नालंदा जिले में सरकारी जलकरों की नीलामी को लेकर मत्स्य विभाग की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है। 14 प्रखंडों के कुल 361 जलकरों की बंदोबस्ती 2 चरणों में कराने की योजना बनाई गई थी, जिसका पहला चरण हाल ही में समाप्त हुआ। पहले चरण के तहत 10 प्रखंडों के 262 जलकरों के लिए पहले सीमित डाक और बाद में खुली बोली भी आयोजित की गई, लेकिन नतीजा बेहद निराशाजनक रहा। 10 प्रखंडों में से महज तीन प्रखंडों के केवल छह जलकरों की ही बंदोबस्ती हो सकी। इनमें हिलसा के 4 और गिरियक और रहुई का एक-एक जलकर शामिल है। बाकी 256 जलकरों के लिए विभाग को कोई खरीदार ही नहीं मिला। अब दूसरे चरण में 4 प्रखंडों के 99 जलकरों की बंदोबस्ती एक अक्टूबर तक पूरी करनी है, लेकिन अब तक एक भी समिति के आगे न आने से विभाग के हाथ-पांव फूल रहे हैं। अस्तित्व खोते जलकरों पर भू-माफियाओं का कब्जा नीलामी से मछली पालकों के पीछे हटने की सबसे बड़ी वजह जलकरों पर हुआ बेतहाशा अतिक्रमण और जल संकट है। मत्स्यजीवी सहयोग समितियों के अनुसार अधिकांश सरकारी आहर, पोखर और तालाब अब अपने मूल स्वरूप में नहीं बचे हैं। कई जलकर सूखकर खेत-खलिहान में बदल चुके हैं, तो कई जगहों पर भू-माफियाओं ने सरकारी जलकरों की जमीन पर अवैध तरीके से घर और दुकानें तक खड़ी कर ली हैं। अतिक्रमण हटाने और सीमांकन कराने के लिए मत्स्य विभाग ने जिला प्रशासन के माध्यम से संबंधित अंचलाधिकारियों को कई बार पत्राचार किया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर नोटिस अंचल कार्यालयों की फाइलों में धूल फांक रहे हैं। इसके अलावा बारिश की कमी से सूखे पड़े तालाबों में मछली उत्पादन करना संभव नहीं दिख रहा, जिसके चलते समिति के सदस्यों ने बोली लगाने से सीधे हाथ खड़े कर लिए। राजस्व बचाने का फॉर्मूला भी रहा बेअसर बंदोबस्ती में सुस्ती को देखते हुए विभाग ने इस बार सिर्फ एक साल के लिए अल्पकालिक पट्टा देने का निर्णय लिया था, ताकि सरकारी राजस्व का नुकसान न हो और जलकर भी चालू रहें। हालांकि विभाग की इस उम्मीद पर भी पानी फिर गया है। जिले भर में 2108.906 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले करीब 829 जलकर मौजूद हैं। पिछले वर्ष 494 जलकरों की बंदोबस्ती से विभाग को 58.21 लाख रुपये का सालाना राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, 350 से अधिक जलकरों के बंदोबस्त न होने से सरकार को हर साल करीब 20 लाख रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। विभागीय नियमों के तहत पहले प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति, फिर उसके सदस्यों और अंत में आम लोगों के लिए खुली डाक कराई जाती है, लेकिन पानी और जमीन के अभाव में यह पूरी प्रक्रिया बेअसर साबित हो रही है। एक अक्टूबर तक खुली डाक से बंदोबस्ती का आखिरी मौका जिला मत्स्यपालन पदाधिकारी शंभु प्रसाद ने बताया कि पहले चरण में छह जलकरों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और दूसरे चरण की अंतिम समय-सीमा एक अक्टूबर तय की गई है। उन्होंने इच्छुक किसानों और मत्स्यपालकों से जिला मत्स्य कार्यालय से संपर्क करने की अपील की है। विभाग के मुताबिक मछलीपालकों के पास अभी भी चार प्रखंडों में बंदोबस्ती लेने का अवसर बचा हुआ है। गिरियक के 19, राजगीर के 14 और सरमेरा के 24 जलकरों के लिए 28, 29 और 30 तारीख को खुली डाक कराई जा रही है। वहीं चंडी प्रखंड के 42 जलकरों के लिए 29, 30 और 01 अक्टूबर को खुली डाक होगी, जिसमें कोई भी इच्छुक व्यक्ति अधिकतम बोली लगाकर जलकर का पट्टा हासिल कर सकता है। नालंदा जिले में सरकारी जलकरों की नीलामी को लेकर मत्स्य विभाग की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है। 