अयोध्या विधानसभा सीट पर सपा ने पांच महीने पहले ही तेजनारायण पांडेय ‘पवन’ को उम्मीदवार घोषित कर चुनावी तस्वीर साफ कर दी है। विधानसभा चुनाव से काफी पहले हुई इस घोषणा को सिर्फ टिकट का फैसला नहीं, बल्कि अयोध्या की बदलती सियासी जमीन पर एक रणनीतिक कदम के तौर पर भी देखा जा रहा है। खासकर तब, जब सत्तापक्ष के एक प्रभावशाली नेता के सपा में आने की चर्चाएं भी तेज हैं। अयोध्या सीट का पिछले तीन चुनावों का आंकड़ा देखें तो मुकाबला लगातार भाजपा और सपा के बीच रहा है। 2012 में सपा के पवन पांडेय ने भाजपा के लल्लू सिंह को 5,405 वोट से हराया था। पवन को 55,262 वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 49,857 वोट मिले। वोट शेयर में भी सपा मामूली बढ़त के साथ करीब 29% और भाजपा करीब 26% पर रही थी। इसके बाद 2017 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भाजपा के वेद प्रकाश गुप्ता ने पवन पांडेय को 50,440 वोटों के बड़े अंतर से हराया। वेद प्रकाश को 1,07,014 वोट मिले, जबकि पवन पांडेय 56,574 वोट पर सिमट गए। भाजपा का वोट शेयर करीब 49.2% रहा, जबकि सपा 26% पर रही। बसपा को भी 39,554 वोट मिले, जिससे विपक्षी वोटों के बंटवारे का असर साफ दिखा। 2022 में भाजपा ने सीट तो बचा ली, लेकिन सपा ने अपना प्रदर्शन काफी मजबूत किया। वेद प्रकाश गुप्ता को 1,13,414 वोट मिले, जबकि पवन पांडेय को 93,424 वोट मिले। जीत का अंतर घटकर 19,990 वोट रह गया। भाजपा का वोट शेयर 49.04% रहा, जबकि सपा 40.40% तक पहुंच गई। बसपा को 17,706 वोट मिले। यानी पांच साल में सपा का वोट शेयर करीब 14 प्रतिशत अंक बढ़ा, जबकि भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग स्थिर रहा। यही आंकड़े 2027 की लड़ाई को दिलचस्प बनाते हैं। 2017 में भाजपा की बढ़त 50 हजार से ज्यादा थी, जो 2022 में घटकर करीब 20 हजार रह गई। दूसरी ओर पवन पांडेय के नेतृत्व में सपा का वोट बैंक 56 हजार से बढ़कर 93 हजार से ज्यादा हो गया। ऐसे में अब सपा की रणनीति भाजपा के खिलाफ इस बढ़त को जीत में बदलने की होगी। सत्तापक्ष के नेता पर टिकी नजर इसी बीच सत्तापक्ष के एक प्रभावशाली नेता के सपा में शामिल होने की चर्चाएं इस मुकाबले को और रोचक बना रही हैं। सूत्रों के मुताबिक नेता साइकिल की सवारी के लिए इच्छुक हैं और अक्टूबर तक का समय चाहते हैं। पार्टी में चर्चा है कि अखिलेश यादव उन्हें ज्यादा इंतजार कराने के बजाय चुनाव से पहले ही अपने पाले में लाना चाहते हैं। इस कवायद में दूसरे जिले के एक सपा सांसद की भूमिका अहम बताई जा रही है। दावा है कि संबंधित नेता को मिल्कीपुर (सु.) के बजाय जिले की किसी सामान्य सीट से चुनाव लड़ाने का विकल्प दिया गया है। ऐसे में पवन पांडेय की पांच महीने पहले उम्मीदवारी की घोषणा को भी इसी बड़े राजनीतिक प्लान से जोड़कर देखा जा रहा है। यानी अयोध्या में मुकाबला सिर्फ पुराने चेहरे बनाम पुराने चेहरे का नहीं होगा। 2012 की सपा जीत, 2017 की भाजपा की बड़ी जीत और 2022 में घटा जीत का अंतर तीनों आंकड़े बता रहे हैं कि 2027 में अयोध्या सीट पर सियासी लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प होने वाली है।

