गोटमार मेला– 13 परिवारों के लिए शोक का दिन:किसी ने पिता खोया, तो किसी ने भाई; महिला बोली– बेटे की पढ़ाई छूटी

गोटमार मेला– 13 परिवारों के लिए शोक का दिन:किसी ने पिता खोया, तो किसी ने भाई; महिला बोली– बेटे की पढ़ाई छूटी

‘20 साल पहले गोटमार मेले की पत्थरबाजी में पति की जान चली गई थी। उनके जाने के बाद परिवार बिखर गया। बेटे की पढ़ाई छूट गई। मुझे मजदूरी करनी पड़ी।’ यह कहना है रेखा सांबारे का। पांढुर्णा के गोटमार मेले में रेखा के पति जनार्दन सांबारे की पत्थर लगने से मौत हो गई थी। पिछले 70 साल से इस खूनी खेल में 13 लोगों की मौत हो चुकी है। किसी ने अपने भाई को खोया, किसी ने पति तो किसी ने पिता को खोया। ये परिवार इस दिन को शाेक दिवस के रूप में मनाते हैं। सैकड़ों लोग घायल हो चुके हैं। पिछले साल यानी 2025 में ही करीब एक हजार लोग घायल हुए थे। बावजूद परंपरागत मेले के लिए लोगों का उत्साह बरकरार है। मध्यप्रदेश के पांढुर्णा में परंपरागत गोटमार मेला एक बार फिर 11 सितंबर को खेला जाएगा। इसके लिए पुलिस के पास सड़क पर पत्थरों के ढेर लगाए गए हैं। दैनिक भास्कर ने सदस्यों को खोने वाले परिवारों से बात की। इसे मनाने के पीछे की कहानी भी जानने की कोशिश की। पढ़िए रिपोर्ट… उन परिवारों का दर्द, जिन्होंने अपनों को खोया उस दिन ऐसा लगा, जैसे दुनिया उजड़ गई
6 सितंबर 2005 को रेखा सांबारे के पति जनार्दन सांबारे (घनपेठ) की भी मौत पत्थरबाजी में हुई थी। रेखा बताती हैं कि उस दिन ऐसा लगा, मेरी दुनिया उजड़ गई। पति घर के मुखिया थे। उनकी मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। जैसे-तैसे मजदूरी कर तीन बच्चों का पालन पोषण किया। इस दौरान बेटे की पढ़ाई भी छूटी। कई साल तक परेशानी से गुजरना पड़ा। समय के साथ बेटा बड़ा हुआ। फिर उसने खेती संभाली। आज भी बेटा खेती किसानी कर रहा है। इंजीनियर बनना चाहता था, अब खेती कर रहा हूं
जनार्दन के बेटे अंकेश सांबारे ने बताया कि पिता की मौत के समय मैं बहुत छोटा था। सिर से पिता का साया उठने के बाद पढ़ाई नहीं हो सकी। पढ़ लिखकर इंजीनियर बनना चाहता था, लेकिन यह सिर्फ सपना रह गया। आज खेती कर रहा हूं। पिता जिंदा रहते, तो मैं अच्छी पढ़ाई-लिखाई करता। प्रशासन को मेले में परिवर्तन करके धार्मिक मेले के रूप में आयोजन करना चाहिए, जिससे पत्थर मारने वाली परंपरा बंद हो सके। नदी में गिरा भाई, अस्पताल में मौत
31 अगस्त 1989 में इसी गोटमार मेले में नारायण चौरे की मौत हुई थी। नारायण के भाई योगीराज चौरे बताते हैं कि उस दिन को कभी भूल नहीं सकता। शाम का वक्त था। पांढुर्णा और सावरगांव के लोगों के झंडे को लेकर समझौता हुआ। मेरा भाई उसे निकालने जैसे ही झंडे पर चढ़ा, तो किसी ने फिर से पत्थरबाजी कर दी। मेरा भाई ऊपर से नीचे नदी में गिर गया। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां दम तोड़ दिया। आज भी यह नजारा मेरी आंखों के सामने आता है। पुलिस का इतना डर था कि हम लोग थाने में शिकायत नहीं कर सके। भाई की मौत हुई, डर के मारे केस भी दर्ज नहीं कराया
सावरगांव में रहने वाले रमेश सांबारे बताते हैं कि 24 अगस्त 1987 का दिन आज भी याद है। गोटमार मेले के दौरान गूजरी चौक में तनाव की स्थिति बनी थी। मेरा भाई कोठीराम सांबारे एक दुकान के पास खड़ा था। अचानक फायरिंग हुई। अश्रु गैस के गोले भी छोड़े गए। फायरिंग में भाई को गोली लगी। उसकी मौत हो गई। खून से लथपथ पड़े भाई को देख मैं रोता रहा। उसके बाद से हर साल गोटमार का दिन जब भी आता है, हम सहम जाते हैं। पूरा परिवार शोक मनाता है। उस समय तनाव रहने से शहर में तीन दिन तक कर्फ्यू रहा। डर के मारे शिकायत करने की हिम्मत नहीं हो रही थी, इसलिए थाने में केस दर्ज नहीं करा सके।
