दरभंगा में विजयादशमी पर सिंदूर खेला,मां दुर्गा को किया विदा:सिख परिवार की महिलाएं भी हुईं शामिल, बंगाल-मिथिला की संस्कृति का दिखा संगम

दरभंगा में विजयादशमी पर सिंदूर खेला,मां दुर्गा को किया विदा:सिख परिवार की महिलाएं भी हुईं शामिल, बंगाल-मिथिला की संस्कृति का दिखा संगम

विजयादशमी पर दरभंगा में मां दुर्गा की विदाई बंगाली परंपरा सिंदूर खेला के साथ की गई। राजकुमारगंज स्थित पीताम्बरी बांग्ला स्कूल में विचित्रा क्लब लालबाग और बंगाली टोला स्थित वीणापानी क्लब की तरफ से कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर, पान और मिठाई चढ़ाई। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य, पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मां की विदाई के बीच महिलाओं ने नाच-गाकर अगले साल फिर आने का निमंत्रण दिया। इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसमें केवल बंगाली समाज की महिलाएं ही नहीं, बल्कि दूसरे समुदायों की महिलाएं भी शामिल हुईं। सिख परिवार से आने वाली अजीत कौर भी सालों से इस परंपरा का हिस्सा बन रही हैं। यहां सिंदूर खेला के जरिए बंगाल और मिथिला की साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द की झलक देखने को मिली। 63 साल से हो रही पूजा विचित्रा क्लब से जुड़ी सुजाता बोस ने बताया, पीताम्बरी बांग्ला स्कूल में पिछले 63 सालों से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। बंगाली समाज में मां दुर्गा को बेटी के रूप में माना जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा दस दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। विजयादशमी पर उनकी विदाई उसी तरह की जाती है, जैसे मायके आई बेटी को ससुराल विदा किया जाता है। पूजा के दस दिनों तक लोग मिल-जुलकर उत्सव मनाते हैं। इस दौरान दूसरे समाजों के लोग भी शामिल होते हैं। सिंदूर खेला में महिलाएं पहले मां दुर्गा को सिंदूर लगाती हैं और पान, मिठाई और भोग खिलाती हैं। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर गले मिलती हैं और मां को विदाई देती हैं। इस दौरान खुशी के साथ बिछड़ने का भाव भी दिखाई देता है। मां की विदाई का दुख, अगले साल आने की खुशी तारा सिन्हा ने बताया, मां दुर्गा हर साल बेटी बनकर आती हैं। उनके आगमन पर घरों में तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाए जाते हैं। बंगाली समाज में मछली और चावल प्रमुख भोजन हैं। मिथिलांचल में भी मछली का विशेष महत्व है। यही वजह है कि दोनों क्षेत्रों की खान-पान की परंपराओं में समानता दिखाई देती है। मां की विदाई के समय दुख होता है, लेकिन अगले साल उनके दोबारा आने की खुशी भी रहती है। सिख परिवार की अजीत कौर भी निभाती हैं परंपरा सिंदूर खेला में शामिल अजीत कौर ने बताया, वह सिख परिवार से आती हैं, लेकिन कई सालों से दुर्गा पूजा में शामिल हो रही हैं। इस आयोजन में भाग लेकर उन्हें ऊर्जा और उत्साह महसूस होता है। शादीशुदा महिलाओं के लिए सिंदूर का विशेष महत्व है। उन्हें विश्वास है कि मां दुर्गा का आशीर्वाद सभी पर बना रहता है। महिलाओं की लाल और सफेद साड़ी भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है। लाल रंग शक्ति का, जबकि सफेद रंग शांति का प्रतीक माना जाता है। मां की विदाई के दौरान इन रंगों के जरिए शक्ति, शांति और भावनाओं का संगम दिखाई देता है। बंगाल और मिथिला की संस्कृति का संगम कार्यक्रम में शामिल महिलाओं ने दरभंगा को मिथिला में बंगाल का द्वार बताते हुए कहा, दोनों क्षेत्रों की धार्मिक परंपराओं, खान-पान और पारिवारिक संस्कारों में कई समानताएं हैं। सिंदूर खेला बंगाली समाज की विशिष्ट परंपरा है, लेकिन दरभंगा में दूसरे समुदायों की महिलाओं की भागीदारी इसे सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनाती है। मां दुर्गा की विदाई के दौरान महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती रहीं, गले मिलकर शुभकामनाएं देती रहीं और ढोल-नगाड़ों की धुन पर नाचती-गाती रहीं। विजयादशमी पर दरभंगा में मां दुर्गा की विदाई बंगाली परंपरा सिंदूर खेला के साथ की गई। राजकुमारगंज स्थित पीताम्बरी बांग्ला स्कूल में विचित्रा क्लब लालबाग और बंगाली टोला स्थित वीणापानी क्लब की तरफ से कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर, पान और मिठाई चढ़ाई। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य, पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मां की विदाई के बीच महिलाओं ने नाच-गाकर अगले साल फिर आने का निमंत्रण दिया। इस आयोजन की खास बात यह रही कि इसमें केवल बंगाली समाज की महिलाएं ही नहीं, बल्कि दूसरे समुदायों की महिलाएं भी शामिल हुईं। सिख परिवार से आने वाली अजीत कौर भी सालों से इस परंपरा का हिस्सा बन रही हैं। यहां सिंदूर खेला के जरिए बंगाल और मिथिला की साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द की झलक देखने को मिली। 63 साल से हो रही पूजा विचित्रा क्लब से जुड़ी सुजाता बोस ने बताया, पीताम्बरी बांग्ला स्कूल में पिछले 63 सालों से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। बंगाली समाज में मां दुर्गा को बेटी के रूप में माना जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा दस दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। विजयादशमी पर उनकी विदाई उसी तरह की जाती है, जैसे मायके आई बेटी को ससुराल विदा किया जाता है। पूजा के दस दिनों तक लोग मिल-जुलकर उत्सव मनाते हैं। इस दौरान दूसरे समाजों के लोग भी शामिल होते हैं। सिंदूर खेला में महिलाएं पहले मां दुर्गा को सिंदूर लगाती हैं और पान, मिठाई और भोग खिलाती हैं। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर गले मिलती हैं और मां को विदाई देती हैं। इस दौरान खुशी के साथ बिछड़ने का भाव भी दिखाई देता है। मां की विदाई का दुख, अगले साल आने की खुशी तारा सिन्हा ने बताया, मां दुर्गा हर साल बेटी बनकर आती हैं। उनके आगमन पर घरों में तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाए जाते हैं। बंगाली समाज में मछली और चावल प्रमुख भोजन हैं। मिथिलांचल में भी मछली का विशेष महत्व है। यही वजह है कि दोनों क्षेत्रों की खान-पान की परंपराओं में समानता दिखाई देती है। मां की विदाई के समय दुख होता है, लेकिन अगले साल उनके दोबारा आने की खुशी भी रहती है। सिख परिवार की अजीत कौर भी निभाती हैं परंपरा सिंदूर खेला में शामिल अजीत कौर ने बताया, वह सिख परिवार से आती हैं, लेकिन कई सालों से दुर्गा पूजा में शामिल हो रही हैं। इस आयोजन में भाग लेकर उन्हें ऊर्जा और उत्साह महसूस होता है। शादीशुदा महिलाओं के लिए सिंदूर का विशेष महत्व है। उन्हें विश्वास है कि मां दुर्गा का आशीर्वाद सभी पर बना रहता है। महिलाओं की लाल और सफेद साड़ी भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है। लाल रंग शक्ति का, जबकि सफेद रंग शांति का प्रतीक माना जाता है। मां की विदाई के दौरान इन रंगों के जरिए शक्ति, शांति और भावनाओं का संगम दिखाई देता है। बंगाल और मिथिला की संस्कृति का संगम कार्यक्रम में शामिल महिलाओं ने दरभंगा को मिथिला में बंगाल का द्वार बताते हुए कहा, दोनों क्षेत्रों की धार्मिक परंपराओं, खान-पान और पारिवारिक संस्कारों में कई समानताएं हैं। सिंदूर खेला बंगाली समाज की विशिष्ट परंपरा है, लेकिन दरभंगा में दूसरे समुदायों की महिलाओं की भागीदारी इसे सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनाती है। मां दुर्गा की विदाई के दौरान महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती रहीं, गले मिलकर शुभकामनाएं देती रहीं और ढोल-नगाड़ों की धुन पर नाचती-गाती रहीं।  

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