के प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया पूरी कर बिल सरकार को भेजे गए, लेकिन महीनों गुजरने के बावजूद किसानों को भुगतान का इंतजार है।
1.26 लाख परिवारों की उम्मीद अटकी
आदान अनुदान केवल सरकारी कागजों में दर्ज कोई आंकड़ा नहीं है। यह उन किसानों के लिए संकट के समय मिलने वाली आर्थिक सहायता है, जिनकी फसल प्राकृतिक आपदा के कारण खराब हो गई थी। जिले के 1,26,837 किसानों के लिए 176 करोड़ रुपए से अधिक की राशि स्वीकृत होकर खातों में पहुंचने की प्रतीक्षा में है। किसान संगठनों और प्रभावित किसानों का कहना है कि यदि यह राशि समय पर मिल जाती तो पिछले सीजन के नुकसान के बाद खेती की अगली तैयारी में काफी मदद मिल सकती थी। अब खरीफ 2026 में भी फसल खराबे की स्थिति बनने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसानों का कहना है कि एक साल का नुकसान झेलने के बाद दूसरे साल भी फसल संकट में है, ऐसे में पिछली राहत राशि जल्द मिलना उनके लिए बेहद जरूरी है।

इस बार भी कई इलाकों में अकाल जैसे हालात
खरीफ 2026 की शुरुआत में किसानों को फसलों के लिए जिस समय अच्छी बारिश की जरूरत थी, उस समय पर्याप्त बारिश नहीं हुई। बारिश के अभाव में कई क्षेत्रों में फसलें कमजोर हो गईं। औसत उत्पादन काफी कम होने से नागौर, खींवसर, मूण्डवा, डेह और मेड़ता सहित जिले की अन्य तहसीलों में किसानों की स्थिति खराब है। किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि बारिश का समय निकलने के बाद हुई बारिश उनके लिए राहत के बजाय आफत बन गई। जिन खेतों में फसल पक चुकी थी, वहां किसान कटाई कर चुके थे। कई किसानों ने कटी हुई फसल खेतों में सुखाने के लिए रखी थी। इसी दौरान हुई बेमौसम बारिश से खेतों में पड़ी फसल भीग गई। मंडियों तक पहुंच चुकी कई कृषि जिंस भी बारिश की चपेट में आई। ऐसे में किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ा।
गांवों में बढ़ सकता है आर्थिक संकट
कृषि प्रधान जिले में फसल खराब होने का असर केवल किसान तक सीमित नहीं रहता। किसान की आय कम होने का सीधा असर बाजार, कृषि मजदूरी, पशुपालन, बीज-खाद की खरीद और छोटे कारोबार पर भी पड़ता नजर आ रहा है। किसानों के सामने खरीफ के बाद रबी की तैयारी भी होगी। इसके लिए बीज, खाद, जुताई, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों पर खर्च करना पड़ेगा। ऐसे में पिछले साल के नुकसान की राहत राशि किसानों के लिए इस समय आर्थिक संबल बन सकती है।

किसानों की मांग: पहले पुराना भुगतान, फिर नए नुकसान का आकलन
खजवाना के किसान शंकरलाल लामरोड़ ने कहा कि सरकार पिछले साल के लंबित आदान-अनुदान का भुगतान तत्काल करे। साथ ही इस साल बेमौसम बारिश और बारिश की कमी से हुए नुकसान का भी खेतवार सर्वे कराया जाए।
घोड़ारण के किसान रामकरण जांगू ने कहा कि केवल कागजी सर्वे से वास्तविक नुकसान का आकलन नहीं हो सकता। खेतों में जाकर स्थिति देखी जाए और जिन किसानों की फसल खराब हुई है, उन्हें नियमानुसार राहत दी जाए।

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