पश्चिमी सिंहभूम के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और हौसले से ऐसी मिसाल पेश की है, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन गई है। जिले के 24 वर्षीय शेखर गोप ने लद्दाख की 20,472 फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। वहीं, 23 वर्षीय धीरोज कुमार स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के बावजूद 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचे। दोनों ने 25 से 31 अगस्त 2026 के बीच लद्दाख की मारखा घाटी में आयोजित अभियान में हिस्सा लिया। जन्म से दृष्टिबाधित होने के कारण दोनों के शुरुआती जीवन में रोजमर्रा के काम और स्वतंत्र रूप से आने-जाने जैसी चुनौतियां थीं। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने आगे बढ़ने का रास्ता तलाशा।
वर्ष 2022 में टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांग समावेशन पहल ‘सबल’ से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। यहां उन्हें ब्रेल, डिजिटल तकनीक, दैनिक कार्यों और स्वतंत्र आवागमन का प्रशिक्षण मिला। धीरे-धीरे दोनों आत्मनिर्भर बने और बाद में मोबिलिटी ट्रेनर के रूप में दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को भी प्रशिक्षण देने लगे। फुटबॉल के मैदान से हिमालय तक पहुंचा आत्मविश्वास शेखर और धीरोज के लिए यह पर्वतारोहण केवल ऊंचाई नापने का अभियान नहीं था, बल्कि वर्षों में हासिल आत्मविश्वास की परीक्षा भी थी। दोनों ने खेल के मैदान में भी अपनी पहचान बनाई है। शेखर गोप झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम के कप्तान हैं, जबकि धीरोज दृष्टिबाधित फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। खेल ने दोनों को अनुशासन, टीम भावना और मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की सीख दी। इसी मानसिक मजबूती ने उन्हें पर्वतारोहण की चुनौती स्वीकार करने का हौसला दिया। अभियान से पहले दलमा की पहाड़ियों में दोनों ने कड़ा प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उनकी शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती पर काम किया गया। लगातार अभ्यास ने उन्हें ऊंचाई, कठिन रास्तों और बदलते मौसम जैसी चुनौतियों के लिए तैयार किया। इसके बाद उन्होंने लद्दाख के कठिन अभियान का रुख किया, जहां हर कदम उनकी क्षमता और हिम्मत की परीक्षा लेने वाला था। माइनस तापमान और कम ऑक्सीजन ने ली परीक्षा जो-जोंगो अभियान के दौरान दोनों को शून्य से नीचे तापमान, कम ऑक्सीजन और पथरीले तथा खड़े रास्तों का सामना करना पड़ा। ऊंचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की कमी ने मुश्किलें और बढ़ा दीं। इसी दौरान धीरोज की तबीयत बिगड़ गई। स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप से आगे नहीं बढ़ने दिया गया। हालांकि शिखर तक नहीं पहुंच पाने की कसक उनके मन में रही, लेकिन इतनी ऊंचाई तक पहुंचना भी उनके लिए बड़ी उपलब्धि रही। दूसरी ओर, शेखर ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी चढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 20,472 फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। शून्य से नीचे तापमान और बर्फीले रास्तों के बीच शिखर तक पहुंचना उनके लिए अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि रही। इस अभियान ने साबित किया कि सही प्रशिक्षण, सहयोग और आत्मविश्वास के साथ शारीरिक चुनौती सपनों की राह को पूरी तरह रोक नहीं सकती। दृष्टिहीनता सपनों की सीमा तय नहीं कर सकती शिखर पर तिरंगा फहराने वाले शेखर गोप ने कहा कि शुरुआत में कम तापमान, पथरीले रास्ते और कम ऑक्सीजन चुनौतीपूर्ण लगे, लेकिन प्रशिक्षण और साथियों के भरोसे ने डर को पीछे छोड़ने में मदद की। उनका कहना है कि दृष्टिहीनता सपनों की सीमा तय नहीं कर सकती। वहीं, धीरोज ने माना कि स्वास्थ्य खराब होने के कारण शिखर तक नहीं पहुंच पाने की टीस है, लेकिन 16,732 फीट तक का सफर उनके लिए साहस की बड़ी जीत है। दोनों युवाओं की कहानी यह संदेश देती है कि किसी कमी को जीवन की अंतिम सीमा मान लेना जरूरी नहीं