परम संत सतगुरु कंवर साहब महाराज ने कहा कि इंसान सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसकी सबसे बड़ी जरूरत भी समाज है। सबसे बड़ी मदद भी इंसान को इंसान से ही मिलती है। अगर इंसान के जीवन में भक्ति नहीं है, तो सब कुछ बेमानी है। सामाजिक भी रहो और आध्यात्मिक भी रहो। वे रविवार को चूरू रोड स्थित राधास्वामी आश्रम में हुए सत्संग में बोल रहे थे। महाराज ने कहा कि इंसान अपने स्वार्थ के कारण सब कुछ बर्बाद कर रहा है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य प्रकृति का लगातार दोहन और शोषण कर रहा है। पेड़ों को काटा जा रहा है, पहाड़ों को काटा जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि आज प्रकृति का स्वरूप बदल रहा है, तालाब और ताल सूख रहे हैं, अनाज जहरीला होता जा रहा है और वातावरण अशुद्ध होता जा रहा है। अगर जीवन को सुरक्षित रखना है तो प्रकृति को सहेजना होगा। राजस्थान की धरती पर गुरु जंभेश्वर महाराज की प्रेरणा से पेड़ों की रक्षा के लिए लोगों ने अपने प्राणों तक का बलिदान दिया था। आज फिर उसी जज्बे की आवश्यकता है। संत ने राजा भर्तृहरि के भाई राजा विक्रमादित्य से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक बार राजा विक्रमादित्य एक महात्मा के पास गए और उनसे पूछा कि वे कौन से कर्म थे, जिनके कारण उन्हें मानव योनि, राजगद्दी और भूपति होने का अवसर प्राप्त हुआ। महात्मा राख खा रहे थे। उन्होंने कहा कि मेरा भाई बताएगा। दूसरे महात्मा अंगारे खा रहे थे, उन्होंने कहा कि मेरा तीसरा भाई बताएगा। तीसरे महात्मा पत्थर खा रहे थे। उसने बताया कि पिछले जन्म में एक महात्मा हम चार भाइयों के पास आए थे और उन्होंने भोजन मांगा था। पहले भाई ने कहा कि मैं तुम्हें रोटी दे दूंगा तो क्या मैं स्वयं राख खाऊंगा? दूसरे ने कहा कि मैं तुम्हें रोटी दे दूंगा तो क्या मैं अंगारे खाऊंगा? तीसरे ने कहा कि क्या मैं तुम्हें रोटी दे दूंगा और स्वयं पत्थर खाऊंगा? इसलिए इस जन्म में उन्हें राख, अंगारे और पत्थर खाने पड़ रहे हैं। लेकिन चौथे भाई के रूप में आप थे, जिन्होंने अपने हिस्से की रोटी उस महात्मा को दे दी थी। उसी कर्म का फल है कि आज आप भूपति हैं। यह प्रसंग हमें बताता है कि कर्मफल का भोग प्रत्येक जीव को करना पड़ता है। भक्ति के तीन आधार हैं तप, त्याग और साधना। ये तीनों अत्यंत कठिन हैं।

