शारदीय नवरात्र में झालावाड़ के नानादेवी मातादी मंदिर में नौ दिनों तक भक्ति और आस्था का विशेष माहौल रहता है। पनवाड़ी की मातादी के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में नवरात्र के प्रथम दिन घट स्थापना के साथ धार्मिक अनुष्ठान शुरू होते हैं। नौ दिनों तक अखंड ज्योत प्रज्वलित रखी जाती है और प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ होता है। नवमी पर हवन तथा दशहरे पर मां सहित मंदिर परिसर में विराजित देवी-देवताओं का चोला और शृंगार कर संध्याकालीन महाआरती की जाती है। चंद्रसरोवर यानी गांवड़ी तालाब के किनारे स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सुंदरता और परंपराओं का संगम है। तालाब किनारे प्राकृतिक सुंदरता के बीच विराजित हैं मां नानादेवी मातादी मंदिर चंद्रसरोवर यानी गांवड़ी तालाब के किनारे बना हुआ है। मंदिर परिसर में बरगद, पीपल और नीम के बड़े-बड़े पेड़ हैं, जिनकी ठंडी छांव श्रद्धालुओं को सुकून देती है। तालाब के आसपास का शांत वातावरण और ठंडी हवा भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराती है। धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक सुंदरता भी इस मंदिर को खास बनाती है। श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, मनोकामना पूरी होने पर करते हैं गोठ मंदिर को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु गोठ का आयोजन करते हैं। इस दौरान मां को भोग लगाकर प्रसाद चढ़ाया जाता है और बाद में उसे सभी श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। यह परंपरा भक्तों की श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता को दर्शाती है। एक ही परिसर में अनेक देवी-देवताओं के दर्शन मंदिर परिसर में मां नानादेवी के साथ अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इनमें केसरीबाई, झूमादेवी, नागकन्या, गणेशजी, चौसठ योगिनी, संतोषी माता, काली कंकाली, झुंड भैरू, चामुंडा माता, कालाजी, बजरंगबली, नाहरसिंगी और सगसजी महाराज सहित शिव-पार्वती परिवार विराजमान हैं। एक ही परिसर में अनेक देवी-देवताओं के दर्शन होने से यहां आने वाले श्रद्धालुओं को विशेष आध्यात्मिक अनुभूति होती है। भक्त सभी देवी-देवताओं के दर्शन कर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। सूर्यवंशी कुमरावत तंबोली समाज करता है विशेष आयोजन शारदीय नवरात्र के दौरान श्री सूर्यवंशी कुमरावत तंबोली समाज, झालावाड़ की ओर से मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के प्रथम दिन घट स्थापना के साथ धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक अखंड ज्योत प्रज्वलित रखी जाती है और प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। इन धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालु उत्साह और भक्तिभाव के साथ भाग लेते हैं। नवमी पर हवन, दशहरे पर चोला-शृंगार और महाआरती नवरात्र की नवमी पर मंदिर में हवन का आयोजन किया जाता है। वहीं, दशहरे के अवसर पर मां नानादेवी मातादी सहित मंदिर परिसर में विराजित देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का चोला और शृंगार किया जाता है। इसके बाद संध्याकालीन महाआरती होती है, जिसके साथ नवरात्र महोत्सव का समापन होता है। धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक आयोजनों के दौरान मंदिर में भक्तिभाव का विशेष वातावरण रहता है। आस्था, परंपरा और प्रकृति का संगम है मंदिर नानादेवी मातादी मंदिर की विशेषता इसकी धार्मिक मान्यताओं, प्राकृतिक वातावरण और वर्षों से चली आ रही परंपराओं में निहित है। नवरात्र के दौरान यहां पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों के लिए श्रद्धालु जुटते हैं। तालाब किनारे स्थित यह मंदिर भक्तों के लिए देवी दर्शन का प्रमुख स्थल होने के साथ मन को शांति देने वाला आध्यात्मिक केंद्र भी है।

