जिउतिया को लेकर नहाय-खाय के नियमों का पालन आज व्रत रख संतान की लंबी आयु की करेंगी कामना

जिउतिया को लेकर नहाय-खाय के नियमों का पालन आज व्रत रख संतान की लंबी आयु की करेंगी कामना

मां की ओर से अपने संतान की लम्बी आयु के लिए किए जाने वाला कठिन व्रत में शुमार जीवित्पुत्रिका व्रत का नहाय खाय के साथ शुरू हो गया। जितिया पर्व महिलाओं की ओर से किए जाने वाले व्रत में बेहद खास होता है। इस दिन वे संतान की लंबी उम्र की कामना को लेकर व्रत रखती हैं। इस व्रत को जिउतिया, जितिया, जीवित्पुत्रिका, जीमूतवाहन व्रत नाम से जाना जाता है। यह व्रत इसलिए कठिन माना गया है कि इसमें महिला तीन दिन तक उपवास रखती है। इसमे व्रत के जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। पंचांग के मुताबिक प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत किया जाता है। हर साल सुहागन स्त्रियां ये व्रत रखती हैं और संतान की लम्बी आयु व उसके सुखमय जीवन की कामना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जितिया व्रत करने से संतान की लंबी उम्र होती है। इस व्रत को जीवित्पुत्रिका और जितिया व्रत भी कहते हैं। इस साल यह पर्व 2 अक्टूबर को‌ नहाय खाय‌ के‌ साथ‌ शुरू हुआ। वही रात्रि में व्रती के लिए विशेष भोजन ओठगन रात्रि 2:07 से 05:13 तक उत्तम होगा, 3 अक्टूबर को व्रती पूरा दिन-रात निर्जला व्रत करेगी। साथ ही घर में प्याज-लहसुन आदि से निर्मित समान नहीं बनता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था और तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। धार्मिक कथाओं के मुताबिक बताया जाता है कि एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं, दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसके दाह संस्कार में सियारिन को भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया। मां की ओर से अपने संतान की लम्बी आयु के लिए किए जाने वाला कठिन व्रत में शुमार जीवित्पुत्रिका व्रत का नहाय खाय के साथ शुरू हो गया। जितिया पर्व महिलाओं की ओर से किए जाने वाले व्रत में बेहद खास होता है। इस दिन वे संतान की लंबी उम्र की कामना को लेकर व्रत रखती हैं। इस व्रत को जिउतिया, जितिया, जीवित्पुत्रिका, जीमूतवाहन व्रत नाम से जाना जाता है। यह व्रत इसलिए कठिन माना गया है कि इसमें महिला तीन दिन तक उपवास रखती है। इसमे व्रत के जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। पंचांग के मुताबिक प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जितिया व्रत किया जाता है। हर साल सुहागन स्त्रियां ये व्रत रखती हैं और संतान की लम्बी आयु व उसके सुखमय जीवन की कामना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जितिया व्रत करने से संतान की लंबी उम्र होती है। इस व्रत को जीवित्पुत्रिका और जितिया व्रत भी कहते हैं। इस साल यह पर्व 2 अक्टूबर को‌ नहाय खाय‌ के‌ साथ‌ शुरू हुआ। वही रात्रि में व्रती के लिए विशेष भोजन ओठगन रात्रि 2:07 से 05:13 तक उत्तम होगा, 3 अक्टूबर को व्रती पूरा दिन-रात निर्जला व्रत करेगी। साथ ही घर में प्याज-लहसुन आदि से निर्मित समान नहीं बनता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्य कर्मों से उसे पुनर्जीवित किया था और तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती हैं। धार्मिक कथाओं के मुताबिक बताया जाता है कि एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं, दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसके दाह संस्कार में सियारिन को भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।  

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