नगर निगम के 272 प्लॉट के बहुचर्चित घोटाले मामले में उदयपुर कोर्ट ने पूर्व जिला अल्पसंख्यक महिला अधिकारी हेमलता कांकरिया, उनके पति निरंजन मोगरा सहित तीन आरोपियों की जमानत खारिज कर दी। अभियोजन अधिकारी ने आरोपियों की ओर से पेश जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामले में अब तक की जांच में सामने आया कि यूआईटी से नगर निगम को केवल 3551 भूखंडों की फाइल ट्रांसफर की गई थीं। लेकिन जब निगम के प्रॉपर्टी रजिस्टर की जांच की गई तो उसमें 6959 एंट्रियां दर्ज पाई गईं। साथ ही भूखंड संख्या 115 के संबंध में गलत दस्तावेज तैयार कर बेचने और राशि के लेन-देन के तथ्य भी जांच में सामने आए हैं। वहीं, कोर्ट ने केस डायरी का अध्ययन किया। इसमें सामने आया कि आरोपी महिला हेमलता के खिलाफ पहले से अन्य आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने बताया- आरोपियों की आपराधिक हिस्ट्री, अपराध की गंभीरता, साक्ष्य और परिस्थितियों के मद्देनजर जमानत का लाभ देना उचित नहीं है। बता दें, उदयपुर एसओजी ने करीब सप्ताहभर पहले हेमलता कांकरिया और उनके पति को जोधपुर से गिरफ्तार किया था। वहीं, दिनेश मेहता को गुजरात से पकड़ा था। नगर निगम ने फर्जी दस्तावेजों को प्रमाणित कर लीज डीड जारी की जांच में सामने आया कि यूआईटी से प्राप्त मूल कागजों में कुछ गलत आवंटन पत्र पाए गए थे। आवंटन पत्रों में मूल राशि जमा नहीं होने के बावजूद मुहर लगाई गई थी। बड़ी बात ये है कि नगर निगम द्वारा इन फर्जी दस्तावेजों को प्रमाणित और सही मानते हुए संबंधित व्यक्तियों को लीज डीड जारी कर दी गई। ये है पूरा मामला जानकारी के अनुसार- 272 प्लॉटों के घोटाले में साल 2022 में रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इसमें बताया गया था कि आरोपियों ने नगर निगम के अधिकारी-कर्मचारियों की मिलीभगत से हिरण मगरी सेक्टर-11 में निगम के 546 नंबर प्लॉट के फर्जी दस्तावेज तैयार कराए। फर्जी व्यक्ति किशन पटेल के नाम से निगम में लीज डीड और नामांतरण पत्र जारी करवा लिए। फिर सलूंबर निवासी अनिल कचौरिया को 50.01 लाख में बेच दिया। मामले में एसओजी ने जांच करते हुए आरोपी राजेंद्र धाकड़ को गिरफ्तार किया था। पूछताछ में सामने आया कि इसने एकलव्य बस्ती मल्लातलाई निवासी किशनलाल गमेती के बैंक खाते में 7 लाख रुपए जमा कराए थे। किशन ने यह रुपए निकालकर किशन मारवाड़ी और राकेश सोलंकी को दिए। दोनों ने पैसे विक्रम ताकड़िया तक पहुंचाए थे। बता दें कि यूडीए ने साल 2012 में नगर निगम को कुछ कॉलोनियां ट्रांसफर की थी। इनमें कई भूखंड खाली और अधिकांश कॉर्नर के थे। सार-संभाल नहीं करने से लोगों ने इन पर कब्जा कर लिया। कई भूखंडों के फर्जी दस्तावेज बनवाकर नामांतरण खुलवा लिए गए और कुछ दलालों को बेच दिए।


