अररिया शहर के जयप्रकाश नगर स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय परिसर में डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से प्रभात फेरी और पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें विद्यालय के बच्चों और शिक्षकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विशिष्ट अधिगम दिव्यांगता से प्रभावित बच्चों की समस्याओं के प्रति लोगों को जागरूक करना और उन्हें बेहतर सहयोग देने का संदेश देना था। इस दौरान बच्चों और शिक्षकों ने जागरूकता से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से बताया कि पढ़ने-लिखने में परेशानी होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चा कमजोर है। ऐसे बच्चों को सही मार्गदर्शन, धैर्य और सहयोग देकर आगे बढ़ने के अवसर दिए जाने चाहिए। दिमाग तेज, लेकिन पढ़ने-लिखने में हो सकती है परेशानी विद्यालय के संसाधन शिक्षक ज्ञानचंद यादव ने बताया कि समावेशी शिक्षा के तहत दिव्यांग बच्चों की जरूरतों को समझने और उन्हें शिक्षा से जोड़ने का काम किया जाता है। उन्होंने कहा कि विशिष्ट अधिगम दिव्यांगता भी इसी तरह की एक समस्या है, जिसमें कुछ बच्चों को पढ़ने, लिखने और शब्दों की सही स्पेलिंग लिखने में कठिनाई होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई बार बच्चा 36 लिखने के बजाय 63 और 48 लिखने के बजाय 84 लिख देता है। इसी तरह स्पेलिंग लिखने में भी गलतियां हो सकती हैं। ऐसे बच्चों की समझ और सोचने की क्षमता अच्छी हो सकती है, लेकिन उन्हें पढ़ने-लिखने में सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक समय और मदद की जरूरत पड़ सकती है। बच्चों को डांटने के बजाय समझने की जरूरत ज्ञानचंद यादव ने बताया कि ऐसे बच्चों की परेशानी को समझना जरूरी है। उन्हें कमजोर समझकर डांटना या दूसरों से तुलना करना सही नहीं है। शिक्षक और अभिभावक धैर्य के साथ उनकी मदद करें, ताकि वे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि हर बच्चा सीखने की अलग क्षमता रखता है। जरूरत है कि उसकी कठिनाइयों को पहचाना जाए और शिक्षा के दौरान उचित सहयोग दिया जाए। प्रभात फेरी और पेंटिंग प्रतियोगिता जैसी गतिविधियां बच्चों में जागरूकता बढ़ाने के साथ समाज को भी समावेशी शिक्षा के प्रति संवेदनशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अररिया शहर के जयप्रकाश नगर स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय परिसर में डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से प्रभात फेरी और पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें विद्यालय के बच्चों और शिक्षकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विशिष्ट अधिगम दिव्यांगता से प्रभावित बच्चों की समस्याओं के प्रति लोगों को जागरूक करना और उन्हें बेहतर सहयोग देने का संदेश देना था। इस दौरान बच्चों और शिक्षकों ने जागरूकता से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से बताया कि पढ़ने-लिखने में परेशानी होने का मतलब यह नहीं है कि बच्चा कमजोर है। ऐसे बच्चों को सही मार्गदर्शन, धैर्य और सहयोग देकर आगे बढ़ने के अवसर दिए जाने चाहिए। दिमाग तेज, लेकिन पढ़ने-लिखने में हो सकती है परेशानी विद्यालय के संसाधन शिक्षक ज्ञानचंद यादव ने बताया कि समावेशी शिक्षा के तहत दिव्यांग बच्चों की जरूरतों को समझने और उन्हें शिक्षा से जोड़ने का काम किया जाता है। उन्होंने कहा कि विशिष्ट अधिगम दिव्यांगता भी इसी तरह की एक समस्या है, जिसमें कुछ बच्चों को पढ़ने, लिखने और शब्दों की सही स्पेलिंग लिखने में कठिनाई होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई बार बच्चा 36 लिखने के बजाय 63 और 48 लिखने के बजाय 84 लिख देता है। इसी तरह स्पेलिंग लिखने में भी गलतियां हो सकती हैं। ऐसे बच्चों की समझ और सोचने की क्षमता अच्छी हो सकती है, लेकिन उन्हें पढ़ने-लिखने में सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक समय और मदद की जरूरत पड़ सकती है। बच्चों को डांटने के बजाय समझने की जरूरत ज्ञानचंद यादव ने बताया कि ऐसे बच्चों की परेशानी को समझना जरूरी है। उन्हें कमजोर समझकर डांटना या दूसरों से तुलना करना सही नहीं है। शिक्षक और अभिभावक धैर्य के साथ उनकी मदद करें, ताकि वे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि हर बच्चा सीखने की अलग क्षमता रखता है। जरूरत है कि उसकी कठिनाइयों को पहचाना जाए और शिक्षा के दौरान उचित सहयोग दिया जाए। प्रभात फेरी और पेंटिंग प्रतियोगिता जैसी गतिविधियां बच्चों में जागरूकता बढ़ाने के साथ समाज को भी समावेशी शिक्षा के प्रति संवेदनशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

