वैश्विक ऑयल मार्केट्स में एक साथ कई मोर्चों पर हलचल बढ़ गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने कथित तौर पर हांगकांग और मकाऊ के अलावा दूसरी किसी भी जगह के लिए तेल उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा दी है। वहीं, रूस ने डीजल एक्सपोर्ट पर पाबंदी बढ़ा दी है और अमेरिका में भी डीजल के निर्यात पर रोक लगाने की चर्चा चल रही है। इन घटनाओं के बीच भारत ने कच्चा तेल खरीदने का अपना तरीका बदलना शुरू कर दिया है।
वैश्विक बाजार में पहले से ही मिडिल ईस्ट और रूस से सप्लाई को लेकर दबाव है। ऐसे में बड़े तेल उत्पादक देशों की तरफ से एक्सपोर्ट पर रोक या कटौती का सीधा असर पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है।
चीन ने तेल उत्पादों के एक्सपोर्ट पर लगाई रोक
चीन की रिफाइनरीज ने बीजिंग से अगली सूचना मिलने तक हांगकांग और मकाऊ के बाहर तेल उत्पादों की सप्लाई रोक दी है। सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकारी तेल कंपनी पेट्रोचाइना ने अक्टूबर में भेजे जाने वाले गैसोलीन और जेट फ्यूल के कुछ शिपमेंट रद्द कर दिए हैं। एक अन्य बड़ी रिफाइनरी कंपनी ZPC ने भी छुट्टियों वाले सप्ताह के दौरान तेल उत्पादों की कोई शिपमेंट तय नहीं की।
चीन ने क्यों उठाया यह कदम?
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना चाहता है। वेस्ट एशिया में चल रहे युद्ध के बीच सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। ऐसे में चीन अपने घरेलू बाजार को पहले सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है।
ग्लोबल मार्केट पर बढ़ सकता है दबाव
चीन के एक्सपोर्ट में कमी ऐसे समय में सामने आई है, जब दुनिया पहले से ही कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई को लेकर दबाव में है। मिडिल ईस्ट और रूस से सप्लाई में किसी भी तरह की कमी वैश्विक बाजार में उपलब्ध तेल उत्पादों को और सीमित कर सकती है। इसका असर उन देशों पर ज्यादा पड़ सकता है जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं। अगर सप्लाई घटती है और मांग बनी रहती है तो कुछ देशों में ईंधन की कीमतें नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने का दबाव बन सकता है।
रूस ने भी डीजल एक्सपोर्ट पर बढ़ाई रोक
तेल बाजार में रूस का कदम भी अहम है। मॉस्को टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस ने घरेलू फ्यूल मार्केट में स्थिरता बनाए रखने के लिए ईंधन उत्पादकों के डीजल एक्सपोर्ट पर लगी रोक को 31 अक्टूबर तक बढ़ा दिया है। रूस पहले भी पेट्रोल और डीजल के एक्सपोर्ट पर कई बार पाबंदियां लगा चुका है। इसका मकसद घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों और ईंधन की कमी को नियंत्रित करना रहा है। यूक्रेन की ओर से रूस की रिफाइनरियों पर ड्रोन हमलों के चलते भी वहां ईंधन उत्पादन और सप्लाई पर असर पड़ा है। यूक्रेनी सेना ने पिछले सप्ताह दावा किया था कि उसने रूस की 45 फीसदी से ज्यादा रिफाइनिंग क्षमता को प्रभावित किया है।
सऊदी अरब में भी सप्लाई पर पड़ा था असर
सऊदी अरब से भी हाल में तेल सप्लाई को लेकर चिंता सामने आई थी। सितंबर में सऊदी अरामको ने कुछ यूरोपीय रिफाइनिंग कंपनियों को बताया था कि अक्टूबर में उन्हें सऊदी अरब से कच्चे तेल की सप्लाई नहीं मिल पाएगी। इसके पीछे ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमले को बताया गया था। हमले के बाद पाइपलाइन के तीन पंपिंग स्टेशन प्रभावित हुए और लाल सागर के यानबू बंदरगाह से तेल की लोडिंग पर भी असर पड़ा। हालांकि, बाद में स्थिति में सुधार हुआ। रॉयटर्स ने 29 सितंबर को सूत्रों के हवाले से बताया कि ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का संचालन दोबारा शुरू होने के बाद यानबू बंदरगाह से तेल टैंकरों की लोडिंग भी फिर शुरू हो गई।
अमेरिका में भी डीजल एक्सपोर्ट रोकने पर चर्चा
अमेरिका में भी बढ़ते एनर्जी प्राइसेस के बीच डीजल एक्सपोर्ट को लेकर मंथन चल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 30 सितंबर को कहा कि डीजल के निर्यात पर रोक लगाने को लेकर रोजाना बातचीत हो रही है। उनके मुताबिक, ऐसी पाबंदी से डीजल की कीमतों को नीचे लाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका असर पेट्रोल की कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत ने क्यों बदली कच्चा तेल खरीदने की रणनीति?
इन घटनाओं के बीच भारतीय रिफाइनरियों ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से कच्चे तेल की आवाजाही मुश्किल हुई है। हॉर्मुज की खाड़ी से दुनिया के लिए बड़ी मात्रा में तेल गुजरता है। ऐसे में इस रास्ते से जुड़े जोखिम बढ़ने के बाद भारतीय रिफाइनरियां पहले अपने जहाजों को वहां भेजने से बच रही थीं। इसके बजाय गल्फ देशों और अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग कंपनियों के जहाज कच्चा तेल भारत तक पहुंचा रहे थे। इसका फायदा यह था कि भारतीय कंपनियों को खुद जोखिम उठाने की जरूरत कम पड़ती थी, लेकिन इसके बदले उन्हें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही थी।
अब भारतीय कंपनियां खुद चार्टर कर रही हैं टैंकर
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के हफ्तों में भारतीय रिफाइनरों ने अपना तरीका बदलना शुरू किया है। अब कंपनियां खुद टैंकर चार्टर करके फारस की खाड़ी के अंदर से कच्चा तेल लाने की तैयारी कर रही हैं। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और एचपीसीएल- मित्तल एनर्जी ने फ्री-ऑन-बोर्ड यानी FOB आधार पर इराकी कच्चा तेल खरीदा है।
इस व्यवस्था में खरीदार को तेल को जहाज पर लोड होने के बाद उसके परिवहन और उससे जुड़े जोखिम की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है। भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह बदलाव लागत कम करने और सप्लाई चेन को ज्यादा भरोसेमंद बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

