देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आई हनुमान जी के स्वरूप की धार्मिक परंपरा अब अंबाला कैंट में भी शुरू होने जा रही है। पानीपत में दशहरे से पहले हनुमान जी का स्वरूप धारण करने और शोभायात्रा निकालने की परंपरा से प्रेरित होकर लालकुर्ती हनुमान भक्त मंडल के युवाओं ने पहली बार लालकुर्ती बाजार स्थित सनातन धर्म मंदिर में हनुमान जी का विशेष स्वरूप स्थापित किया है। करीब दो साल से इस आयोजन की तैयारी कर रहे युवाओं का उद्देश्य धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ नई पीढ़ी को भी इससे जोड़ना है। मंडल के सदस्यों के अनुसार, देश के विभाजन के समय पाकिस्तान के लैय्या गांव से नंदा परिवार हनुमान जी के स्वरूप की धरोहर अपने साथ भारत लेकर आया था। इसके बाद यह परंपरा पानीपत में आगे बढ़ी। आज भी नंदा परिवार इस परंपरा से जुड़ा हुआ है और हनुमान जी के स्वरूप तैयार करता है। अब पानीपत में इस परंपरा से जुड़े रहे अंबाला के युवाओं के सहयोग और मार्गदर्शन में कैंट में भी इसकी शुरुआत की जा रही है। 22 सितंबर को हुई स्वरूप की स्थापना, 11 अक्टूबर से साधना का अगला चरण हनुमान भक्त मंडल के सदस्य ओमप्रकाश ने दैनिक भास्कर को बताया कि 22 सितंबर को मंदिर में हनुमान जी के स्वरूप की स्थापना की गई थी। अब 11 अक्टूबर से नवरात्र के पहले दिन साधना का अगला चरण शुरू होगा। इसके तहत माधव, अर्जुन और सोनू नाम के तीन युवा 10 दिन तक व्रत और साधना करेंगे। इनमें से माधव हनुमान जी का स्वरूप धारण करेंगे। इन दिनों तीनों युवा मंदिर में ही रहेंगे और ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे। सुबह-शाम पूजा-अर्चना, आरती, हनुमान चालीसा का पाठ और भोग लगाने की परंपरा निभाई जाएगी। साधना के दौरान जमीन या लकड़ी के तख्त पर सोना, नंगे पैर रहना, 24 घंटे में एक बार अन्न ग्रहण करना और लाल लंगोट धारण करना जैसे नियमों का पालन किया जाएगा। अंग्रेज अधिकारी की शर्त से जुड़ी है परंपरा की कहानी ओमप्रकाश ने बताया कि इस परंपरा को लेकर एक ऐतिहासिक कथा प्रचलित है। उनके अनुसार, आजादी से पहले पाकिस्तान में सरहंद के पास अंग्रेज अधिकारियों ने दशहरे का अवकाश बंद कर दिया था। इसके विरोध में हिंदू समाज के लोग अधिकारियों से मिले। बताया जाता है कि उस समय एक अंग्रेज अधिकारी ने हनुमान जी के समुद्र पार करने का उदाहरण देते हुए सरहंद का दरिया पार करने की चुनौती दी और इसके बाद दशहरे की छुट्टी देने की बात कही। ओमप्रकाश के मुताबिक, इस चुनौती को एक सिद्ध पुरुष ने स्वीकार किया और एक व्यक्ति को इसके लिए तैयार किया। उस व्यक्ति को सिंदूर लगाया गया और 40 दिन तक व्रत करवाए गए। इसके बाद उसके दरिया पार करने की कथा प्रचलित हुई। मंडल के सदस्यों के अनुसार, इसी घटना को हनुमान स्वरूप धारण करने की परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह विवरण मंडल के सदस्यों द्वारा बताई गई परंपरागत मान्यता पर आधारित है। उन्होंने बताया कि विभाजन के बाद हनुमान जी का स्वरूप पानीपत लाया गया। तभी से वहां दशहरे से पहले यह परंपरा निभाई जा रही है। अब अंबाला कैंट के युवा भी इसे आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। 18 से 20 अक्टूबर तक होंगे धार्मिक कार्यक्रम मंडल के सदस्य महिंदर रेखी ने दैनिक भास्कर को बताया कि लालकुर्ती के युवाओं ने पहली बार पानीपत से बालाजी का स्वरूप लाकर अंबाला में इस परंपरा की शुरुआत की है। युवाओं का उद्देश्य सिर्फ धार्मिक आयोजन करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इससे जोड़ना है। उन्होंने बताया कि आयोजन के दौरान भोर में प्रभातफेरी निकाली जाएगी, जिसमें श्रद्धालु हनुमान भक्ति करते हुए शामिल होंगे। नवमी के दिन दंडवत की धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी। 18, 19 और 20 अक्टूबर को विशेष कार्यक्रम होंगे। वहीं, 20 अक्टूबर को शाम 4 बजे हनुमान जी के स्वरूप के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। इसमें लालकुर्ती और आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। हल्की लकड़ी, कागज और शीशों से तैयार होता है स्वरूप मंडल के सदस्य दशमेश चंद्र ने बताया कि हनुमान जी का स्वरूप इस परंपरा का प्रमुख आकर्षण होता है। इसके मुकुट और चेहरे को तैयार करने के लिए हल्की लकड़ी, पेपर मैश यानी कागज से बनी मजबूत सामग्री, शीशे, गोटा और सुनहरी किनारियों का इस्तेमाल किया जाता है। चेहरे पर चमकीले नारंगी और लाल सिंदूर से सजावट की जाती है। इसके बाद शीशे, गोटा और सुनहरी किनारियां लगाकर स्वरूप को भव्य रूप दिया जाता है। अंबाला कैंट में पहली बार शुरू हो रही यह परंपरा पाकिस्तान से पानीपत और अब अंबाला तक पहुंची धार्मिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश है। युवाओं को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी इसी तरह आयोजन जारी रहेगा और अधिक श्रद्धालु इससे जुड़ेंगे।