रमेश बताते हैं कि इससे पहले, 22 अगस्त 1955 में परिवार के महादेव सांबारे की मौत भी गोटमार मेले में हुई पत्थरबाजी में हो चुकी है। 1955 से 2025 तक 13 लोगों की मौत
गोटमार परंपरा की शुरुआत को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन सावरगांव निवासी सुरेश कावले का दावा है कि करीब 400 साल पहले शुरू हुई होगी। पत्थरबाजी में 1955 में पहली मौत हुई थी। इसके बाद 2025 तक 13 लोगों की जान चली गई। इनमें तीन लोग एक ही परिवार के थे। गोटमार में कई लोगों ने हाथ-पैर, आंखें खो दीं। बावजूद लोग इसे हर साल दोगुने उत्साह से खेलते हैं। हालांकि अपनों को खोने वाले परिवार इसे शोक दिवस के रूप में मनाते हैं। 1978 और 1987 में चली थीं गोलियां
3 सितंबर 1978 और 27 अगस्त 1987 को मेले को बंद करने के प्रयास भी किए गए थे। पत्थरबाजी कर रहे लोगों को हटाने के लिए लाठी चार्ज किया गया। आंसू गैस के गोले भी छोड़े। इससे ग्रामीण भड़क गए। लोगाें ने पुलिस पर हमला कर दिया। पुलिस ने फायरिंग भी कर दी। इस दौरान ब्राम्हणी वार्ड के देवराव सरकड़े और जाटवा वार्ड के कोठीराम संभारे की आंख में गोली लगी, जिससे उनकी मौत हो गई। इसके बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा था। परंपरा के पीछे दो मान्यताएं
पहली – हजारों साल पहले जाम नदी किनारे पिंडारी (आदिवासी) समाज का प्राचीन किला था। जहां पिंडारी समाज और उनकी सेना रहती थी। सेनापति दलपत शाह थे, लेकिन महाराष्ट्र के भोसले राजा की सेना ने पिंडारी समाज के किले पर हमला बोल दिया। इस दौरान पिंडारी समाज के अस्त्र-शस्त्र कम पड़ गए। पिंडारियों की सेना ने किले से पत्थरों से हमला करके नागपुर के भोसले राजा को परास्त कर दिया। तब से यहां पत्थर मारने की परंपरा कायम है। जनता में सेनापति दलपत शाह का नाम बदलकर राजा जाटबा नरेश कर दिया। आज भी जाटबा राजा की समाधि मौजूद है। जिस इलाके में समाधि, उसका नाम पांढुर्णा नगर पालिका में जाटबा वार्ड के नाम से दर्ज है। इस वार्ड में 600 लोगों की आबादी रहती है। दूसरी – अधूरी प्रेम कहानी
यहां के लोगों का दावा है कि पांढुर्णा का एक युवक साबर गांव की लड़की से प्रेम करता था। वह लड़की को भगाकर पांढुर्णा लेकर आने लगा, लेकिन रास्ते में जाम नदी में बाढ़ थी। दोनों नदी पार नहीं कर पाए। इसी दौरान लड़की पक्ष के लोगों को खबर लगी, तो उन्होंने पथराव शुरू कर दिया। इसके विरोध में पांढुर्णा के पक्ष ने भी पथराव कर दिया। इसी पत्थरबाजी में प्रेमी-प्रेमिका की मौत जाम नदी के बीच ही हो गई। उनकी मौत के बाद लोगों को शर्मिंदगी हुई। दोनों के शवों को उठाकर किले पर मां चंडिका के दरबार में रखा गया। पूजा-अर्चना के बाद अंतिम संस्कार कर दिया गया। इसी घटना की याद में मां चंडिका की पूजा कर गोटमार मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसे होती है गोटमार मेले की शुरुआत
जाम नदी में चंडी माता की पूजा के बाद साबर गांव के लोग पलाश के कटे पेड़ को नदी के बीच लगाते हैं। इसके बाद दोनों गांव पांढुर्णा और साबर गांव के लोगों के बीच पत्थरबाजी होती है। साबर गांव के लोग पलाश का पेड़ और झंडा नहीं निकालने देते, वे इसे लड़की मानकर रक्षा करते हैं। इस झंडे को जंगल से लाने की परंपरा पीढ़ियों से सावरगांव निवासी सुरेश कावले का परिवार करता है। वहीं, पांढुर्णा के लोग पत्थरबाजी कर पलाश का पेड़ कब्जे में लेने का प्रयास करते हैं। अंत में झंडे को तोड़ लेने के बाद दोनों पक्ष मिलकर चंडी मां की पूजा कर इस गोटमार को खत्म करते हैं।

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