14 प्रखंडों के कुल 361 जलकरों की बंदोबस्ती 2 चरणों में कराने की योजना बनाई गई थी, जिसका पहला चरण हाल ही में समाप्त हुआ। पहले चरण के तहत 10 प्रखंडों के 262 जलकरों के लिए पहले सीमित डाक और बाद में खुली बोली भी आयोजित की गई, लेकिन नतीजा बेहद निराशाजनक रहा। 10 प्रखंडों में से महज तीन प्रखंडों के केवल छह जलकरों की ही बंदोबस्ती हो सकी। इनमें हिलसा के 4 और गिरियक और रहुई का एक-एक जलकर शामिल है। बाकी 256 जलकरों के लिए विभाग को कोई खरीदार ही नहीं मिला। अब दूसरे चरण में 4 प्रखंडों के 99 जलकरों की बंदोबस्ती एक अक्टूबर तक पूरी करनी है, लेकिन अब तक एक भी समिति के आगे न आने से विभाग के हाथ-पांव फूल रहे हैं। अस्तित्व खोते जलकरों पर भू-माफियाओं का कब्जा नीलामी से मछली पालकों के पीछे हटने की सबसे बड़ी वजह जलकरों पर हुआ बेतहाशा अतिक्रमण और जल संकट है। मत्स्यजीवी सहयोग समितियों के अनुसार अधिकांश सरकारी आहर, पोखर और तालाब अब अपने मूल स्वरूप में नहीं बचे हैं। कई जलकर सूखकर खेत-खलिहान में बदल चुके हैं, तो कई जगहों पर भू-माफियाओं ने सरकारी जलकरों की जमीन पर अवैध तरीके से घर और दुकानें तक खड़ी कर ली हैं। अतिक्रमण हटाने और सीमांकन कराने के लिए मत्स्य विभाग ने जिला प्रशासन के माध्यम से संबंधित अंचलाधिकारियों को कई बार पत्राचार किया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर नोटिस अंचल कार्यालयों की फाइलों में धूल फांक रहे हैं। इसके अलावा बारिश की कमी से सूखे पड़े तालाबों में मछली उत्पादन करना संभव नहीं दिख रहा, जिसके चलते समिति के सदस्यों ने बोली लगाने से सीधे हाथ खड़े कर लिए। राजस्व बचाने का फॉर्मूला भी रहा बेअसर बंदोबस्ती में सुस्ती को देखते हुए विभाग ने इस बार सिर्फ एक साल के लिए अल्पकालिक पट्टा देने का निर्णय लिया था, ताकि सरकारी राजस्व का नुकसान न हो और जलकर भी चालू रहें। हालांकि विभाग की इस उम्मीद पर भी पानी फिर गया है। जिले भर में 2108.906 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले करीब 829 जलकर मौजूद हैं। पिछले वर्ष 494 जलकरों की बंदोबस्ती से विभाग को 58.21 लाख रुपये का सालाना राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, 350 से अधिक जलकरों के बंदोबस्त न होने से सरकार को हर साल करीब 20 लाख रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। विभागीय नियमों के तहत पहले प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति, फिर उसके सदस्यों और अंत में आम लोगों के लिए खुली डाक कराई जाती है, लेकिन पानी और जमीन के अभाव में यह पूरी प्रक्रिया बेअसर साबित हो रही है। एक अक्टूबर तक खुली डाक से बंदोबस्ती का आखिरी मौका जिला मत्स्यपालन पदाधिकारी शंभु प्रसाद ने बताया कि पहले चरण में छह जलकरों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और दूसरे चरण की अंतिम समय-सीमा एक अक्टूबर तय की गई है। उन्होंने इच्छुक किसानों और मत्स्यपालकों से जिला मत्स्य कार्यालय से संपर्क करने की अपील की है। विभाग के मुताबिक मछलीपालकों के पास अभी भी चार प्रखंडों में बंदोबस्ती लेने का अवसर बचा हुआ है। गिरियक के 19, राजगीर के 14 और सरमेरा के 24 जलकरों के लिए 28, 29 और 30 तारीख को खुली डाक कराई जा रही है। वहीं चंडी प्रखंड के 42 जलकरों के लिए 29, 30 और 01 अक्टूबर को खुली डाक होगी, जिसमें कोई भी इच्छुक व्यक्ति अधिकतम बोली लगाकर जलकर का पट्टा हासिल कर सकता है।

