घर में डेढ़ फीट पानी, तख्त पर बन रहा खाना:बाराबंकी में 5 गांवों की 1250 आबादी बाढ़ की चपेट में; फसल-मवेशी छोड़कर राहत शिविर जाने को तैयार नहीं

घर में डेढ़ फीट पानी, तख्त पर बन रहा खाना:बाराबंकी में 5 गांवों की 1250 आबादी बाढ़ की चपेट में; फसल-मवेशी छोड़कर राहत शिविर जाने को तैयार नहीं

बाराबंकी। नेपाल के बैराजों से लगातार लाखों क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद सरयू (घाघरा) नदी उफान पर है। बाराबंकी की रामसनेहीघाट तहसील के तराई क्षेत्र में बाढ़ का पानी गांवों में घुस गया है। करीब 5 गांवों की 1250 आबादी जलभराव की चपेट में है। घरों में पानी भरने से ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल हो गई है। प्रशासन की ओर से प्रभावित परिवारों तक भोजन और जरूरी राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। इसके बावजूद पीने के पानी, मवेशियों के चारे और शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों की समस्या बनी हुई है। घर में डेढ़ फीट पानी, तख्त पर बनाया चूल्हा जलालपुर गांव में बाढ़ की स्थिति ज्यादा गंभीर है। यहां 65 वर्षीय राम सागर और उनकी 60 वर्षीय पत्नी दशरथ देई के घर और झोपड़ी में करीब डेढ़ फीट तक पानी भरा है। घर के फर्श पर सूखी जगह तक नहीं बची है। ऐसे में बुजुर्ग दंपती ने लकड़ी के तख्त पर चूल्हा रखकर खाना बनाने का इंतजाम किया है। दशरथ देई बताती हैं कि प्रशासन की ओर से उन्हें भोजन के पैकेट मिल रहे हैं, लेकिन सुबह की चाय और हल्का खाना बनाने के लिए इसी चूल्हे का सहारा लेना पड़ता है। घर में बची सूखी लकड़ियों से किसी तरह आग जलाकर खाना तैयार किया जा रहा है। राहत शिविर नहीं गए, फसल-मवेशियों की चिंता बाढ़ का पानी घर में घुसने के बावजूद बुजुर्ग दंपती राहत शिविर में जाने के बजाय यहीं रहने को मजबूर हैं। इसकी वजह उनकी खड़ी धान की फसल और घर में बंधे मवेशी हैं। दशरथ देई के मुताबिक, उनकी थोड़ी सी जमीन पर धान की फसल खड़ी है। घर छोड़कर चले गए तो फसल और मवेशियों की देखभाल कौन करेगा, यही चिंता उन्हें रोक रही है। राम सागर कहते हैं कि यह उनका पुश्तैनी घर है। घर का सामान, फसल और मवेशी सब यहीं हैं। इन्हें छोड़कर जाना आसान नहीं है। पानी के बीच घर बचाने की जद्दोजहद ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ ने जिंदगी मुश्किल कर दी है, लेकिन घर, फसल और मवेशियों को बचाने की चिंता उन्हें पानी के बीच रहने को मजबूर कर रही है। प्रशासन राहत पहुंचा रहा है, लेकिन जलभराव बढ़ने के साथ ग्रामीणों की मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं।

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