इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज के विभागाध्यक्ष (विधि) और बॉयज हॉस्टल के वार्डन पर लगे जातिगत टिप्पणी और भेदभाव के गंभीर आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। इस संबंध में संस्थान के एक पीएचडी शोध छात्र और बी.ए. एल.एल.बी. के छात्र द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने मामले की निष्पक्ष जांच और प्रभावित छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ये आरोप बेहद गंभीर हैं और इनकी निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। क्या है मामला जानिए
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता छात्र का आरोप है कि उसने विश्वविद्यालय के कुलपति को ईमेल के जरिए शिकायत भेजी थी, जिसमें उन्होंने लॉ विभागाध्यक्ष पर जातिगत आधार पर मानसिक उत्पीड़न, भेदभावपूर्ण मूल्यांकन और अभद्र टिप्पणियां करने का आरोप लगाया था। छात्र का कहना था कि उसके द्वारा लगातार रिमाइंडर भेजने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोपी विभागाध्यक्ष को बचाने का काम किया और कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। छात्र ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं का किसी निष्पक्ष पक्ष से पुनर्मूल्यांकन कराने और अपनी पहचान गोपनीय रखने की गुहार लगाई थी। कोर्ट का कड़ा रुख
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति को निर्देश दिया है कि वे छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन करें। इस प्रक्रिया में संबंधित विभागाध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं होगी और मूल्यांकनकर्ता को छात्र व पूर्व शिक्षक की पहचान से अनजान रखा जाएगा। समिति को एक हफ्ते के भीतर अपनी रिपोर्ट बंद लिफाफे में हाईकोर्ट को सौंपनी होगी। जातिगत उत्पीड़न की जांच करें
इसके साथ ही, जातिगत उत्पीड़न के आरोपों की विस्तृत जांच के लिए अदालत ने स्मॉल कॉज कोर्ट की जज अर्चना सिंह-I और विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को जांच अधिकारी नियुक्त किया है। यह जांच टीम यह पता लगाएगी कि क्या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के छात्रों के साथ कोई जातिगत भेदभाव हुआ है और क्या विश्वविद्यालय ने शिकायतों पर नियमानुसार कार्रवाई की थी। जांच अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी भी छात्र की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखें। कुलपति को कड़े आदेश
अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि याचिकाकर्ता छात्रों को इस न्यायिक प्रक्रिया या शिकायत के कारण किसी भी प्रकार के शैक्षणिक या प्रशासनिक नुकसान का सामना न करना पड़े। साथ ही, आरोपी विभागाध्यक्ष को तत्काल प्रभाव से सभी प्रशासनिक जिम्मेदारियों, हॉस्टल मामलों और याचिकाकर्ता छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से पूरी तरह अलग करने का आदेश दिया गया है। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय से यूजीसी के नियमों के तहत गठित इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल और एससी/एसटी शिकायत निवारण समिति के गठन व कार्रवाई पर भी हलफनामा मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 को तय की गई है।