है। पश्चिमी सिंहभूम के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और हौसले से ऐसी मिसाल पेश की है, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन गई है। जिले के 24 वर्षीय शेखर गोप ने लद्दाख की 20,472 फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। वहीं, 23 वर्षीय धीरोज कुमार स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के बावजूद 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचे। दोनों ने 25 से 31 अगस्त 2026 के बीच लद्दाख की मारखा घाटी में आयोजित अभियान में हिस्सा लिया। जन्म से दृष्टिबाधित होने के कारण दोनों के शुरुआती जीवन में रोजमर्रा के काम और स्वतंत्र रूप से आने-जाने जैसी चुनौतियां थीं। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने आगे बढ़ने का रास्ता तलाशा।
वर्ष 2022 में टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांग समावेशन पहल ‘सबल’ से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। यहां उन्हें ब्रेल, डिजिटल तकनीक, दैनिक कार्यों और स्वतंत्र आवागमन का प्रशिक्षण मिला। धीरे-धीरे दोनों आत्मनिर्भर बने और बाद में मोबिलिटी ट्रेनर के रूप में दूसरे दृष्टिबाधित लोगों को भी प्रशिक्षण देने लगे। फुटबॉल के मैदान से हिमालय तक पहुंचा आत्मविश्वास शेखर और धीरोज के लिए यह पर्वतारोहण केवल ऊंचाई नापने का अभियान नहीं था, बल्कि वर्षों में हासिल आत्मविश्वास की परीक्षा भी थी। दोनों ने खेल के मैदान में भी अपनी पहचान बनाई है। शेखर गोप झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम के कप्तान हैं, जबकि धीरोज दृष्टिबाधित फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। खेल ने दोनों को अनुशासन, टीम भावना और मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की सीख दी। इसी मानसिक मजबूती ने उन्हें पर्वतारोहण की चुनौती स्वीकार करने का हौसला दिया। अभियान से पहले दलमा की पहाड़ियों में दोनों ने कड़ा प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उनकी शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती पर काम किया गया। लगातार अभ्यास ने उन्हें ऊंचाई, कठिन रास्तों और बदलते मौसम जैसी चुनौतियों के लिए तैयार किया। इसके बाद उन्होंने लद्दाख के कठिन अभियान का रुख किया, जहां हर कदम उनकी क्षमता और हिम्मत की परीक्षा लेने वाला था। माइनस तापमान और कम ऑक्सीजन ने ली परीक्षा जो-जोंगो अभियान के दौरान दोनों को शून्य से नीचे तापमान, कम ऑक्सीजन और पथरीले तथा खड़े रास्तों का सामना करना पड़ा। ऊंचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की कमी ने मुश्किलें और बढ़ा दीं। इसी दौरान धीरोज की तबीयत बिगड़ गई। स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप से आगे नहीं बढ़ने दिया गया। हालांकि शिखर तक नहीं पहुंच पाने की कसक उनके मन में रही, लेकिन इतनी ऊंचाई तक पहुंचना भी उनके लिए बड़ी उपलब्धि रही। दूसरी ओर, शेखर ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी चढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 20,472 फीट ऊंची जो-जोंगो चोटी पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। शून्य से नीचे तापमान और बर्फीले रास्तों के बीच शिखर तक पहुंचना उनके लिए अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि रही। इस अभियान ने साबित किया कि सही प्रशिक्षण, सहयोग और आत्मविश्वास के साथ शारीरिक चुनौती सपनों की राह को पूरी तरह रोक नहीं सकती। दृष्टिहीनता सपनों की सीमा तय नहीं कर सकती शिखर पर तिरंगा फहराने वाले शेखर गोप ने कहा कि शुरुआत में कम तापमान, पथरीले रास्ते और कम ऑक्सीजन चुनौतीपूर्ण लगे, लेकिन प्रशिक्षण और साथियों के भरोसे ने डर को पीछे छोड़ने में मदद की। उनका कहना है कि दृष्टिहीनता सपनों की सीमा तय नहीं कर सकती। वहीं, धीरोज ने माना कि स्वास्थ्य खराब होने के कारण शिखर तक नहीं पहुंच पाने की टीस है, लेकिन 16,732 फीट तक का सफर उनके लिए साहस की बड़ी जीत है। दोनों युवाओं की कहानी यह संदेश देती है कि किसी कमी को जीवन की अंतिम सीमा मान लेना जरूरी नहीं है।

