जिलाधिकारी हरदोई को हाइकोर्ट ने किया तलब:जब प्रधान का कार्यकाल खत्म हो गया तो उसके खिलाफ हटाने की कार्यवाही क्यों?

जिलाधिकारी हरदोई को हाइकोर्ट ने किया तलब:जब प्रधान का कार्यकाल खत्म हो गया तो उसके खिलाफ हटाने की कार्यवाही क्यों?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हरदोई में एक पूर्व ग्राम प्रधान के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने सवाल उठाया कि जब संबंधित ग्राम प्रधान का कार्यकाल 25 दिसंबर 2020 को ही समाप्त हो चुका है, तो उसे पद से हटाने के लिए 1997 के नियमों के तहत जांच समिति गठित करने का क्या औचित्य है। कोर्ट ने इस मामले में हरदोई के जिलाधिकारी को अगली सुनवाई पर तलब किया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने अंकित कुमार द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारियों ने फाइल पर उपलब्ध तथ्यों पर बिना विचार किए कार्रवाई की है। न्यायालय ने जिलाधिकारी से पूछा है कि उन्होंने जांच समिति किस आधार पर और किस उद्देश्य से गठित की। सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि 4 अगस्त 2025 को तत्कालीन बीएसए ने एक रिपोर्ट तैयार कर उसी दिन तत्कालीन जिला पंचायत राज अधिकारी को व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी थी। इसके बाद, जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से 28 मार्च 2026 को ग्राम प्रधान को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जवाब मिलने के बाद 16 मई 2026 को अंतिम जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रधान को पद से हटाने के लिए उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 95(1)(जी) और 1997 के नियमों के तहत कार्यवाही की जा रही है, जबकि संबंधित व्यक्ति अब प्रधान नहीं है। न्यायालय ने कहा कि यदि यह सरकारी धन के दुरुपयोग, गबन या वसूली का मामला है, तो उसके लिए अधिनियम की धारा 27 के तहत कार्यवाही की जा सकती है। इस मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

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जिलाधिकारी हरदोई को हाइकोर्ट ने किया तलब:जब प्रधान का कार्यकाल खत्म हो गया तो उसके खिलाफ हटाने की कार्यवाही क्यों?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हरदोई में एक पूर्व ग्राम प्रधान के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने सवाल उठाया कि जब संबंधित ग्राम प्रधान का कार्यकाल 25 दिसंबर 2020 को ही समाप्त हो चुका है, तो उसे पद से हटाने के लिए 1997 के नियमों के तहत जांच समिति गठित करने का क्या औचित्य है। कोर्ट ने इस मामले में हरदोई के जिलाधिकारी को अगली सुनवाई पर तलब किया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने अंकित कुमार द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारियों ने फाइल पर उपलब्ध तथ्यों पर बिना विचार किए कार्रवाई की है। न्यायालय ने जिलाधिकारी से पूछा है कि उन्होंने जांच समिति किस आधार पर और किस उद्देश्य से गठित की। सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि 4 अगस्त 2025 को तत्कालीन बीएसए ने एक रिपोर्ट तैयार कर उसी दिन तत्कालीन जिला पंचायत राज अधिकारी को व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी थी। इसके बाद, जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से 28 मार्च 2026 को ग्राम प्रधान को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। जवाब मिलने के बाद 16 मई 2026 को अंतिम जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रधान को पद से हटाने के लिए उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 95(1)(जी) और 1997 के नियमों के तहत कार्यवाही की जा रही है, जबकि संबंधित व्यक्ति अब प्रधान नहीं है। न्यायालय ने कहा कि यदि यह सरकारी धन के दुरुपयोग, गबन या वसूली का मामला है, तो उसके लिए अधिनियम की धारा 27 के तहत कार्यवाही की जा सकती है। इस मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

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