बरेली के बहेड़ी ब्लॉक के गांव बड़ौरा की 29 वर्षीय सुशीला देवी ने मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन को रोजगार का जरिया बनाकर अपनी अलग पहचान बनाई है। वह हनी महिला स्वयं सहायता समूह का संचालन कर रही हैं। सरकारी योजनाओं से मिली आर्थिक मदद और अपने प्रयासों से उन्होंने कारोबार को लगातार बढ़ाया। विभाग के अनुसार, सुशीला जनपद की पहली करोड़पति दीदी बनी हैं। उनके समूह से जुड़ी 17 महिलाएं नियमित रूप से आजीविका कमा रही हैं, जबकि 50 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का दावा किया गया है। समूह से शुरू किया मधुमक्खी पालन का काम
ग्राम पंचायत बड़ौरा की रहने वाली सुशीला ने 23 नवंबर 2023 को हनी महिला स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की थी। शुरुआत में संसाधन सीमित थे, लेकिन उन्होंने मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन का प्रशिक्षण लेकर वैज्ञानिक तरीके से काम शुरू किया। इसके बाद शहद की गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे उनके उत्पाद की मांग बढ़ती गई और कारोबार का दायरा भी बढ़ा। सरकारी मदद से बढ़ाया उत्पादन
सुशीला के समूह को रिवॉल्विंग फंड से 30 हजार रुपए और सामुदायिक निवेश फंड से करीब 1.50 लाख रुपए की सहायता मिली। ब्लॉक मिशन प्रबंधन इकाई बहेड़ी के सहयोग से मुख्यमंत्री युवा उद्यम विकास योजना के तहत 3.50 लाख रुपए की धनराशि भी मिली। इससे उन्होंने 100 उन्नत मधुमक्खी बॉक्स के साथ हनी प्रोसेसिंग और बॉटलिंग यूनिट स्थापित की। हर महीने करीब 2.50 लाख का कारोबार
सुशीला के अनुसार उनका समूह वर्तमान में हर महीने करीब 2.50 लाख रुपए का कारोबार कर रहा है। बरेली के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में छात्राओं की पोषण जरूरतों को देखते हुए उनके समूह से शुद्ध शहद की आपूर्ति भी की जा रही है। सरकारी आवासीय विद्यालयों तक अपने उत्पाद की पहुंच को वह समूह की बड़ी उपलब्धि मानती हैं। 50 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार से जोड़ा
समूह से जुड़ी 17 महिलाएं नियमित रूप से आजीविका कमा रही हैं। इनमें एक दिव्यांग महिला भी शामिल है। सुशीला का कहना है कि मधुमक्खी पालन के काम को आगे बढ़ाकर उन्होंने आसपास की 50 से ज्यादा महिलाओं को भी रोजगार के अवसरों से जोड़ा है। उनका लक्ष्य शहद उत्पादन को और बड़े स्तर पर ले जाना है। कृषि आजीविका सखी बनकर दे रहीं प्रशिक्षण
उद्यम चलाने के साथ सुशीला कृषि आजीविका सखी के रूप में भी काम कर रही हैं। वह गांवों में महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने, मधुमक्खी पालन अपनाने और स्वरोजगार शुरू करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने से परिवार की स्थिति भी बदलती है। अब राष्ट्रीय स्तर पर कारोबार बढ़ाने की तैयारी
केंद्र सरकार की मधु क्रांति योजना के तहत उनके उद्यम के लिए ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया चल रही है। सुशीला के अनुसार इससे शहद उत्पादन को और बड़े स्तर पर ले जाने में मदद मिलेगी। उनके समूह को नेशनल बी बोर्ड से रजिस्ट्रेशन और लाइफटाइम मेंबरशिप भी मिल चुकी है। स्कूलों में शहद देने की उम्मीद
सुशीला ने बताया कि जिलाधिकारी ने उनके काम की सराहना की है। उन्होंने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिए हैं कि जनपद के प्राथमिक विद्यालयों में बुधवार को बच्चों को दिए जाने वाले दूध के साथ शहद देने की व्यवस्था की संभावना देखी जाए। सुशीला का कहना है कि ऐसा होने पर स्थानीय स्तर पर उनके समूह के शहद की मांग और कारोबार दोनों बढ़ सकते हैं। गांव की महिलाओं के लिए बनी मिसाल
सुशीला की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार की संभावनाएं दिखाती है। स्वयं सहायता समूह से शुरू हुआ काम अब प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और सरकारी संस्थानों तक शहद की सप्लाई तक पहुंच चुका है। सुशीला का कहना है कि मेहनत, प्रशिक्षण और योजनाओं का सही इस्तेमाल कर गांव की महिलाएं भी अपना कारोबार खड़ा कर सकती हैं।

